तुम्हारे शब्दों में
कुछ फूल हॊते हैं !
उन्हें छूकर
मैं जाग जाता हूं !
जगाओगे नहीं मुझे ?
निष्ठुर !
तुम्हारी चहकन में
कुछ रंग होते हैं !
उनके परस से मैं
बहक जाता हूं !
बहकाओगे नहीं मुझॆ ?
पाथर !
इन रंग और शब्दों से
मेरी सांस बनती है !
आंखॊं में चमक पिघलती है
और
बातॊं में खनक फटकती है ! !
लेकिन तुम .......
चुप हो अब भी ?
कुछ तो कहो
निर्मोही !





























