Friday, February 27, 2009

कवि

अभी रुको थोड़ी देर ।
धैर्य धरो ।

आने दो वे मुहूर्त
जिनमें तुम्हारे
अन्तर्जगत
और
वाह्यजगत
के सब भेद
मिट जांय ।


तब तुम
अपने को कवि कहना ।

मैं तुम्हारे चरण धोकर पियूगां
और
सभ्यता समय के पथ पर
अपनी गति के बारे में
तुम्हारे इंगित की बाट जोहेगी ।

Wednesday, February 25, 2009

परावर्तन

आज मुझसे
कहा तुमने
कि
“बहुत अच्छे” ।

तो
जरूरी नहीं
कि कहूं ही मैं तुमसे
“धन्यवाद” ।


क्यॊंकि
कभी अगर फिर
कहोगे तुम
“कमीने”
तो निश्चित ही
तुम्हें पीटकर
अपना वक्त जाया करने के बारे में
मैं नहीं सोचूगां ।


दरसल , कल ही एक जगह सुना है मैंने
कि नौसेना के कुछ परमाणु वाहक पोत
परावर्तित करने के बजाय सोख लेते है
राडार की खॊजी तरंगों को ।

Sunday, February 22, 2009

चौराहे

हार जीत
प्राप्ति अप्राप्ति
अवनति उत्कर्ष
सब बस एक चौराहे हैं ।


कुछ पल रुकना है ।
आगे का पथ निर्देशन लेना है ।
चल देना है ।


कहीं नहीं ....
कहीं भी नहीं .....
है कोई ठहरी हुयी उपलब्धि ....
कोई जीवित अगत्यात्मक स्थिति !
कहीं नहीं ।

एक समय सब कुछ को --श्रेष्ठतम को , निकॄष्ठतम को
बीत जाना है …रीत जाना है ।

पाने वाले और खोने वाले को अन्ततः
बस देखने वाला होकर
चलते चले जाना है !
चलते चले जाना है !
चलते चले जाना है!

Thursday, February 19, 2009

एक आत्मसंवाद .....


चलो छोड़ो!
बढ़ो आगे !
न रुको !

देखो उधर !
कितनों को जरूरत है तुम्हारी !
चाहते हैं वे कि पास रहो तुम उनके
उन्हीं के बन कर , उन्हीं की चाह में बधे हुये !


थोड़ा अपने को किनारे रखो !
भूलो अपने स्वप्न
अपने वे ऊंचे अभीष्ट ।

और .........
अब तो .........
वह भी लौट चुकी है....
नेह के सब उत्स अधूरे छोड़.....
अपनी एक ऎसी दुनियां में
वापस आना जहां से
कभी सम्भव नहीं होता......!!!


तो फिर.....
अब तुममें बचा ही क्या है ! ! ! ! ! !
झूठे स्वप्न ....भुलावे में रखने वाली इच्छाओं के
अलावा !

वसन्त की इस ऋतु में ,
चहुं ओर जब घनी हरियरी छायी है
बीच में सूखे पेड़ की ठूंठ बनकर
इस तरह खड़े रहना
अच्छा नहीं लगता !



अपने को दे दो !
जाओ ! उनके बीच
टूटकर जलो ,
उनकी ऊष्णता के लिये
अपने में बची अन्तिम आग
को भी
सौंपकर
राख होवो !

(फिर ,
पूरे सन्तुष्ट
किसी किनारे जमीन पर बिखरे बिखरे
सब कुछ बस चुपचाप देखते रहना ।
कोई तुमसे कुछ नहीं कहेगा ।)




Monday, February 16, 2009

परस

छुआ तुमने!!!

न जाने क्यों
भर आयी आंखें
और चुपचाप बह चले
एक दो गीले कन . ......

अश्रुपूरित नयन, विगलित मन
मैं बस विलोकता रहा तुम्हें , विनत.......

Sunday, February 15, 2009

किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र


किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र
लकड़ी के दरवाजे में नहीं
देह में
सुनो
कान लगाकर
अपनी सांस . .....
समय का घुन
अनवरत चर रहा है
तुम्हें.......

Friday, February 13, 2009

क्षणिकाएं

(0)
न भीचों कस कर ।
लिटा स्‍नेहिल अंकों में
बस दुलराओ !


(0)
हवा मैं
फूल तुम ,

मैं तुम में , तुम मुझमें !


(0)
सिन्धु से पूछो
दुष्करता ,
एक समर्पित स्वत्व के वहन की!

(0)
हवा चली ।
फूल
डोल उठा ।

(0)
किया नहीं जा सकता समर्पण
बस यह जाना जा सकता है
कि मै समर्पित हूं !

Wednesday, February 11, 2009

कविता की खोज में . ...

जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है
उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता ।


जैसे कल रात जल्दी सोया मैं
और सुबह ही मां ने जगाया ।
पूरे दिन सब कुछ वैसे ही चलता रहा …
कक्षाएं, बेमतलब की पढ़ाई, दोस्त और भटकनें ।

नहीं जन्मी कोई कविता ।

जबकि कल के उस दिन में
जिसमें सब ठीक ठाक गुजर गया !
पूरे दिन जगह जगह , यहां वहां
खोजता रहा मैं कोई कविता ।

हरे सूखे बड़े छोटॆ,हर पेड़ की
डाल डाल देख डाली मैंने
कि शायद बूढ़े -से आम की किसी डण्ठल पर
धीरे धीरे कहीं जाती लाल चूंटों की
एक तल्‍लीन पंक्ति दिख जाय
अथवा
निकम्‍मे-से ऊंचे ताड़ के झुरमुट में बया के घोंसले सी टंगी
कहीं मिल जाय कोई कविता ।

बहुत देर तक टहलता देखता रहा मैं …
दिन ब दिन तेज होते घाम में बड़ी बेरहमी से
खुरदुरी शुष्क निर्विकार रस्सी पर फैला दिये गये
जमकर धुले, चोट से कराहते ,साफ साफ,
कपड़ों को सूखते ।

पहुंचा मैं ऊंचे-से टीले के उस
पीछे वाले पीपर डीह पर भी ,
कि शायद आज भी कोई
अपनी अधूरी चाह की तड़पन का एक धागा
फिर लपेट गया हो वहां!

रास्ते में लौटते वक्त कहीं पर
कुंई कुंई करते , पीछे दौड़ते आ रहे
सफेद प्यारे गन्दे पिल्ले को थोड़ी देर रुककर
सहलाया भी , और चोर है कि साव ,
जांचने के लिये उसके कान भी खीचें ।

छत पर हल्का सा झुक आये आम के पेड़ में
गंदले धूलसने अनुभवी और निरीह-से पल्लव की एक पत्‍ती तोड़
उसकी पतली -सी डण्ठल को ऊंगलियों से पोछ
खूब मन से (मैंने) उसे कुटका भी
और उसके हल्के कसैले स्वाद को
थोड़ी देर तक चुभलाया भी ।

शाम को लंकेटिंग* के दौरान
अमर बुक स्टाल के ठीक सामने
ठेले पर सजने वाली चाय की दुकान पर
पांच रुपये वाली इस्पेसल चाय की छोटी सी गरम डिबिया थामें
पास ही में जमीन पर लगभग ड़ेढ फूट चौड़ी ,
सड़क के पूरे किनारे को अपनी बपौती -सी समझती हुयी
खूब दूर तक बड़े आराम से पसरी
लबालब कीच व तरह तरह के कचरे से अटी पड़ी ,
बस्साती गन्दी नाली में एक ओर
आधे डूबे , फूले , मटमैले पराग दूध के खाली पैकेट और
उस पर सिर टिका कर सोये -से
अण्डे के अभी भी कुछ कुछ सफेद छिलकों को
खड़े खडे़ कुछ समय तक घूरता भी रहा (मै ) ।


लेकिन . . . .. .
अन्ततः नहीं जन्मी कोई कविता
क्योंकि जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है
उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता ।

(इसके अलावा , इस खोज में )


बहुत देर तक नीलू के साथ
घूमता रहा (मैं) आईपी माल में ।
मैक डोनाल्ड में पिज्जा खाते ,
थर्ड फ्‍लोर के हाल टू में गजनी देखते
भीतर के गीले अंधेरों में,
सच में प्रेम करने वालों की तरह ही
हमने एक दूसरे को महसूस भी किया
और इण्टरवल में नेस्कफे के काउण्टर पर
एक दूसरे से सचमुच में यह बतियाते रहे कि
यहां तीस रुपये में कितनी बेकार काफी मिल रही है
जबकि कैम्पस में वीटी पर दस में ही कितनी अच्छी मिल जाती है ।

लेकिन . . .. .
आखिरकार. . .. नहीं जन्मी कोई कविता
क्योंकि जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है
उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता ।



*शाम को लंका (बनारस में एक स्थान) पर घूमने जाना ।

Sunday, February 8, 2009

रिश्ते

समय की नदी में
छोटी -सी नाव- से बहते हैं रिश्ते !

कभी भावनाओं की लहर ,
तो कभी
उलझन के थपेड़ों में
हुटकते हैं रिश्ते !

कभी
वसन्त के स्वागत में मन की बगिया में
नयी कोंपलों -से विंहसते है रिश्ते
तो कभी और खिंचाव न झेल सकी
तनी रस्सी-से छिंटक जाते हैं रिश्ते ।


कभी सब कुछ खत्म हो कर भी
बहुत कुछ बच जाता है!
और
कभी सब कुछ रह कर भी
कुछ नहीं रह पाता है ।


कभी
कोई टूटी दबी आस चींख पड़ती है
मन के अन्धेरों से,
कभी कोई फांस निकल आती है
भीतर की अतल गहराइयों से ।

कभी बहुत चाह कर भी
कोई प्रश्न उत्तर नहीं बन पाता है ।
और कभी हजारों उत्तरों के शोर में
मध्दम सा वो प्रश्न
अनसुना ही रह जाता है !

फिर भी ,
समय की नदी में
छोटी -सी नाव- से बहते रहते हैं रिश्ते !




Friday, February 6, 2009

सुख . . . .

सुख है ।
निश्चित तौर पर है …
सुख ।

लेकिन
वह कोई
पीपल के पेड़ -सा नहीं ,
जुगनू की अकेली टिमकन -सा है ।

वह
कोई बड़ी- सी नदी नहीं ,
बहाव से किनारे छिटकी ,
मन की घास के फुनगे पर अटकी
आधी भाप बन चुकी पानी की एक बूंद है ।

वह
रात के भींगे, घुप्प एकान्त नीरव अंधेरों में
रूई के फाहों -से, सहज निःसृत,
शान्त मध्दम गुनगुन
संगीतमयी, मिश्री जैसे में शब्दों हुयी
पूरी बात भी नहीं है ।
वह
बीच में आया , पहला और अन्तिम
अति लघु
वो क्षण है
जिसमें
अनायास झिप गयी थी पलकें
और जिसके बाद
बहुत देर तक बहुत से शब्द
ध्वनि की रस्सी छोड़कर हवा के फुग्गे में बैठ
चुप
पूरे शान्त
एक के बिलकुल भीतर से निकल दूसरे के सबसे निचले तल में
मौन झील की समर्पित थिर जलराशि में
धीरे धीरे डूबती किसी चीज जैसे
उतरते रहे हैं, प्रवेश करते रहे हैं,
और वातावरण में बिखरी हुयी
बहुत बहुत ही अचानक घनी हो चुकी
खूब खूब गहरी चन्दनगन्धी मिठास
ओस-सी संघनित होकर
बदराये मन के नील श्याम धुंधलाये अकास में
झिमिर झिमिर बरसने लगी है ।

Thursday, February 5, 2009

तरीके

बाहर के सारे लोग
मुझे अच्छा कहें और
मैं अपने को बुरा जानता रहूं ।
एक यह ।

बाहर के सारे लोग
मुझे बुरा कहें और
मैं अपने को अच्छा जानता रहूं ।
एक यह ।


बाहर भी सब अच्छा कहें
और
मैं भी अपने को अच्छा जानूं ।
एक यह ।


बाहर भी सब बुरा कहें ,
मैं भी
खुद को बुरा जानूं ।
एक यह ।

बस
और कुछ नहीं ।

हर कोई
कहीं न कहीं
इन्हीं के बीच है

या गुजर चुका है !


अपनी पहचान के बहुत से तरीके हैं ।
उनमें से एक यह भी ।
बस
और कुछ नहीं ।




Tuesday, February 3, 2009

चुपचाप बहता मै . . . ..

प्रौढ़ जाड़े की एक सुबह --
ठण्ढ़ी
पीली
और यूं ही खुश!


बेमतलब
कहीं जाता मैं।

टांग पसारे ,
गर्दन में मुड़ा सिर टिकाये
अधखुली आंख,
मस्त काली चमकीली बकरी ।।

गोबर की कीच में,
किसी दूसरी संसृति का स्वप्न देखता सा खड़ा,
शान्त , अनवरत पगुरीरत
भैंस का भोंदू बच्चा ।।


थोड़ी ही दूर पर ,
आधे बने बेकार- से नये घर के रस्सी घिरे अहाते में
छोटे मोटॆ पौधों की हरी झाड़ के बीच ,
मोटे तने वाला , हल्का सा टेढ़ा ,
काट दिये जाने पर फिर से खूब छितर कर पनपा ,
खुद से संन्तुष्ट सैजन ॥

रास्ते पर ही ,हल्का सा किनारे
स्कूल जाने के लिये सरकारी चापाकल पर,
कक्षा सात या आठ में पढ़ने वाला
चड्डी पहनकर जल्दी जल्दी नहाता
झूठ मूठ का एक लड़का ॥

बगल में,
कचरे से आधे पट चुके आधे हरे मैदान में
किसी फेंके गये लत्‍ते से खेलते ,
खीचा तानी में निमग्न
कुत्‍ते के नये तन्दरुस्त , प्यारे पिल्‍ले ॥


इन सबके बीच ,
धूप की अवसन्‍न पीली नदी में
सूखी लकड़ी के एक छोटॆ से डण्ठल सा
किसी भी संम्भावना और किसी भी प्रतिरोध से सर्वथा रिक्त
चुपचाप बहता मैं .. . . . . .. . . . .







Sunday, February 1, 2009

श्रद्धा और अहंकार

श्रद्धा और
अहंकार ।

एक नहीं है तो
दूसरा
होगा ही होगा ।

बच नहीं सकते तुम
कोई और रास्ता नहीं हैं ।

एक
मूंद सब द्वार ,
सड़ाकर
गला देता है !


एक
तोड़ सब बन्ध,
पिघला कर
बहा देती है !

बच नहीं सकते तुम
कोई और रास्ता नहीं हैं !

Thursday, January 29, 2009

प्रक्रिया

कभी कभी ऎसा होता है कि
पहले अनुभूति आती है- अस्पष्ट और अहेतुक!

फिर, बाद में, धुएं की सीढ़ी से नीचे उतरते हुये,
वह भाषा की बगिया में
शब्दों के फूलों पर
रंग व सौरभ सी बट जाती है !

लेकिन ऎसा होते समय बहुत बार
कोष यकायक ही समाप्त हो जाता है ,
बहुत से फूल रंगहीन और मृत ही पड़े रह जाते है !
और कविता बीच में ही अटक जाती है !

इसके विपरीत
अक्सर ऎसा होता है कि
सरसो के दाने सी एक छोटी सी महसूसन
शब्दों को समर्पित करता हूं!

मैं और उल्लसित शब्द मिलकर
बडे़ करीने से उसे गढ़ते है ,
भाषा के सोपान चढ़ते हैं !


महसूसन का वह भ्रूण
विकस कर पुष्प सा खिल जाता है ,
और अन्ततः
एक अच्छी कविता बन जाती है!

Tuesday, January 27, 2009

अब विदा दो !


पाथेय जुट गया है!!
ओ प्रिय!
अब विदा दो . . . . . .

पुष्प स्नेह का
जितना खिलना था, खिल गया है
अब, इसे चढ़ा दो.

गीत अब भी गीत है
फूल अब भी फूल है, विकम्पित स्वर मैं ही बस झर गया हूं.
अब, इसे इक फूंक में उड़ जाने दो.

बहुत सा पाना , बहुत सा खोना
बहुत से जन्म , बहुत से मरण
बस, अब तो रहने दो.

ओ प्रिय!
पाथेय जुट गया है
अब विदा दो. . . .

Wednesday, January 21, 2009

धरती और धूप

बदल रहे हैं धीरे धीरे धरती और धूप के रिश्ते! शायद इसी बदलने को मौसम का बदलना कहते है !
आज की धूप में वो कुछ दिनों पहले वाला संकोच नहीं दिखा!


नये नये रिश्ते में वो नजर बचाकर एक दूसरे को निरखना, और फिर अनायास ही एक बार कहीं छू जाने पर, बार बार छू लेने की वह कोमल नेह निमीलित ओस सी आस!

पास पास बैठे होने पर आदर भरे संकोच के स्मंभों पर टिका, लाज की नीली किरन की डोर से बुना एक दूसरे के बीच हौले हौले डोलता मध्दम शब्‍दों (कुहासे) का पुल!
सब आज कहीं पीछे छूटे- से लगते रहे !

और रिश्ते में अपनी निश्चितता के एक झूठे आभास से, भ्रम से, धूप का खुद में विश्वास कुछ ज्यादा दिखा! आम के एक प्रौढ़-से पेड़ की डाल पर बिलकुल आराम से बैठा हुआ, सामने के बड़े-से पीपल-मुहल्ले में,डाल की गलियों में आती जाती और पत्तियों की दुकानों पर खरीदारी करती हवा की लड़कियों को टूकुर-टूकुर ताकता, चाह की शक्कर घुली स्मृतियों की गरमागरम चाय पीता धूप का टुकड़ा, बहुत देर तक कुछ ध्दृष्ट सा लगता रहा!


शायद उस बेवकूफ को लग रहा है कि अब वह कहीं से भी, और कितना भी, छू सकता है धरती को...... . . . . . !

Monday, January 19, 2009

आदत



नश्‍वर है देह ,
मन और
हर वह कन जो जन्मा है ।

समय के पाश में जकड़ी , भंगुर है वो आभा
जो सुबह आज अकिंनच पुष्प में
विहस उठी है ।

विस्तृत सीमाहीन आकाश में तैरते हुये
एक छोटा सा कोना भी नहीं नाप पायेगा
वह लघु संगीत
जो आज सुबह उष‍स्‌ के स्वागतेय
चिड़िया के कण्ठ से पिघल कर बह चला है !

और
अन्ततः
लौट ही जायेगा वह निरपेक्ष प्रकाश
जो अनायास निर्मित लघु वातायनों से
अन्धेरे की प्यास लिये
चुपचाप सा अन्दर चला आया है !

और
एक दिन
वरण करेगी
मृत्यु
हर कण का, हर क्षण का ।


किन्तु फिर भी , हां , फिर भी
शेष रहेगा
बहुत कुछ ।

बहुत कुछ
ऎसा
जो शाश्वत न होते हुये भी नश्वर नहीं है ।
और जो बहुत मिटाया जाकर भी
फिर उतना ही सदैव शेष है ।



बहुत कुछ
ऎसा
जैसे
उस फूल के खिलने की आदत
और
उस चिड़िया के गाने की आदत !

Friday, January 16, 2009

न जाने क्या .....!


आज पूरे दिन, सूरज न जाने किस आग में तपता हुआ , आसमान के लम्बे चौड़े गलियारे में टहलता रहा है ! किरनों की नाव में बैठकर , हवा के समंदर में तली तक ,धरती तक , धूप फूल-फूल घूम ,न जाने किसका पता पूछती रही है ! हवा की चिड़िया ,पूरे दिन , अनवरत ,आत्मविस्मृत ,बिना थके , घर(पेड़) -घर(पेड़) जाकर उन्हें पूरा छान आयी है ,जर्रा जर्रा खोज आयी है ,फिर , अन्ततः ,न जाने क्या न पाकर , सांझ की गोद में गाय के सफेद प्यारे बछड़े सी निरीह , निश्चेष्ट पड़ी हुयी न जाने किस स्वप्न में डूबी हुयी सी है ! वो पुराना ,मन्दिर के पीछे वाला , अकेला चुपचाप खड़ा पेड़ , जो बार बार और हर बार शिशिर के एक साधारण से गुलाबी दिन में मध्याह्न की पियरायी उतरती धूप में थोड़ी लालिमा घोलता , अपनी सारी हरियरी न जानें किस रूठन में झार,फूलों से गज- गज लद बिलकुल टहकार लाल हो उठता है ,इस बार फिर , न जाने किसे चढ़ाये जाने की आस में लकदक लाल हो उठा है . .. . . . और ... और ....वीटी -चौराहे पर रोज बैठ, अपने अस्तित्व की समग्र दयनीयता व विवशता अपने रिघुर रिघुर कर निकलते शब्दों में भर ,कुछ दे देने की गुहार लगाती वो अपाहिज अनाथ बुढ़िया , आज पर्याप्त भीख पाकर भी न जाने क्या सोचती , उधर सड़क किनारे के पेड़ ताकती , उदास है ......

Sunday, January 11, 2009

हर रोज

हर रोज
सूरज ही नहीं ,
मैं भी
उगता
और डूबता हूँ .

हर रोज
चाँद ही नहीं ,
मैं भी
पिघलता
और बिखरता हूँ .

हर रोज
साँझ की नीली परी ही नहीं ,
मैं भी
धीरे धीरे उतरता ,
उदास होता हूँ.


हर रोज
धुधलके में जुगनू ही नहीं,
मैं भी
जलता
और बुझता हूँ


हर रोज
रात में वो पेंड़ ही नही
मैं भी
अंधेरे की धुन पर दर्द सा
बजता हूँ ।


हर रोज
घने कुहरे में सुनसान सड़क की वो पीली बत्ती ही नहीं
मैं भी
(तुम्हारी) स्मृतियों की भींगी सफेद पीली उजास में
स्तब्ध हो उठता हूँ।


हर रोज !





Monday, January 5, 2009

स्थगित अस्तित्व: एक याचना

तुम आओ!

पास बैठो मेरे !

मुस्कुराओ,
और सपने देखो !

शिशिर की इस
स्नेह -उष्ण नयी पीली धूप में
सर्जना की अविरल साधना निमग्न
किसी अनाम पुष्प वृन्त पर
मधुरिम कल्पना के स्नेह- सुमन सा खिल जाओ !

पवित्रतम क्‍वारी निशा- किशोरी के
श्याम नील मौन-आंचल में आवृत
संघनित अंधेरों के ढ़ूह नुमा
दर्दीले पेड़ों की व्यथा कथा बन
किसी कवि -हृद में पग जाओ!!

अभिसार ऋतु में ,उल्लास पर्व पर
चातक- विरह व्याकुल विरहिणी (के) मन में
मिलन -आस-दीप प्रसूत हर्ष-प्रकाश- रश्मि बन
अखिल विश्व आलोड़ित कर जाओ !

या चाहे जो हो जाओ !
किन्तु
छुओ मत मुझे !

स्नेह लो और दो !
किन्तु
मुझमें अपना अस्तित्व न मिलाओ !

अपने आह्लाद की कथाएं कहो !
किन्तु
मेरा संपृक्त मरुस्थल न बिगाड़ो . . . . . .

Thursday, January 1, 2009

फर्जी शुभकामनाएं

(यह विनय भईया के ब्लाग पर टिप्पणी के लिये लिख रहा था , फिर सोचा कि टिप्पणी को थोड़ा और खिला पिला कर अपना भी स्वार्थ साध लूं !)


एक बात है कि नये साल पर या किसी अन्य त्यौहार पर लोग झूठ खूब बोलते हैं !अपने साल भर के झूठ के अकाउन्ट का आधा इन्हीं दिनों मे खर्च कर देते है ! एक से एक फर्जी बधाई सन्देश ! झूठ मूठ की शुभकामनायें !
कैम्पस में घूम रहा था . सड़कों पर सायकिल या मोटर सायकिल से गुजरते लोग एक दूसरे पर वही रटा हुआ जमुला लहरा रहे थे . यूं लग रहा था जैसे बची हुयी रोटियां एक दूसरे पर फेंक रहें हों !
वर्ष चाहे दो हजार आठ हो या नौ या दस , बदलता कहां कुछ है ! जब तक कुछ भीतर न बदले !

Tuesday, December 30, 2008

चलो ! अच्छा हुआ

चलो अच्छा हुआ कि
तुम्हें भी कोइ और
मिल गया !
प्रतिशोध मुझसे जो था तुम्हारा
चुक गया !

विचरते मेरे दंभ के पठारों में
खो चुके जो स्वप्न थे सब तुम्हारे ,
उनको फिर से इक नया जहां मिल गया !

कैद मेरे स्वार्थ -सींकचों में
सन्त्रस्त भाव- विहग जो थे सब तुम्हारे
उनकों इक नया व्योम नीला मिल गया !

अपने को न जाने क्या समझते
एक झगड़ालू ,इर्ष्यालू और अहंकारी के
चंगुल से पूर्णतः मुक्त हुई तुम!
चलो !
अच्छा हुआ ,तुम्हें भी कोई और मिल गया !

Friday, December 26, 2008

शेष तुम्हारी इच्छा . . .


मैं
चाहता हूं तुम्हें
या नहीं,
कह नहीं सकता ।

मैं बस तुम्हारा ही हूं
या नहीं ,
कह नहीं सकता ।

तुम्हारे एक कहने पर
दे दूंगा जान
या नहीं
कह नहीं सकता ।

यदि चाहो तुम
कोई आश्वासन ,कोई वादा
तो कह सकता हूं बस यही
कि
जो भी रहूंगा ,
जैसा भी रहूंगा ,
जितना भी रहूंगा ,

रखूंगा सम्मुख तुम्हारे
स्वयं को पूरा पूरा
बिना किसी तह और सिलवट के !


शेष तुम्हारी इच्छा . . . .. . .!

Tuesday, December 23, 2008

संपृक्त




मेरी सफलताएं
और असफलताएं ! ! !

बीच इनके
कभी इधर तो कभी उधर
ढुळकता
आधारहीन अनअस्तित्व मैं !

सफलताएं जब
आसपास खड़ीं हो जाती हैं आकर
तब
वे सब
चाहने लगते हैं मुझें !

दुलारते हैं ,
पुचकारे हैं ,
सम्मान देते हैं ,
बताते हैं कि
बडे़ अच्छे हो तुम ,
प्यारे! प्यारे !

और
असफलताओं की शीतलहरी में जब
यकायक बिखर जाते हैं उत्कर्ष के सारे विकल्प
तब उनकी आखों में फफकती घृणाओं का
एकमात्र हेतु व गन्तव्य हो उठता हूं मैं !
मुझे वैसे ही जर्जर व हीन छोड़
तत्क्ष्ण ही मेरे विकल्प की तलाश में जुट जाते हैं सब! ! !

वैसे तो स्वाभाविक ही है
घृणा और प्रेम का यह चक्र
और नियति जान
इसे
अकुण्ठ
स्वीकारता भी हूं मैं ,
किन्तु !
क्षोभ ! ! !
कि उनके प्रेम और घृणाओं के
अन्तःस्थलों में भी
कहीं नहीं होता मैं . . .
होती हैं . . . .बस . ....
मेरी सफलताएं
मेरी असफलताएं ! ! !

Thursday, December 18, 2008

कभी कभी ,मेरे बावजूद


कभी कभी
मुझसे ही खुद को बचाते हुये
मेरे भीतर से कुछ -
सफ़ेद -नीले धुएं के पेंड़ सा
निकल आता है . . . .

कुछ ऎसा ,
जो बिलकुल
मेरे बावजूद होता है
और
स्वायत्त होता है ! !

(फिर भी),(लोभ वश )

मैं
जलते-बुझते सुनहरे शब्दों की लड़ियां
अपने वृ॒न्तों पर सजाये
उस कल्प-वृ॒क्ष को
(बस)
सहेजता हूं ,
प्रदर्शित करता हूं
अपनी औकात भूल ,
अपने गर्व में जोड़ता हूं , , , ,

और
भरसतः
बने ही रहने देता हूं
अपने इस भरम को
कि रचना यह
मेरी है

किन्तु
वस्तुतः तो
रचता
वही है मुझे .. . . .. .
अपने आविर्भाव में भी . . .
अपने अवगाहन में भी .. . .
अपनी अभिव्यक्ति में भी .. . . ..
कभी कभी , मेरे बावजूद ! !

Tuesday, December 16, 2008

तुम्हारी चुप्पी



तुम्हारी चुप्पी को
अस्वीकार समझ,
अपनी हार समझ,
खुद में वापस लौट गया मैं !

ढलती सांझ -से उदास मन में
पहले उगे तारे- सी
धुधंली, टिमटिमाती इक अन्तिम आस लिये
कि मेरे लौट जाने के बाद
शून्य मन ,कुछ देर तक खड़ें रहोगे तुम ,
उस रिक्त पथ को निहारते ... . .
जिससे लौट गया हूं मैं ! ! !

Monday, December 15, 2008

तुम्हारा चाहना


आकस्मिक मत समझना मेरी उस चुप्पी को
जो तुम्हारी उस निरभ्र, मध्दिम फुसफुसाहट

कि “मैं चाहती हूँ तुम्हें”
पर फैल गयी थी
पूरे मुझ पर !


चुप
या यूँ कहो कि
निरुत्तर ही रहना चाहता था मैं
अपने भीतर की अनजान अधेरी तहों में
इस फुसफुसाहट के ठीक इसी तरह

ख़ुद के लिए ही एक गंभीर प्रश्न
और फिर सहसा एक सरल उत्तर बन जाने तक……..

Monday, December 1, 2008

रेड अलर्ट

वही बगल में , पूना में था , जब हमला शुरू हुआ ! हमने सोचा था की बनारस वापस लौटने से पहले एक दिन बाम्बे भी घूम आयेंगें , राज ठाकरे की मुम्बई देख आयेंगें , लेकिन तब तक पता चला की ताज होटल में कुछ विक्षिप्त वहशी "मौत - मौत " खेल रहे हैं .......सब रेड अलर्ट हो गया है ......
दोस्त ने सुना तो बोला, चलो बहुत दिन से कुछ हुआ नहीं था !बड़ी शान्ति थी ! अब ठीक है ! फिर खबरों पे खबरें , विचार- विमर्श , संकल्प ,संगोष्टियां , वार्तायें ….और फिर अगले धमाके का इंतजार !
कहीं पढ़ा था की धर्म ही सब उन्नतियों का मूल है . देखता हूँ की सब अवनतियों का मूल भी यही है. खासकर तब जब वह अपनी यात्रा के वर्तमान में किसी गहन अंतर्भूत सत्य की उष्णता का अभाव झेलता प्रधानत: बहिर्मुख हो चला हो……
राजनीति या समाजशाश्त्र में वह कूबत नहीं , संलग्न धर्मो (में) / का नवोन्मेष ही इस भयवाद (आतंकवाद) के प्रशमन के कुछ सुंदर सूत्र सुझायेगा………….

Tuesday, November 11, 2008

अपना कच्चा चिठ्ठा

बेवकूफ किस्म का एकदम निठ्ठ्ल्ला लड़का हूँ. सोकर सुबह आठ बजे उठता हूँ. नौ बजे रूम से लगभग एक कोस दूर फैकल्टी के किसी बूढे से क्लासरूम में किसी नहाए-धोये चमचमाते प्रोफोसर के सामनें हाफता, आंख मींजता भरसत: मौजूद ही रहता हूँ । बीए का विद्यार्थी हूँ .भाषा विज्ञान लेकर तीसरे साल में हूँ बी एच यू से.कोई भी काम मेरा, मेरे ही द्वारा सही समय पर पूरा हो जाय यह तो बिलकुल आश्चर्य की बात हो सकती है . आज करै सो काल करै ,काल करै सो परसों.सबसे ज्यादा मजा आता है मुझे खूब चौचक, तानकर सोने में. अब तो जाड़ा भी आ रहा है . सोने का तो लुत्फ़ ही बढ जाता है. यह काम मुझे इतना प्रिय है की एक-दो घंटे की भी सिंटेक्स – मार्फाल्जी की लम्बी पढाई पर निकलने से पहले एक दो खर्राटे भिड़ा लेना पसंद करता हूँ.पढ़ाई के नाम पर आसपास के लोगों को बेवकूफ बनानें में खूब मजा आता है. हमेशा कमरे में ही घुसा रहता हूँ. लगता है की खूब पढ़ रहा हूँ. लेकिन जो करता हूँ वह तो मैं ही जानता हूँछुटपन से ही कापियों के पिछले पन्ने पर कुछ न कुछ ताना-पुरिया करते रहनें की आदत थी।समझदार लोगों ने ‘समझाने’-‘बुझाने’ का बहुत प्रयत्न किया लेकिन सब व्यर्थ गया.कुछ एक मास्टर साहब की गुप्त मदद से कुछ अपने जिद्दी स्वभाव से आदत बिगड़ती ही चली गयी. कैंसर और एड्स की दवा तो खोजी ही नहीं जा सकी है आजतक तो इस रोग का इलाज कहा से संभव हो पाता…..कुछ बहुत अच्छा बहुत अच्छे ढंग से तो कहने नहीं आता मुझे . बहुत उद्धत हूँ सो ज्ञान कहाँ !फिर भी थोडा बहुत तीर-तुक्का भिड़ा ही लेता हूँ.शेष स्वयं ही निरखें….

कुछ , जो पड़ा और सुना

बहरा हूँ मै तो चाहिए कि दूना हो इल्तिफात
सुनता नहीं हूँ बात मुकरर कहे बगैर
* * * * * *

हम न समझे थे बात इतनी सी
ख्वाब शीशे के ,दुनिया पत्थर की .......
...रोशनी अपने साथ लायी थी साए
साए गहरे थे ...रोशनी हलकी ......
हम न समझे थे .......
***********


“सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मजार आदमी
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयो का शिकार आदमी
हर तरफ़ दौड़ते भागते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतजार आदमी
फिर भी तन्हाइयो का शिकार आदमी
जिन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर
आखिरी साँस तक बेकरार आदमी ’’



* * * * * * * * *

“…….धुँआ बना के फिजा में उड़ा दिया मुझको
मै जल रहा था, किसी ने बुझा दिया मुझको …।

मैं एक जर्रा बुलन्दी को छूने निकला था
हवाओं ने थम के जमीं पे गिरा दिया मुझको . . . .
धुआं बना के फिजा में
..."

Sunday, November 9, 2008

नियति




कोई एक अच्छा आदमी ,
जो फितरत से भीतरी तौर पर एक कलाकार था,
खाली बैठा था।


यकायक उसे
एक खुराफात सूझी.

सामने पड़े ईटों के
एक बेतरतीब ढेर को
वह
बड़े करीने से सजाकर
छोटी सी प्यारी सी इमारतनुमा कुछ
सिरजने लगा ।



कई बार उसने
बड़े मन से छोटे छोटे टुकडों को
वहां से यहाँ , यहाँ से वहां किया .
कही खाली था उसे भरा
कही भरा कुछ था उसे खाली किया .
इसतरह सुबह से लेकर साँझ तक
उसने हर एक तरकीब
ईटों पर आजमायी .
कुछ एक बार तो
दो चार अनजान ईटों ने
एक दूसरे का साथ दूर तक दिया
और स्वयं के रूप और गुण को
परस्पर ले दे
किसी अरूप कल्पना के संभाव्य आकार का
संकेतन किया
लेकिन बस कुछ ही दूर तक …..
और बार बार वे
लौट आयी
उसी आकार में
जो नियति उन्हें सौप गयी थी ।

तब उस अच्चे कलाकार में भी
धीरे धीरे यह बात उगने लगी की
बेतरतीब
एक देर बने रहना ही
नियति और स्वभाव है
इन बेवकूफ ईटो का ……

और तब , एक लम्बी सास ले वह उठा ,
धीरे से मुस्कुरा ,
अपने घर की और चलने के ठीक पहले
उसने बड़ी बेरहमी से
यू ही ,बेवजह
अभी भी तरतीब में खड़ी कुछ बेफिक्र ईटो को
एक धक्के से छितरा दिया ……

(तभी न जाने क्यों …
वे कुछ दो चार ईटे
हौले हौले पिघलने लगी
पिघलकर समाप्त होने लगी .
बड़ी निरीह ,आधी गल चुकी भीगी आखों से
ढलती साँझ में लौटते कलाकार को देखती………..)

Saturday, November 1, 2008

(०)
गहरा है तो क्या !
खारा है …
उथली है तो क्या !
मीठी है …..

स्थिर है तो क्या !
सिर्फ़ संचय जानता है ….
बहती है तो क्या !
देना जानती है …

विशाल है तो क्या !
लहरों में लयहीन फुफकार है..
लघु है तो क्या !
लयमय कल कल सुर है …

गंभीर,स्थित्प्रग्य है तो क्या !
ख़ुद में ही ठहरा हुआ है …
विगलित है तो क्या!
हुलसाती है , उफनती है ,
बिखरती है ,सिमटती है ,
ख़ुद को पूरा पूरा दे देना
जानती है…….

Wednesday, October 29, 2008

क्षणिकाएं

(१)
किसे नहीं पता की
सच क्या है .....! ! ! !
लेकिन ....................
(2)
कभी सोचा है तुमने !
हमेशा काली ही क्यों होती है ?
परछायी आदमी की !
(3)
चाहूँ तुम्हें ! ! ! !
!...!....!......!.....!
आख़िर कैसे ? ? ?
(4)
जरूरी है दुनियाँ में बुढ्ढे भी
क्योंकि बुढ्ढे चाहते हैं जोड़ना
हर टूटी चीज को !
(5)
आखिर भेद न सके तुम व्यूह
रूपसी के मधुर आह्वाहन का !
मानूँ कैसे पुरुष मैं तुमको ?

Saturday, October 25, 2008

कला


कला एक
विवशता है.

मैं जानता हूँ कुछ शब्द
कुछ संरचनाएं
भावों की छोटी-सी उपज है मेरे पास
मैं, छटपटाता , बंद , इन्हीं शब्दों ,संरचनाओं के
लघु दायरों में अनवरत !


जब जब कोई नया उगा भाव
एक दंश मारता ,
कराहता मैं दर्द से
लतफत भागता हूँ इधर उधर
उफनता सिमटता ,
व्यथा की अन्तिम उठान तक ,
वेदना की हूक के अन्तिम श्रृंग तक
चेतना के लघु वातायनों में
विवश तजबीजता स्वातंत्र्य के नव उत्स ……


किंतु
अवश् परवश
गिडगिडाता
अंतत: जाता हूँ शरण
इन लुच्चे और छोटे शब्दों की
की दहकते स्वत्व में सांत्वना के कुछ फूल रोपूं........

वे सत्य गिरवी रख मेरा,
रीझ मेरी क्वारी वेदना के सौंदर्य पर,
मुझे अभिव्यक्ति देते हैं …….

और तब
मैं ख़ुद से बहुत दूर……
एक प्रतीयमान सत्य हो जाता हूँ
….एक आभास…एक धोखा ,विवश ! !

जैसे भुट्टे के खेत में
चिडियों को भगाने के लिए बिजूका……

ओलिवर ट्विस्ट , तुम मिले थे मुझे !

दो एक साल पहले चाल्स डिकेन्स की एक किताब में परिचय हुआ था इस पात्र से.मिलकर ये नहीं लगा की किसी उपन्यास का एक चरित्र है ये . बार बार ये लगा की कहीं देखा है इसे , कहीं मिला हूँ इससे ---


लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर
पटरियों के बीच
जीवन जैसी बजबजाती सड़ती बस्साती नालियों में,
खाली पड़े दोनों,खोखले पैकेटों में
अपने अस्तित्व का एकमात्र अर्थ खोजते
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

शरद की भभकती ठण्ड में
प्लेटफार्म नंबर तीन के चबूतरे पर
बिछाए सारी जमीन
आदमी के वजूद जैसे चीथड़े ओढे
दौड़ती ,हाफती ,ख़तम होती सासों से
ठंढ को फूंक-फूंक कर उडाते ,
विद्रूपताओं के इस विशाल समंदर में
जीवन की नौका सम्हाले,हेमिंग्वे के उस बूढे आदमी
की विजय को पुन: साकार करते ,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

काशी में भोले बाबा के उस भव्य प्रान्गण में
कोनचटे की किसी चाय की दुकान पर
संपूर्ण व्यवस्था में
सत्ता-अर्थ-शक्ति लोलुपता के मंथन से उदभूत
पाशविकता विष पान करते ,
मृत संवेदनाओं पर चीत्कार करते ,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

खौलते दूध के भगौने से
निकलती भाप जैसी अपनी जिन्दगी लिए ,
व्यवस्था -नियंताओं पर
प्रश्नचिह्न जैसी आखें लिए
विजन ट्वेंटी के स्वप्न को मुह चिढाता
अनंत क्षोभ लिए,
ओलिवर ट्विस्ट ,मिले थे तुम मुझे !

Thursday, October 23, 2008

स्नेह -परस

आओ !
नेह -तुलिका से विगत के स्मृति- चित्र बनाएं…..!
स्नेह-रंजित ,मधु-सिक्त ,मृदु भाव रंग ,
आर्द्र –करुण- नम्र- आलोक प्राण
ईषत –उन्मत्त ,अमूर्त आकृति में भर
किसी नेहा की
एक व्यग्र तरल मंद स्मित रच जांय……

मैं


किसी बहुत प्रिय ने ही कहा था की बड़े हृदयहीन हो तुम , उसी के लिए -



जो हूँ ,वो तो होना ही पड़ेगा !

अब जो हूँ , वह होने में मेरा कोई चुनाव तो है नहीं , कोई हस्तक्षेप तो है नहीं ,

मतलब जो हूँ .............

वो हूँ ही !

तो ,जो हूँ, वो बने रहने के लिए मैं तब तक स्वतंत्र हूँ जब तक मेरे इस होने से

किसी अन्य को कोई कष्ट नहीं पहुंचता !



सो , मैं खुद को , बिलकुल खुद तक समेटता हूँ ,

अपने विष खुद उपजाता हूँ , खुद ही समोता हूँ !

अपनी आग पर खुद ही उबलता हूँ , भाप बनता हूँ , फिर चुपचाप पानी बन लौट आता हूँ !



मेरे बाहर का वातावरण तब मुझे क्षुद्र और स्वार्थी कहता है

और कहता है की मैं एक कीड़ा हूँ !

एक नन्हीं -सी आरामदायक उदासी के साथ मैं इसे स्वीकारता हूँ ,

यह स्वीकार अपने पीछे कुछ क्षोभ और एक भुरभुरी-सी असंतुष्टि छोड़ जाता है !



तब , मैं जो हूँ , उसके अलावा कुछ और होना चाहता हूँ .... ...फिर से ......

लेकिन तभी , कड़ाके की सर्दी -सा कोई अनजाना खौफनाक डर

आकर मुझे जकड़ लेता ही.......

और मैं दुबककर खुद में वापस घुस जाता हूँ ! ! !