कुछ कविताएं
दुख में लिखी जाएंगी
उससे इतर
किसी अन्य दुख में
पढ़े जाने के लिए।
जिन्हें जवाब देना चाहिए
वे प्रश्न पूछ रहे हैं।
जिन्हें कटघरे में खड़ा होना चाहिए
वे निर्णय लिख रहे हैं।
जिन्हें चुप रहना चाहिए
वे लगातार बोल रहे हैं।
यही मेरे देश का लोकतंत्र है।
सरकारें हो या आम आदमी
यही मंत्र है
बातें बहुत बड़ी बड़ी
काम के नाम पर गोला !
बहुत बेहतर है
रोजमर्रा के कामों में
इतना अधिक व्यस्त हो जाना
हर रोज
कि
उनसे बात करने
उन्हें याद करने की
फ़ुरसत ही न हो
जिनसे
कभी प्यार था
अब नहीं है।
अथाह विस्तृत यात्राओं में
अपने अकेलेपन के साथ
अकेले होना ।
चलती गाड़ी की
खिड़की से
सूदूर शांत क्षितिज
तकना।
किसी खो चुके
ईश्वर की याद में
उदास होना।
यही सब करता हूं
कभी कभी मैं
अपने होने
अपने अस्तित्व की चहारदीवारी
पर बैठ
बाहर देखते हुए
चाय पीते हुए।