#ध्यान कविता
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मकड़ी जैसे
निहारती है कभी कभी
अपने बुने जाले के किनारे जा कर
बाहर बिछी हवा की चट्टानें
वैसे ही मैं
यदा कदा
बहुत धीमी सांस
चढ़ आता हूं अपनी बुनी
अन्धेरे की दीवार पर
देखता हूँ उस पार, डरा सहमा
समय की ठोस बिखरी हुई चट्टानें
कल, आज, भविष्य, बहुत पहले, बहुत बाद
सब
यहां वहां पड़े रहते हैं
टुकड़ो टुकड़ो में धूल खाते!
निहारती है कभी कभी
अपने बुने जाले के किनारे जा कर
बाहर बिछी हवा की चट्टानें
वैसे ही मैं
यदा कदा
बहुत धीमी सांस
चढ़ आता हूं अपनी बुनी
अन्धेरे की दीवार पर
देखता हूँ उस पार, डरा सहमा
समय की ठोस बिखरी हुई चट्टानें
कल, आज, भविष्य, बहुत पहले, बहुत बाद
सब
यहां वहां पड़े रहते हैं
टुकड़ो टुकड़ो में धूल खाते!
समय की चट्टानें मोम की बनी होती हैं!
