Wednesday, May 20, 2020

पुतली




by anupriya 





                                                    हमारी  पद यात्राओं की थाप से ही 
                                                    धरती घूमती है अपने अक्ष पर,

                                                    हम जहां से आये थे 
                                                    वहीं लौट जायेगे ,

                                                    रास्तों को अपनी कथरी की तरह मोड़ कर 
                                                    साथ ले जायेगें ,

                                                    स्वेद व रक्त की बूँदें जो रह गयी है वहाँ
                                                    वही हमारा अर्जन हैं ,

                                                    टूटे मटमैले खिलौने जैसे अपने बच्चों को 
                                                    हम वे सौंप देंगे 
                                                    और कहेंगे 
                                                    कि 
                                                    वे इसे अपनी आँखों में पुतली बनाकर पहन लें !

Saturday, May 16, 2020

मिट्टी

जब मैं नींद से जागा 
मैंने अपनी देह को मिट्टी पाया 

हाथ मिट्टी पैर मिट्टी पूरी देह मिट्टी 

मैंने अपनी आत्मा खोजनी चाही 
मुझे मिला 
थोड़ी सी नम मिट्टी का एक ढेला 

मैंने कहा मेरी भाषा कहा है 
कुछ भुरभुरी मिट्टी के टुकड़ों ने कहा 
यहाँ हैं 

मैं चकित था 
मैंने कहा 
मुझे वापस करो मेरे स्वप्न 

सूखी दूर तक बिखर सके 
ऐसी मिट्टी के एक टुकड़े ने कहा 
चलो मैं चलूँ तुम्हारे साथ ! 

मैंने कहा मुझे मेरी धरती वापस चाहिए 
उन्होंने कहा 
तुम्हीं धरती हो 
सूरज की आँच से बचे हुए अंधेरों को 
अपने कणों में रक्त की तरह फैलने दो !

Friday, May 15, 2020

गति

मैं डरता हूं

वह कवि होने से

जो अपने ही बिम्बों की फफूंद में

भटक  जायेगा.

 

जो खुद को

अपने कहे अर्थों का 

जिम्मेदार मानेगा.

 

जिसे विश्वास हो चला है भाषा में

शब्दों पर,

उनके पुराने अर्थों में, पूरा.


जो कविता को लेकर 

जाना चाहता है

एक स्थान से

दूसरे स्थान पर.

 

           मैं डरता हूं

Tuesday, May 12, 2020

हवा

हवाओं को पता है

इस दुनिया के सारे रहस्य

इसलिए ही
वे चुप और अदृश्य रहती हैं ।

हवाएँ धरती की आत्मा हैं ।


मिट्टी पहाड़ सूरज नदी आदमी

सब हवाओं के यहाँ गिरवी हैं ! 

Saturday, May 9, 2020

अभिव्यक्ति

लकड़ी में छुपी आग 

हवा में चिड़िया की उड़ान 

मिट्टी में पहाड़

पत्थर में समय 

देह में मौत 


अभिव्यक्ति का मतलब 
हमेशा व्यक्त हो जाना नहीं होता ! 

जिम्मेदारी

भूख के लिए ज़िम्मेदार ठहरायी गई 
रोटी ! 
जीवन की दुर्घटना के लिए 
किया गया कटघरे में खड़ा 
हवाओं को ! 

नदी ने जब अपनी बात कही 
तो माना गया उसे बाढ़ 

कोयल ने मोर ने जब चींख चींख कर 
त्रासदी की चेतावनी दी 
उन्हें बताया गया सौन्दर्य के अप्रतिम गीत ! 

सागरों ने जब छोड़ दी थोड़ी सी ज़मीन सूरज के लिए 
किसी ने कहा इसे अपनी विजय ! 

Friday, May 8, 2020

ईश्वर की पालिटिक्स

उसके बनाये लोग 
जानने न लगे एक दूसरे को
इसलिए उसने गढ़ी भाषा 

प्रेम में हारे 
तमाम लोग 
उसे तलाश न लें एक साथ
इसलिए उसने खड़े किये 
पूजाघर 

उसके हाथों से बाहर 
न सरक जाय ये दुनिया 
इसलिए ही 
ईश्वर ने बनायी भूख !

भूख भाषा और सुरक्षित रहें पूजाघर 
इसलिए उसने चुने राष्ट्राध्यक्ष 
खोदीं सीमाएँ , खड़ी की सेनाएँ
हत्याओं को किया महिमामण्डित 


ईश्वर ! कैसे बने तुम क्रूर इतने ? 
आख़िर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है ?

Wednesday, May 6, 2020

अन्तहीन कथाओं की तलाश

Image from internet

कोई पुरानी इमारत
कोई पिछले जमाने का किला
कोई ऐतिहासिक खण्डहर

ये सब
समय की चादर में
बारीक सुराख से होते हैं.

इनके पास से गुजरते हुये
इनमें से होते हुये
हम अतीत की किसी आधी अधूरी कहानी में
कोई पात्र बन कर
अपने को ही पहचान लेना चाहते हैं


हजारों साल पहले तराशी गयी
किसी खिड़की को ताकते हुये
वस्तुतः हम खोज रहे होते है कोई रास्ता
सशरीर वापस लौट जाने का.

नहीं  ,यह अतीत का आकर्षण नहीं है.
गुलमोहर की डाल पर फुदकती
गौरैया भी जानती है समय एक चादर है  घने धुऎं की

हमारे लौट जाने की आस
अन्तहीन कथाओं की तलाश है.  


Sunday, May 3, 2020

बरसात जब होती है

Pic From https://paintingvalley.com/rain-drawing

बरसात जब होती है
सड़कें गलियां मिट्टी
सब भींग जाते हैं.
हर तरफ हर चीज नम
घिरे बादल ठण्डी हवायें
सब शान्त होता है.

मन ऐसे में भूल जाता है
समय के अनुशासन
स्मृति के तारतम्य ,
पुरानी बरसातों की
तमाम यादें
कर देता है घालमेल.

लगता है अचानक
कि अरे ये वही बरसात है
जिसने बचपन में
स्कूल के कमरे में
भर दिया था पानी
फिर गणित के अध्यापक ने कहा था
बाकी कल !
मन में फूट पड़े थे हुलास के
विकल झरने.

भान होता है
यही पानी की छीटें
करती थी घोषणा
कि कच्चे हरे आम
अब रसीले पीले होगें
और व्यग्र बालक कोई
स्मृतियों में
कर रहा होगा  घर में
आम की पहली खेप के लिए फसाद !

बरसात जब होती है
मन की परतों में वह गांव
जहां सारी पगडंडियां मिट्टी थी
नम हो ऊपर सरक आता है.

तरबतर हुयी मड़ई से
टपकता मटमैला पानी,
अपने मटमैलेपन में भी
एकदम साफ पानी
जमीन पर नीचे जो गढ्ढे बनाता था
उसकी सीधी रेखा का रहस्य
उनकी एक सी गहराई
आज भी विस्मित करते हैं.

शाम की लालटेन के
टिमटिमाते पीले उजास में
मढ़राते ढेर सारे भुनगे-पतंगों साथ
आग में भूनी भींगी मटर
पीसे मिर्चे साथ खिलाने वाले
वो बूढे बाबा न जाने कब के
खत्म हो गये !
बरसात जब होती है
फिर से पास आकर
इस तरह किसी बरसाती सांझ
मुझे अकेले पाकर
बहुत दूर के किसी अनजाने गांव में
घटा कोई रहस्यमयी किस्सा सुनाते है.

अब भी, बरसात जब होती है.


Friday, May 1, 2020

दिशाएं

ईश्वर 
अकेला होता हुआ 
प्रेम है ।


प्रेम 
दुनिया की लौटता हुआ 
ईश्वर है । 


वैरागी को वहम था
कि उसे ईश्वर चाहिए !