Saturday, October 28, 2017

धर्म और काव्य

तथागत !
मिलोगे कभी फिर
तो सुनूंगा मैं
तुमसे​ तुम्हारी
वह पुरानी कविता ...

"जीवन
दुख है."

और फिर
कहूंगा तुमसे
कि
इस छोटी सी कविता में
मुझे मिला बड़ा सुख है।

धर्म
जब काव्य से छूटता है
तो
टूटता है
उद्धत होता है
कट्टर होता है !

गीत की भाषा में ढलकर
दुख
ईश्वर
जीवन
सत्य
सब वहनीय हो जाते हैं !
सौम्य हो जाते हैं !

Thursday, October 19, 2017

रेत

कुछ रिश्ते
रेत से होते हैं
बिखर ही जाते हैं
सम्हालते सम्हालते !

Wednesday, October 18, 2017

मैं गाऊं
चिड़िया के कण्ठों से
प्रकृति-उत्सव के​
अनहद गीत !


Monday, October 16, 2017

रोज की कहानी

हम सब की
रोजमर्रा की कहानी
हम सब पर
एक जिम्मेदारी होती है।

उसे
कह देना
उससे
निवृत्त हो लेना है।

प्रेम-विवाह

आज
पूरी हुई हमारी
बरसों पुरानी
प्रेम कहानी
(१)
आज
तुम्हारे किसिम किसिम के
प्लाजो दुपट्टे कुर्ती फ्राक
अंट गये मेरी हैंगर अलमारियों पर
खो से गये  हैं मेरे दो चार
इधर उधर टंगे रहने वाले बेचारे कपड़े !
(२)
आज
तुम्हारे टूटे हुए बाल
बिखरे पड़े हैं यहां वहांइस फ्लैट में
नहीं कोई ऐसी जगह  जहां वे हैं नहीं
बहुत तेजी से झड़ रहे
केशकाला भी होता दिखे है बेअसर !
(३)
अब
पुराने बैचलर किचन में
जाने पर लगता है जाने कहां आ गए हैं
बदल गई शकल सब डब्बी डिब्बों की
उनकी संख्या में भी हुआ है भारी इजाफा
किसमें गरम मसाला किसमें  पीसी धनिया
मजाल कि अब मैं यह बोध पाऊं
रहस्य है चहुं दिस घनेरा !
(०)
यही तो प्रेम की परिणति सुखद है प्रिये
जब बह चली है झाग सी
वो पुरानी  झूठी नफासत
बाथरूम में मेरे  शर्ट धुलती
तुम कहां कम  किसी​ अप्सरा से

बच बचा कर जिस खूंखार मां से 
मिला करते थे हम  नेस्कफे में
मेरे सामने ही उसी मां से
गूथते गूथते आटा
तुम करती हो फोन पर
घंटा घंटा भर गल-चऊर !
यही तुम्हारे शब्द तो
हरसिंगार है 
झर रहे हैं 
अशोक की कलिंग विजय पर 
देवताओं के आशीर्वाद रूप ! 

Friday, October 13, 2017

अलल बलल

मन:
ज्यादा कविता लिखने से
दिमाग कमजोर हो जाता है,
कामन सेन्स चुक जाता है
सच में !
अलल बलल कुछ भी छेरते रहना सृजन नहीं है।
कहा है किसी बड़े आदमी ने
"लेखन खून थूकने के समान है"

अ-मन:
तो आप अपने आप को काफ्का समझते हैं ?
आप लेखन का मानक तय करेगें ?
मूढ़ मति पापी मनुष्य ! 
वो जमाना गया ! 
रोज फेसबुक पर दो कविता ठेलो 
रात मूर्गे की गरम टांग के साथ 
ब्लेण्डर के दो पाग बढ़ाओ
रात में जम के सेक्स 
फिर सुबह 
गरीबों की चिन्ता 
देस समाज धरम करम की चिन्ता 
यही सृजन का सार है 
बाकी सब निराधार हा !

तथास्तु ! 



Thursday, October 12, 2017

पिशाचिनी

संसार
भाषा है।

भाषा
माया है।

भाषा ही
भ्रम देती है
बंधती है उसमें
जो है ही  नहीं

स्वयं के छद्म विवरण
को विस्तार देती है
संवाद का आभास रचती है

पिशाचिनी !

Sunday, October 8, 2017

फुग्गे जैसी

जब हम किसी को देखते है
आंखों​ से
तो हम देखते हैं उसके
हाथ पैर
नाक आंख
घुटने गरदन

और इस बीच
हम
पूरी तरह
भूल जाते हैं कि
उसमें एक आत्मा
भी रहती है

फुग्गे जैसी

Friday, October 6, 2017

इतिहास एक क्रम है


इतिहास एक क्रम है
एक गति है
किसी समूह की काल सापेक्ष यात्रा का
जबरदस्ती लिखा गया
अभिलेख ! 

इस निर्वैयक्तिक विप्लवी प्रवाह में
हमें चुनना होगा
अपना प्रस्थान बिंदु ,
चुनना होगा
अपना राज्य
अपनी सेनाएं
अपने पुरोहित
अपने शत्रु .

हर व्यक्ति के लिए ऐतिहासिकी अलग है।
जन्म पूर्व गर्भ में
बनते हुए भ्रूण की कई परतों में
एक अदृश्य परत है ऐतिहासिकी !
पुरानी यात्राओं के संस्मरण !

हमें चुननी होगी
अपनी यात्राएं

Thursday, October 5, 2017

लोकतंत्र का मुलजिम

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लोकतंत्र का
असली मुलजिम पकड़ा गया
खेत में हल जोतते
ठेला पर लहसुन पियाज बेचते
रिक्सा चलाते
सीमेंट बालू जोड़ते
मुलजिम जकड़ा गया

इसी ने दुबारा दिया भोट
छब्बे बिधायक को दू पाकिट ठर्रा के बदले
दुबारा जीतकर बिधायक ने
ऊठवा लिया तिरभुवन पतरकार को
और घोर के पी  गया
झुल्लन की गबरू जवान बिटिया को !
एफाईआर भी नहीं लिखा गया थाने में,
छब्बे बिधायक भी क्या करता
मुलजिम ने​ दिया था भोट
बनाया था माननीय

लेकिन आज पकड़ा गया !
सड़क के किनारे
बड़ी गोल वाली पाइप में गांजा पीते हुए 
जड़ें लोकतंत्र की 
और हुयी गहरी !