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Sunday, July 4, 2010
वैजयंती
राग की यह वैजयन्ती
तुम कहां से लहा लाये ?
सजाये पलाश-पल्लव , गूंथ माला, फेर दी
नेह विजड़ित मन मेरा , बन मुर्तिका , सज गया !
दूर हो मुझसे , बना चन्दन , घिसा मुझको
फिर मुझी पर पोत सारा , चन्दन गन्ध मादल कर दिया !
दी थाल वेदना की ,सजाने को आंसुओं के मौन दीप
फिर फेर एक दुलार पूरित करूणार्द्र दृष्टि, ज्योतित सभी को कर दिया !
थे विशद विप्लव , संवेग-वात्याचक्र-प्रकम्पित सत्व
गहन आह्लाद में बोर तुमनें, अखण्ड - प्रशान्ति - यज्ञ ॠत्विक बना दिया !
कहो !
इस घने अवसाद में यह
जड़ी बूटी कहां पाये ?
राग की यह वैजयन्ती
तुम कहां से लहा लाये ?
Saturday, June 12, 2010
फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !
सोचा था
चलेगें सिन्धु की थाह लेने
नीली अतल गहराइयों की
स्वयं पर एक छाप लेने ।
था स्वप्न चलेंगे एक बार
निरखने विशद अनुभूतियॊं के
गहन कानन लता कुंज गह्वर ,
चुनेगें कुछ पुष्प
चेतना की सजावट को
संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के।
अजाने मन की
हुलसती एक चाहना थी
उड़ेगें हम भी संवेदना के प्रसार में ,
बतियायेगें
व्योम के निस्तब्ध वितान से
गहन मौन की बातें ।
वृन्त पर जो पुष्प है चुप समर्पित
उससे भी मिलेगें जानने को उसका समर्पण
अपने निविड़ एकान्त में वह किस तरह
देता है स्वयं को , अवसन्न , अशेष
अम्बर की निस्सीम विशालता को ?
सांझ की नीलम पट्टिका ओढ़
सुदूर बहुत सलिल तीरे ,स्तब्ध
सो रही है जो हरे गाछों की घनी बस्ती
जिन पर चांद से चुरायी चन्द्रिका को
बना अच्छत छींटते हैं प्रकाश कीट
विशाल वृक्ष जिनमें , अर्द्ध-मुखरित , स्तिमित
कर रहें हैं श्रेयस सांध्य गीत मौन वाचन
मौन ही की धुन पर , लयमयी , सुरमयी
सोचा था
सुनेगें
गुनेगें उन्हें भी ।
किन्तु
नियति तो यह थी नहीं ।
फिर लौट आये हैं
चेतना के हंस कछारों से ही ।
गहनता
फिर एक स्वप्न बन कर रह गयी है ।
गये थे थाह लेने अतल गहराइयों की
लेकिन
ठगा है खुद ही ने खुद को,
फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !
कविता के विरोध में
भाव पंचर हो गये हैं !
मन न जाने क्यों
अपना मसौदा
कविता को देना नहीं चाहता
है बहुत कुछ पास उसके
कहने को , सुनाने को
कविता को देने को
कविता हो जाने को
लेकिन वह दबाये बैठा है
सटकाये बैठा है ! ! !
वह नाराज है शायद कविता से
कि वह बड़ी डिप्लोमेट हो गयी है !
मन के मसौदों को नीलाम कर रही है !
सभी विधायक दबावों को
फिस्स कर दे रही है
सभी सृजनात्मक बलॊं को बिखेर दे रही है !
Saturday, May 29, 2010
निःशब्द
चलती हवा में
झूमते पेड़ की खुशी का गीत
मुझॆ पढ़ने नहीं आता !
तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! !
बसन्ती बयार में
मचलती चिड़िया की चहकन
मुझे लिखने नहीं आती !
तुम्हारी हंसी भी कहां लिख पाता हूं ! ! !
पहली फुहार में
तर बतर भीजतें पलाश की बूंद बूंद खुशी
मुझे समझ नहीं आती !
तुम्हारी निःशब्द मुस्कुराहटे
ठिठुरती रात के बाद
जवान हुयी ताजा धूप का अल्हड़पन
मुझे पीने नहीं आता !
तुम्हें आंख भर देख कुछ बोल कहां पाता हूं ! ! !
Sunday, May 23, 2010
दूब
बिना जिल्द की
वह फटी पुरानी कापी,
अपनी सब किताब की
ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं
जिस पर बीच बीच में थककर
मैं कुछ नया लिखा करता हूं ।
वैसे तो पढ़ने की इस मेज पर
हैं बहुत कापियां
जिस पर मैं धरती और नक्षत्र
लिखा करता हूं
लेकिन दबी किनारे सबसे नीचे
बीते वर्ष की बची पन्नों वाली पर,
भीतर बढ़ती हरी दूब की
कचनारी कोंपले लिखा करता हूं ।
बिना जिल्द की
वह फटी पुरानी कापी,
अपनी सब किताब की
ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं !
Wednesday, May 19, 2010
निर्मोही
तुम्हारे शब्दों में
कुछ फूल हॊते हैं !
उन्हें छूकर
मैं जाग जाता हूं !
जगाओगे नहीं मुझे ?
निष्ठुर !
तुम्हारी चहकन में
कुछ रंग होते हैं !
उनके परस से मैं
बहक जाता हूं !
बहकाओगे नहीं मुझॆ ?
पाथर !
इन रंग और शब्दों से
मेरी सांस बनती है !
आंखॊं में चमक पिघलती है
और
बातॊं में खनक फटकती है ! !
लेकिन तुम .......
चुप हो अब भी ?
कुछ तो कहो
निर्मोही !
Monday, April 12, 2010
प्रतीक्षा
हरे पत्तों में , ,,
खूब मल कर
मुंह धोयी
और भी चटकार
गोरी हो ली जैसे ................
छोटे सफेद
गमकते फूलों
की लड़ियों से
गढ़ी
नीक नीक , ढेर -सी
चांदी की बाली ,,,,,,,,,
और अब
अंग अंग
धारे बैठी है
जोहती बाट
पहली मद्धिम बरसात की ! ! !
मै तो निरखूं
तुम्हें ही
ओ अकेली ! विलग, मुदिता
भरा बदन ,
गाढ़ मन ,
क्वारी नीम की डंठल !
Wednesday, March 24, 2010
जानता हूँ पर .......
यह रास्ता कहीं नहीं जाता
फिर भी चल रहा हूं ।
जानता हूं
आगे कुछ नहीं है
फिर भी इसी पर
ढल रहा हूं ।
है अस्वीकार का साहस ।
प्रतिरोध की शक्ति है ।
जानता हूं हासिल हर जोड़ का
शून्य है
फिर भी
स्वयं को कर
एक विलम्बित मौन-सा
इस ही राह पर
बिछ रहा हूं………..
जानता हूं पर चल रहा हूं ………
Sunday, March 14, 2010
दिनों बाद .........
Wednesday, March 3, 2010
प्रेम दीक्षा

शिशिर !
न मालूम था
मुझे कि
दिन दिन
पल पल
रव रव
तुम्हारे दुलार के
सान्द्र सोम में
छका है
पगा है
डूबा ,
उतराया है !
यह आम्र वृक्ष !
न मालूम था
मुझे कि
स्नेहातुर लजीले
तुम्हीं ने
फैलाकर बहुत बार
गाढ़े शुभ्र कोहरे
की यवनिका
इस तृषित ढीठ
आम्र वृक्ष से
बहुत देर तक की है
एकान्तिक प्रणय केलि !
और इस नश्वर प्रणय के
क्षणिक व्यापार में ही
किया है दीक्षित उसे
निर्धूम
निःशब्द
अव्यय
प्रेम-शिखा-संकुल में ! ! !
न मालूम था मुझे
लेकिन
देखो ! ! !
वह भोला !
वह ढीठ !
तुम्हारी इस
दारुण विदा घड़ी में
कैसा भकुवाया ,
चुप है !
अब तुम नहीं होगे
पास उसके !
इस ताप में
दह रहा है !
खुद को
मह रहा है !
इतने दिनों
सिखाया है जो
प्रेम तुमने
वह अब
इस अन्तिम घड़ी में
हरे गमकते
बौरों के
गदराये छन्दों में
कह रहा है !
Wednesday, February 24, 2010
केसरिया मन

खो जाऊं !
बोझिल तन !
स्नेहिल मन !
निढाल सब छोड़ू !
मिट जाऊं !
लेकिन फिर ……….
सांझ थोड़ी देर तक की
तुम्हारी संगति याद आती है -------
तुम्हारे सानिध्य का केसर
अभी तक
मन की देह पर बिखरा हुआ है !
तुम्हारे सरल मधुर हास का चन्दन
अभी भी झींना झींना
आती जाती सांसों में गमक रहा है !
याद आता है तो कस्तूरी बन गया लगता है
विदा के अन्तिम क्षणों में
तुम्हारे उन पंकिल पलकॊं का
करुणामय आरोहण अवरोहण ! ! !
सदा रहेगा
चाह में तेरी
यह केसरिया मन ! !
Saturday, February 13, 2010
प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -2

धीरे धीरे होता है ।
एकदम धीरे धीरे ।
जैसे रात भिगोये गये चने से
धीरे धीरे निकलता है
चने में मौजूद पूरे प्रोटीन से बना
एक टुइंया-सा अंकुर !
यह प्यार
शुरु शुरु में प्यार नहीं होता
लेकिन परत दर परत
प्यार बनता जाता है ।
आप पा सकते हैं
जगजीत सिंह और गुलाम अली की गजलॊं में
इस तरह के प्यार के
तमाम शिलालेख !
एक प्यार
फटाफट होता है ।
एकदम फटाफट ।
जैसे बच्चों के खेलने वाले
बड़े गुब्बारे में
किसी ने चुभो दी हो
नुकीली सुई ।
यह प्यार
शुरुआत क्या
शुरुआत के पहले से ही
प्यार ही होता है !
इस प्यार में सब चीज –
आंखों के खुलने से लेकर
आंखॊं के बन्द होने तक
सांसॊं के अन्दर लेने से लेकर
सांसों के बाहर जाने तक,
सब!
बस प्यार ही प्यार होता है ।
अब संक्षेप में कहा जाय तो
दोनों प्यारों के
अपने अपने धन और ऋण हैं !
(हांलाकि प्यार के संविधान में तो
धन और ॠण सोचना सख्त वर्जित है,
तो प्रेमी जन माफ करें ! ! ! )
एक प्यार हेलीकाप्टर तो
दूसरा मिग – २१ है !
कहने का मतलब की
इसकी कुछ बातें उसमें
और उसकी कुछ बातें इसमें
ले ली जाय
तो
चांद तक पहुचा जा सकता है !
(अन्यथा तो कोई चान्स नहीं)
Thursday, January 28, 2010
प्यार: एक डायाक्रोनिक स्टडी-1

तरह तरह के होते हैं ।
किसी बीते हुये प्यार को
याद करना , पुनः प्यार से भर उठना
एक अलग प्यार है ।
किसी चल रहे प्यार को सोच कर
धीरे से मुस्कुराना , फिर तुरन्त
काम में व्यस्त हो जाना
एक अलग प्यार है ।
किसी दूसरे के प्यार को
देखकर ,दो बूंद
खुद के बारे में सोचना
एक अलग प्यार है ।
वे प्यार जो हुये ही नहीं
और वे प्यार
जो होते होते रह गये,
सब को सोच कर
मन में भर जाने वाला प्यार
एक अलग प्यार है ।
इसी तरह
एक नये प्यार की
सुकुमार व सुन्दर कल्पना करना ,
उस नये सौन्दर्य में खो जाना
एक अलग प्यार है ।
अब यहां
सब प्यार अलग अलग प्यार है ।
लेकिन
अच्छी बात यह है कि
सब
प्यार ही है ।
Sunday, January 10, 2010
बात

कुनकुनी पीली ,
चमकीली उत्फुल्ल,
धूप
सिर्फ धूप नहीं है ।
दरसल वह एक बात है ।
बात –
जो सूरज धरती से किया करता है ।
रोज रोज , हर रोज ।
उसके कई अर्थ हैं ।
अनेक भाव ,
गन्ध ,
भंगिमाएं ,
कहानियां हैं ।
धरती की छाती पर टंकी
छोटी से छोटी घास से लेकर
वृहद देवदारू व वटवृक्षों तक की
व्यथा कथाएं हैं ,
आत्माभिव्यक्तियां हैं,
उल्लास के गीत हैं ,
शोक के मौन आख्यान हैं,
सूरज जिन्हें
हर रोज चुपचाप
धरती से कहता सुनता है ।
दरसल
धूप की यह ऊष्मा
सूरज का दुख है !
प्राजंल मोदक हरितिमा से आवृत्त
ये वृक्ष
वस्तुतः
सूरज के स्वप्न हैं ।
सूरज
अपने गुह्यतम सुनसान तापगर्भॊं में
इन हरे भरे वृक्षों के स्वप्न -चित्र
संजो कर रखता है ।
Sunday, January 3, 2010
सब कुछ शेयर कर लेता हूँ !
कल दोपहर जब टुन्ना भईया ने फोन किया कि तैयार रहना शाम को अरविन्द जी के यहां चलना है तो लगा कि अब घुन के लिये “मैलाथ्यान ” का इन्तजाम हो जायेगा । ससुराल में पहली बार सबके लिये रसोईं तैयार करती, डरती , सकुचाती दुल्हन सी सांझ की शुरुआत में ही मैं लंका से नाटी इमली के लिये निकल गया । कैम्पस में , जहां तापमान हमेशा सामान्य से दो तीन डिग्री कम ही रहता है , काली साफ सड़कॊं के किनारे लाइन से खड़े ,कोहरे की सफेद चादर ओढ़े , पीले रोड लैम्पों का अलाव तापते , हरे पेड़ शेली का वेस्ट विंड गा रहे थे ………”इफ़ विन्टर कम्स , कैन स्प्रिंग बी फ़ार बिहाइण्ड ? ……।”
नाटी इमली चौराहे पर टुन्ना भईया एवं हेमन्त भईया पहले से ही थे । हम सभी अरविन्द जी आवास पर पहुंचे । वहां पहुच कर एक चीज का मैं बेसब्री से इन्तजार कर रहा था ---अगर वह थोड़ी और देर तक न आती तो ---मैं मांग ही बैठता ---लेकिन आ ही गयी – गरमागरम काफी ।
बातचीत शुरु हुयी । ब्लाग्स, ब्लागर्स एवं ब्लागराएं ।
ब्लाग जगत में जिन चीजों को लेकर बहुत गंम्भीर एवं पर्याप्त हो हल्ला मचा हुआ है उन पर अरविन्द जी को बोलते हुये सुनकर लगा कि वे इन सब चीजों में पूरी तरह संलग्न होकर भी सारी चीजों से एक स्तर पर एकदम पृथक हैं । किसी बात के बीच या अन्त में उनके जोरदार एवं भरपूर ठहाके मेरी इस ’सोचान’ को न जाने क्यॊं पुष्ट करते रहे ।
इन सब के दौरान हम सभी ओझा जी का इन्तजार भी कर रहे थे ।पहुंचने वाले तो वे चार ही बजे थे लेकिन बलिया से उन्होंने पैसेन्जर ट्रेन पकड़ ली और अपने आप को ऐसी परिस्थितियों में डाल दिया जहां उनकी धैर्य एवं सहनशीलता इत्यादि संचित उदात्त मनोवृत्तियों की पूरी परीक्षा हो सकती थी । …….(हुयी भी।)
बातॊं बातों में कुछ देर के लिये मुझसे मेरा प्रश्न कुछ विस्मृत सा हुआ था कि किसी बात पर अरविन्द जी ने कहा कि मैं किसी भी चीज को वैयक्तिक तौर पर नहीं लेता । जो चीज बाहर से मिली है उसे जी कर फिर पूरा का पूरा लौटा देना ही अच्छा समझता हूं । सब कुछ “शेयर” कर लेता हूं । सब सामने रख देता हूं । (फिर एक जोर का ठहाका !)
सुना मैंने । सुनता रहा ।
तभी फॊन आया कि ओझा जी की ट्रेन बनारस के सिटी स्टेशन पर आ गयी है । ड्राइवर(शैलेन्द्र) के साथ मुझे ही उन्हें रिसीव करने जाना है ।
रात के करीब बारह बजने वाले हैं बाहर ठण्ड सोलह साल की हो गयी है । बनारस सो गया है । कुहरा कम है । सर्द ठण्डी हवाओं से जलते कुत्तों के पिल्ले टें टें कर रहे है ।चलती गाड़ी में शैलेन्द्र मेरे जैकेट को कुछ देर तक बहुत ध्यान से देखता रहा । फिर बोला , आपको ठण्ड लग रही होगी , चाहें तो मेरा कम्बल ले सकते हैं । उसने देखा नहीं होगा लेकिन हल्की सी मुस्कराहट अनायास तैर आयी मेरे होठॊं पर । कुछ पन्क्तियां याद आ रही थी , उनके अर्थ भी स्पष्ट हो रहे थे धीरे धीरे----“(जीवन सर्वदा ही वह अन्तिम कलेवा है जो जीवन दे कर खरीदा गया है और जीवन जलाकर पकाया गया है और) जिसका साझा करना ही होगा क्योंकि वह अकेले गले से उतारा ही नहीं जा सकता—अकेले वह भॊगे भुगता ही नहीं। ”
Friday, January 1, 2010
सन्नाटा
Wednesday, December 23, 2009
अभी तो .......

का आयतन
वर्तनी की आकृतियॊं में नापता हूं ! ! !
भावना के पारावार में
खो जायेगें दुख भी जब
तुम्हारे स्मरण की विस्मृत मधुकरी तब
मन के वातायनॊं पर सजाउंगा !
खो चुके संसार के आर्द्र स्वप्नों को
अभी तो
संतप्त चेतना के ताप से भूंजता हूं ! ! !
उन्माद के संघनन में
झरेंगें जब पीत-पात स्वप्न भी तब
तुम्हारे अविरल नेह की रम्य बांसुरी धुन
हृदय तट के भाव चातकॊं को पिलाउगां ! ! !
Saturday, December 12, 2009
पुरस्कृत

भाव
जो मन में रहे ,
कभी शब्द न बने ,
वृंत पर पुष्प -से खिले ,
साँझ झरे नही,
अपने ही सौरभ में
लीन हो गए.......
उन्हें भी
जान लिया तुमने ,
हतप्रभ , अकिंचन मै
चढ़ा भी न सका उन्हें
ठीक से ,
फिर भी
मंदस्मित स्नेहिल स्वीकारोक्ति से
अर्पित उन्हें
बना लिया तुमने ! ! !
यात्राएं
जिनका साक्षी
समय भी न हुआ ,जिनकी गति
बहुत देर तक कलपती
अधूरी इच्छाएं
व तड़पते भाव- खग रहे
उन्हें भी
नाप लिया तुमने,
बिना मागें ही
सब दे दिया तुमने!! !
हारा मै , फिर भी
पुरस्कृत किया तुमने !
Friday, November 27, 2009
शब्द यदि झुक गए !

बध गये
छन्द में तो
“घनत्व” कैसे
करेंगे वहन ?
शब्द जब
ढल गये
छन्द में तो
झेलेगे कैसे
अपने अर्थों की
गुह्य अंतःक्रियायें ?
शब्द जब
झुक गये
छन्द में तो
सहेगें कैसे
वाक्य विन्यास की
कोठर--पैठी
नयी विकसती
अर्थ भंगिमायें ?
तब की बात
कुछ और थी ,
अब मामला
थोड़ा अलग है।
आनाजाना ठीक है
सांसो का, लेकिन
बीच बीच में
हिचकी हिचकियां
कौन कहेगा ?
नयी अराजकताएं
कौन धरेगा ?
शब्द यदि बध गये …..
शब्द यदि ढल गये …….
शब्द यदि झुक गये…….
Tuesday, November 24, 2009
फिर से
कविता की खोज में
Thursday, November 19, 2009
अ अस्वीकार

कि
वह करना,
उसमें होना,
गलत है ।
मैंने उसका निषेध किया ।
खुद को उसकी तरफ बहने से रोका ।
उसके प्रति भीतर अपने
वह स्वभाव रचा
जो
अनुभव
अनुभूतियों
व निष्कर्षों पर आधारित था ।
मैंने विजय पायी क्योंकि
अन्ततः
उसके और अपने अंतर्संबंधो का निर्धारक
मैं था !
अब , जब
मेरा उससे कोई लेना देना नहीं है
तो मैं
Sunday, November 15, 2009
प्रेम गीत

लिखूं सांझ की उतरती उदास धूप में
पीली रोशनी के वलय-सा जगमगाता कनेर !
लिखूं भॊर की पहली किरन को
रंगों के गीत पढ़ाता जवांकुसुम !
लिखूं निशा- वियोग- व्याकुल, वृन्त-प्रछ्न्न
उषा के नासापुटों का गन्धमादक श्वेत नारंगी पारिजात !
लिखूं दूब की पलकों पर रजत स्वप्निल तुहिन कन देख
शिशिरागमन संदेश प्रमुदित आम की चमकीली नयी कोपल !
सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत !
लिखूं चिड़िया !
लिखूं तितली !
लिखूं हवा !
और
फिर
धूप ! ! !
Thursday, November 12, 2009
मै बस देखूगा !
Friday, November 6, 2009
अवसाद के दिनों में सच !

चहुं ओर हमारे
खड़ा बैठा चलता दौड़ता
कि हम सह नहीं पाते हैं
फट फट जाते है
माया मिथ्या आभास
कह कह उसे टरकाते हैं !
किनारे बेवकूफॊं जैसा
चुपचाप खड़ा
अपने पातॊं पर
बिलखले आसमान के
घनीभूत दुखॊं को समोता
न हसता न चिचियाता
अनभिप्रेत खड़ा पेड़ ! ! !
टाईट जीन्स ठिक ठाक टी शर्ट पहने
वक्ष उदर को विकर्ण में काटते
टंगने वाला बैग लटकाये
हाथों में मोबाइल और रुमाल लिये
खुद से शुरु और खुद पर खत्म
सड़कों पर बेलौस फड़फड़ाती
अर्थहीन लड़कियां ! ! !
इन्हें सूंघकर
बहुत दिनों से पेचिश के रोगी
भूखे-प्यासे-मुचमुचाये- हड्डियाये
अस्थिशेष-मरणासन्न पिल्ले जैसी
किसी अनादि इच्छा का
धीरे से …….टूं से कूकना…….
और फिर चुप हो जाना ! ! !
दृश्य कला संकाय के
हद तक अव्यवस्थित झालेदार
सीड़ बस्साते स्टोर रुम में
पेप्सी-कोला की मुड़ी तुड़ी
टिन व प्लास्टिक की खाली बोतलों को
छड़ के ढ़ाचे में
अटका अटका कर बना आदमी !
हाथ-पैर-पेट-पीठ चिपकी हुयी खाली बोतलें
जोड़,,घुटने गरदन और कोहनी के कसे हुये छड़
एकदम श्लथ ,
न आक्रोश , न दीनता !
सच है !
सब स़च है !
(जन. 2008)
Monday, November 2, 2009
तुम्हें देखें !

मुझे तो नहीं पता
लेकिन लोग कहते हैं कि
अब मैं कवि हो गया हूं !
मैं तो बिलकुल भी
ठीक से नहीं जानता कि
ये कविता क्या होती है
लिखी कैसे जाती है
लेकिन लोग कहते हैं कि
अच्छा लिखते हो तुम !
तो जो कुछ भी हो
असली मामला , वह छोड़ो !
बस, तुम
किसी दिन आराम से
आऒ
और थोड़ी मेहनत से
मुझे यह आदत सिखा दो कि
जब भी लिखूं
कोई भी वाद , विचार लिखूं
भाव लिखूं , अर्थ लिखूं
तो तुम्हारी तरफ ही मुंह रहे
और लोगों की तरफ पीठ !
लिखकर जब भी आंखें उठे
तुम्हें देखें !
Saturday, October 31, 2009
सपने

बिखरते हैं सपने
प्रतिकूलताओं के प्रस्तर खण्डों में दब
कलपते हैं सपने
तड़पते हैं सपने
मरकर भी कहां मर पाते हैं सपने
कभी भूत तो कभी जिन बन जाते हैं सपने
तब अक्सर ही सच्चाई की लाशों
डराते हैं ये भूत सपने
धधक चुकी आग में
अन्तिम चिनगारी- से टिमकते हैं सपने
कभी बादल से पानी
तो कभी महुआ बन पेड़ों से गिरते हैं सपने
हर चोट पर
जख्म का बहाना बना
बिना कुछ कहे
चुपके से उग आते हैं सपने
Thursday, October 29, 2009
प्रभाव

खूब प्रभावित हो जाना
कोई बड़ी अच्छी बात नहीं है ।
तुम अत्यन्त प्रतिभाशाली
महान व विचारवान हो !
तो इससे मुझे
कॊई फर्क नहीं पड़ जाता !
तुम्हारा यश एक दिन
फैलेगा दुनिया के कोने कोने में
और लाघं कर काल की सीमा
सदैव जिन्दा रहोगे तुम
अपने विचारों में ,
तो इससे मुझे
कोई फर्क नहीं पड़ जाता ।
मैं तुम्हें
देखता हूं
सुनता हूं
गुनता हूं
और मानता भी हूं
लेकिन तुम्हारा सच
मेरा सच नहीं हो सकता ।
फुटकर प्रेरणायें
मन को कमजोर करती हैं ।
मुझे अपनी क्षुद्रता
स्वीकार है ।
Monday, October 26, 2009
दोस्ती
Friday, October 23, 2009
क्यों धूप क्यों !

आजकल हर सांझ
जाने से पहले तुम ,
इतनी गहरी पीली
जर्द
क्यों हो उठती हो ?
क्यॊं
पेड़ों के मटमैले हरे झुरमुट से रिसकर
पीछे दीवार के पर्दे पर पड़ते
तुम्हारे
निर्वाक व निमीलित बिम्ब
इतने घने, प्रगल्भ
व प्रगाढ़ पीत हो जाते हैं
कि
अनिमेष उन्हें देखते देखते
तन्मय मैं महसूस करने लगता हूं
सृष्टि के उन बिल्कुल आदिम शुरुआती दिनों के
उस प्रथम पुरुष की आहट
अपने भीतर !
धूप !
तुम्हारे इस अद्भुत शान्तिमय
निःशब्द पीलेपन पर
मैं अचानक
बहुत कुछ ---कुछ बहुत ज्यादा ---विशाल व सुन्दर ---
कह देना चाहता हूं !
शब्दों में भर देना चाहता हूं !
लेकिन
क्यों ?......... धूप !!! ?
बहुत छटपटा कर भी
बहुत खॊजबीन कर भी
अन्ततः
मैं कुछ कह नहीं पाता !
तुम्हारी उस
भव्य पीत निस्तब्धता की
मधुरिम लय को
जो बांध सके
ऎसे शब्दों की श्रृंखला
सिरज नहीं पाता !!!
क्यों धूप क्यॊं ?
Tuesday, October 20, 2009
Wednesday, October 14, 2009
Monday, October 12, 2009
10 अप्रैल 2009 (डायरी से .......)

जिन्दगी शायद बिना किसी कारण के भी जीयी ही जा सकती है । बस ऐसे ही जीना……….. । कुछ आभास , जो परिस्थितियों द्वारा निचोड़े जाने पर हममें सिलवटॊं की तरह बच गये हैं और जो हमें सदा अनिश्चित ढ़ंग से किसी निश्चित दिशा , किसी तरफ ढकेले जा रहे हैं ……………वे किसी “कारण” के रूप में नहीं देखे जा सकते । वे हैं और वे चीज़ों को पैदा भी कर रहे हैं लेकिन वे कारण नहीं हैं । वे इतने नीचे हैं कि इतने उपर घट रहे किसी कार्य से कारण के रूप में उनका कोई सम्बन्ध नहीं जुड़ सकता ।
Tuesday, October 6, 2009
कृत्रिम.....नहीं ...सृजित !!!!

Saturday, October 3, 2009
गोल्डिग ! वे बच्चे नहीं थे ! *

वे बच्चे नहीं थे ,
गोल्डिंग ! ! !
मैं कहना चाहूंगा तुमसे
कि जिन्हें
छोड़ा था तुमने
उस निर्जन सुनसान
प्रौढ़ रहित द्वीप पर
वे बच्चे नहीं थे !
वे मात्र
परावर्तन थे
“विकसित” “आधुनिक” व “सभ्य”
मानव की उत्क्षिप्त ,
विकराल व भ्रष्ट अवधारणाऒं के ।
जिन्होंने
अपने बालपन के
सहज सारल्य व
नैसर्गिक सौन्दर्य की अनुपम सुषमा
को बिसारकर कलुषित करते हुये
तुम्हारे रचे उस स्वप्न द्वीप में
मानवीय अन्तःस्थल स्थित
सहजात पाशविक विषण्णता का
पुनरारम्भ किया ,
वे बच्चे नहीं थे ,,,,
वे बस
उन स्मृतियों के विकास मात्र थे
जिसमें मां ने पहली बार
अस्वीकार की थी उनकी कोई मनुहार
और प्राप्त हुआ था उन्हें
बर्बर झिड़कियों से युक्त
एक हिंसक प्रत्युत्तर ! !
पारस्परिक विद्वेषों व
आन्तरिक स्वार्थों के वशीभूत हो
जो अन्ततः करने लगे थे
एक दूसरे की नृशंस हत्यायें ,
वे बच्चे नहीं थे !
वे बस
उन प्रकियाऒं के विश्लेषण मात्र थे
जिसमें
एक छोटी सी गलती पर,
कक्षा में उनकी द्वितीयता पर
पिता ने तोड़ दी थी
क्रूरता की सारी हदें
और दिया था उन्हें
हिंसा एक नवीन संस्कार !!!!
वे बच्चे नहीं
मात्र
परावर्तन थे ।
*यह कविता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “सम्भावना” ,मार्च २००७ में छप चुकी है । यहां थोड़े से सुधार के साथ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं।
Thursday, October 1, 2009
सत्य के साथ प्रयोग अभी जारी है !!!

मुरचहे टीन की छत , पोलीथीन की दिवारें !
जुलाई महीने की सड़ी उमस भरी रातों में
आसपास की बजबजाती नालियों में जवान हुये
मोटॆ मटमैले मच्छर
चीथड़ों से बार-बार उघर आती
उसकी टांगॊ को
बड़ी आसानी से सूंघ लेते है ।
सामने टाट पर
बगल के भव्य मकान की
यहां तक पहुच रही मध्दम पॊर्च लाइट में
रिक्शा चालक
उसका दारूबाज निकम्मा
सूखे सैजन जैसा बाप
पसरा रहता है और
उसकी पतली टागों पर
लिपटी चिचुकी चमड़ियों से
थोड़ा और खून चूस लिया जाता है ।
वह छटपटाता है ।
दर्द से बिना आवाज चिल्लाता है ।
…….लेकिन जोर से रोता नहीं ।
जोर-से रोता नहीं
इसलिये नहीं कि रोकर वह
बल्ब के आसपास फडफडाते
बेवजह दो चार झापड़ खाना नहीं चाहता ।
इसलिये नहीं कि
बार बार रोने के लिये भी
दम चाहिये ,
छाती में अन्न का जोर चाहिये !
इसलिये नहीं ………
वह जोर से रोता नहीं क्योंकि
वह प्रयोग कर रहा है ।
बधायी हो गांधी जी ! ! !
सत्य के साथ प्रयोग अभी जारी है ।
घाटी की सफेद सुर्ख बर्फ को
डर है कि कहीं वह
“लाल ” सोखते सोखते
अपनी सफेदी न खॊ दे !
रंगीन खुशमिजाज पक्षी सब सोच में हैं
कि बच्चे उनके
सुमधुर नैसर्गिक कलरव के बजाय
कहीं बन्दूकॊं व बमों की तड़तड़ाहट सा
बोलना न सीख जांय !
मुम्बई में ताज के बाद अब
दूसरे बड़े होटल
अपनी बारी के इन्तजार में हैं क्योंकि
हमले का मास्टर माइण्ड अभी वहां
कुछ राजनैतिक शिरकतों में व्यस्त है !!
इन सब के बावजूद
बातचीत जारी है ,
माननीय जन लगे हुये हैं
ब्याह में बचे खुचे पत्तल चाटते कुत्तों--सी वार्ताऎ
निरन्तर है !!
बधायी हो गांधी जी !
सत्य के साथ प्रयोग अभी भी जारी है ।
Friday, September 25, 2009
Monday, September 21, 2009
क्योंकि तुमसे मैं प्रेम नही करता

यह समय
तुम्हारे आने का था !
और तुम
नहीं आये !!!
वैसे तो व्यस्त था मैं
अपने कामों में –
जैसे रोज रहा करता हूं
लेकिन फिर भी
मेरे अन्दर से कहीं
कोई भीतरी अदृश्य देह
बार बार
मेरी इस देह से निकल
बाहर उस सीढी़ की तरफ़
ढ़ुलक ढ़ुलक जा रही है !
हर बार खुद को बांधता हूं कसकस कर
खेत में पानी बराते नाना
कहीं और हुलसते पानी पर
तावन बांधा करते थे जैसे ।
जरा भी नहीं चाहता मैं
कि तुम्हारे इन्तजार जैसा
कुछ भी करूं,
तुम्हारी किसी भी आहट को
अपने भीतर सुनुं,
और तुम्हारी आज की इस
आकस्मिक अनुपस्थिति से निर्मित
इस फैलते शून्य को
अपने भीतर
और वृहद होने दूं ,
जरा भी नहीं चाहता मैं ।
क्योंकि
तुमसे
मैं प्रेम
नहीं करता—
थोड़ा सा भी नहीं , बिलकुल भी नहीं ।
क्योंकि कुछ भी नहीं होता इससे
कि हम रोज मिलते हैं,
बतियाते हैं हसते हैं ठिठियाते हैं ,
एक दूसरे की जिन्दगी को
मूंगफली के खाली ठोंगों की तरह
इधर उधर फेंकते हैं ।
मार्च महीने की
कुनकुनी ताजी ,
शिवमूरत हलवाई की
एक घुच्चड़ मस्त चाय जैसी सुबह में
सड़क के किनारे घास चरते
तन्मय , निर्लिप्त
दो बकरी के चमकीले मेमनों जैसे
या फिर
पूरा जीवन साथ बिताये
परस्पर किसी भी आकर्षण से रिक्त
दो थके बूढ़े बुढ़ियों की
किसी छोटी सी बात पर
प्रसन्न,
हल्की-सी मुस्कुराती
एक दूसरे से मिली आखों जैसे
हम
कभी कभी एक दूसरे के होने में
थोड़ा बहुत शामिल भी हो जाते हैं ।
(लेकिन)
सच कहता हूं
कुछ भी नहीं होता इससे !
मेरी नसों में रेगती रहती है एक टीस
जैसे गंजी के नीचे घुसी हो कोई चीटीं
की रिश्ते
सुखाये और पीटॆ जा चुके धानों के
बचे पुआलों के
हुमच हुमच कर कसे गये
बोझ होते है
घुरहू काका जिसे
ठेघुनियां ठेघुनियां कर बांधते हैं
और भूसे वाले घर में पटक आते हैं ।
इसलिये
प्यार व्यार कुछ नहीं करता मैं तुम्हें
और अपने भीतर दाद की तरह फैलते
इस खाली शून्य को
और फैलने से रोकना चाहता हूं ।
तुम नहीं आये तो क्या !! !
अभी और बहुत काम है मुझे ।
(दिस.२००८






