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Wednesday, January 12, 2011
दुनिया चलती रहती है !
Wednesday, December 22, 2010
जाड़ !
ठंडी
सफेद
शुष्क !
Wednesday, December 15, 2010
ज्वार
Saturday, December 4, 2010
बनारस के ब्लागर्स ...
Wednesday, November 24, 2010
अरे प्यारे भगवान जी !
कहां से किया तुमने बी. टॆक.
और की
टेक्नालाजी की इतनी पढ़ाई
कि बना सके
यह जबरदस्त पृथ्वी !!!
मैं तो हैरान हूं
मैं तो परेशान हूं
छत पर खड़े हो कर देखता हूं आसमान
देखता हूं-- स्ट्रेटॊस्फीयर , मेजोस्फीयर , आयनोस्फीयर ,
देखता हूं यह संख्याओं की औकात नापता अनन्तः विस्तार ।
मन भुनभुनाता है अपने आप में ही सोचकर
तुम्हारी यह
हजारों विचित्र व महीन अनवरत प्रक्रियाओं को
चुपचाप इतनी सरलता से
निष्प्रयास अन्जाम देती
केमिस्ट्री !
सतह से पन्द्रह किलोमीटर ही ऊपर
क्षोभमण्डल में तापमान का इतना घटाव ,
यह माइनस सिक्स्टी डिग्री का टेम्परेचर !!!
फिर पचास किलोमीटर ऊपर समताप मण्डल में
ऋण पांच से पांच डिग्री का बढ़ाव ! ! !
फिर इसी तरह अस्सी किलोमीटर पर
ऋण एक सौ दस डिग्रीसेन्टीग्रेट
और चार सौ किलोमीटर यानी आयनोस्फीयर के
उपरी भाग में
धड़ाम से एक हजार डिग्री सेन्टीग्रेट ! ! !
क्या बात है !
विचित्र बात है !
सोचता हूं पगलाता हूं !
यह ठीक है कि
समताप मण्डल में
ओजोन गैस के गलियारे हैं
और सोखकर पराबैगनी विकिरण
ओजोन बढ़ा देती है ताप यहां !! !
यह भी ठीक है कि
आयनन मण्डल में
यही थेथर पराबैगनी किरणें
बेचारे परमाणुओं के सर फोड़ फोड़
कर देती हैं उन्हें आयनित
और इन उष्माक्षेपी अभिक्रियाओं से
निकली उष्मा से
बौरा जाता है आयननमण्डल ! ! !
लेकिन
मेरे प्यारे भगवान जी ! !
ये इतना जबरदस्त अरेन्जमेंट
हुआ कैसे आपसे
कि एक पूरी बड़ी सी लैब ही
फैला डाली इस बेचारी
आज्ञाकारी पृथ्वी के आसपास ! ! !
जरा कहो तो !
कुछ बताओ तो !
ट्रेड क्या था तुम्हारा ? ? ?
आयनोस्फीयर की व्यवस्था देखकर तो यही लगता है
कि जरूर तुम
ईसी ब्रान्च से रहे होगे !
नहीं तो कैसे बांटते तुम इस पूरे मण्डल को
डी , ई वन , ई टू , एफ वन ,एफ टू एवं जी परतों में !
कैसे तुम निर्धारित करते कि
डी रिफ्लेक्ट करेगा लांग रेडियेशन वेव्स
ई वन , ई टू मिडियम रेडियेशन वेव्स
एफ वन ,एफ टू शार्ट रेडियेशन वेव्स
व जी बचा खुचा सब !
यह इतना कठिन निर्धारण ?
हर तरंग के लिये अलग अलग ?
हमने तो सोचा था कि
हम सबके लिये
बस यह एक चुल्ली सा मन
और उसमें उछलने वाली
कुछ टिड्डी जैसी भावनाएं बनाकर
इन्हें उलझे रहने के लिये
कुछ किताबें व
दो चम्मच प्यार देकर
तुम सेफ मॊड में पड़े
आराम कर रहे होगे !
लेकिन नहीं
श्योर हूं मैं
कि खूब मन से की है तुमने
तकनीकी और विज्ञान की
जबरदस्त पढ़ायी
व चिति के लास्य से निःसृत
इस विशद प्रकृति के
समस्त प्राकृतिक संसाधनों ,
इसके जीवनदायी, निर्व्याज सौन्दर्यभूषित
शस्य श्यामल , हेम आप्लावित
उत्तुंग गिरि शिखर , कन्दरा , गर्त
गुह्य गह्वर
तथा मूर्तिमान रहस्य , इस
गूढ़, असीम , शून्य व्योम के
प्रत्येक सौष्ठव , प्रत्येक सौन्दर्य
व प्रत्येक रहस्य के पीछॆ
खूब ठीक से रचा है
पूरी तरह समझा जा सकने वाला
एक निश्चित व निर्धारित पैटर्न !
Sunday, October 10, 2010
रीडर रिस्पान्स थियरी पर........
चट्टानें बोलती हैं ।(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )
जो गढ़ी गयीं
मूर्ति बन गयीं
मन्दिर में सज गयीं
वे भी .
जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
सड़कों पर बिछ गयीं
वे भी.
चट्टानें बोलती हैं ।
(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )
जो गढ़ी गयीं
मन्दिर में सज गयी
वे पद्य में बोलती हैं
भक्त से बात करती हैं ।
जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
वे गद्य व सूत्र में बोलती हैं
जियोलाजिस्ट से बात करती हैं ।
तो
चट्टानें ,
हालांकि बोलती हैं
लेकिन इसमें अर्थ न खोजें
Wednesday, October 6, 2010
थोड़ी देर ....
थोड़ी देर . . .
साथ रहें !
एक दूसरे को फोन करें
और...
हैलो भी ना बोलें ।
बहुत देर तक
चुप रहें . . .
और बिना कुछ कहे
हल्की सी सांस छोड़
फोन रख दें ।
इतनी दूर होकर भी
चलो . . .! ! !
थोड़ी देर
साथ रहें !
Thursday, September 30, 2010
खाली समय में
तुम घबराना नहीं,
तनिक भी डरना नहीं !
तुम्हारी नियति का फैसला
एकदम संवैधानिक होगा !
सब कुछ
साक्ष्य और धाराओं के
सटीक सहयोग से उपजेगा !
तब तक
राम !
तुम बैठ कर
थोड़ा आराम करो !
खाली समय में कुछ किताबें पढ़ो ,
बाल्मीकी रामायण ,
उपनिषद इत्यादि तो होगें नहीं पास तुम्हारे,
रामचरितमानस के ही
कुछ पन्ने पलटॊ ,
कुछ गुनगुनाओ
एकदम मत डरो !
\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\
मोहम्मद !
तुम भी मेरी बात मानो ,
चिन्ता एकदम न करो !
असुरक्षित प्रशासनिक राजनैतिक संबन्धों से
जरूर मेरे इस देश की देह पर दिखने लगे हैं
एड्स के कुछ लक्षण
लेकिन तुम निश्चिन्त रहो
कोर्ट पर विश्वास रखो
क्योंकि
कोर्ट को नहीं बनानी है फिर से सरकार
और कोर्ट की अलमारी में सौभाग्यवश
नहीं रखा है कोई भी धर्मग्रन्थ !!!
तो तुम भी
रेहल की गर्द पोछो
और कुरान खॊलकर
कुछ पन्ने पलटो!
जरा देखो कि
सब अर्थ सब व्याख्याएं
ठीक ठाक हैं न !
Friday, September 24, 2010
प्रतिध्वनि !
तुम्हारी आवाज छोटे छॊटे
अलग अलग
असंबद्ध टुकड़ों में
बहुत देर तक
गिरती रही
मेरे भीतर के किसी
गहरे
और गहरे
कुएं में
हां कुएं में !
सनसनाती हुयी
तेजी से
नीचे
और नीचे
बढ़ती
तुममें आयी बदलाहट का अर्थ लिये
मरे शब्दॊं की शिराओं में दौड़ती
जिन्दा आवाजें
अपने पीछे
कुछ हल्की फीकी पड़ती
आवाजों का एक धुआं -सा छोड़ती
अन्ततः उस गहरे कुएं में
बहुत अन्दर तक गयी !
लेकिन वहां
सन्नाटा
जमें हुये लावा की तरह
इतना अधिक और गाढ़ा था
कि
शायद
दम घुट गया उनका !
क्योंकि शून्य मन
जोहता हूं बहुत देर से
अभी तक नहीं आयी
कोई प्रतिध्वनि !
Sunday, September 19, 2010
वेश्यावृत्ति

जीवन तो
न जाने कब का
चुक गया था
फिर वहां
मौत थी
वही मौत
॒॒॒॒॒॒॒
न जाने क्यॊं
चीजें पैदा हुयी थी
न जाने क्यों चीजें
खत्म हो गयी
फिर वहां
मौत थी
वही मौत
॒॒॒॒॒॒॒
सब फूल झर गये
पंछी सब मर गये
वृन्त सब पीत हुये
शब्दॊं में भर गयी सड़ान्ध
उत्सव की स्मृतियों में लग गये दीमक
मर कर सड़ गया
प्यार
देह को उसकी
नोच कर कौवे
खा गये
फिर वहां
मौत थी
वही मौत
॒॒॒॒॒॒॒
समय ने खॊले
फिर
न जाने कितने
नये चकलाघर
धुंआधार चलने लगी
फिर वही
हां वही
जीवन की अबाध वेश्यावृत्ति
Wednesday, September 15, 2010
कविता और बुढ़िया

इस चक्कर में
कि किसी दिन
एक ही बार
लिखूंगा कोई खूब अच्छी सी
जबरदस्त कविता
मैंने नहीं लिखने दी
खुद को
अनेक छोटी छोटी
अ- अच्छी कविताएं!!!!!
इस तरह अनेक भाव उमगे
और नष्ट हो गये !
मैं ,अमानुष ! पाखण्डी !
देखता रहा चुपचाप
इन भ्रूण हत्याओं को
यह सोच कर कि
भावों , संवेदना-वृत्तों का भी
होता है पुर्नजन्म
और अभिव्यक्ति की स्पृहा को त्याग
जब मन में दम तोड़ता है कोई अनभिव्यक्त भाव
तो नष्ट होने के बजाय वह प्रवृत्त होता है
अपने परिष्कृत विकास के नये आयाम में !!!!
इसलिये ही
हर शाम
मैं सड़क नहीं
गली वाले रास्ते से
पैदल ही जाता रहा अस्सी घाट
क्योंकि गली के मुहाने वाली लकड़ी की गुमटी में
कोई चाय पान की दुकान नहीं
बल्कि रहती है
चार पांच बरसात झेल चुकी
बगईचा अगोरने के लिए लगाई गयी
पुआल की मढ़ई-सी जर्जर बुढि़या !
चूंकि बुढि़या जीवित है !
और जिन्दा रहने पर खाने को कुछ चाहिये
सो बुढ़िया रोज शाम को
चार फुट की गुमटी के ठीक बाहर
(सौभाग्यवश) आठ फुट की इस व्यस्त गली में
अपने छोटे से हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त हुये स्टॊव
पर रोटियां पकाती है !
बाहर ही , शाम को भी, नहाती है ,
फिर खुद को
और कुछ अधूरे स्वप्नों सी
उन पकी अधपकी रोटियों को लेकर
वापस अपनी गुमटी में लौट जाती है ,
शायद इस दुनियां से बहुत दूर !
मैं बगल में ,
किसी दुकान पर बैठा
यह सब देखता हूं
और बस देखता हूं !
कुछ सोचता नहीं हूं
हर रोज बस थोड़ा और
आक्रान्त व
कुण्ठित होता हूं !
अनेक भाव उफनते हैं
उमगते हैं
कई नपुंसक आक्रोश व
कुष्ठ रोगी संवेदनाएं
जिनसे बड़ी अच्छी कविता बन सकती है ,
कविता बन जाने को
चिचियाते , घिघियाते हैं
लेकिन
कलम खुट्ट खुट्ट करता , टॆबल पर चुपचाप
बहुत देर तक
मैं कुछ सोचता बैठा रहता हूं
तब तक
न जाने कब
पन्नों की पक्तियों में
उभर आती हैं
साईकिल के हवा निकले ट्य़ुब जैसे
रोटी बेलते हाथों की झुरियां
और मैं चुपचाप
बिना कुछ लिखे
कापी बन्द कर उठ जाता हूं !
Sunday, July 4, 2010
वैजयंती
राग की यह वैजयन्ती
तुम कहां से लहा लाये ?
सजाये पलाश-पल्लव , गूंथ माला, फेर दी
नेह विजड़ित मन मेरा , बन मुर्तिका , सज गया !
दूर हो मुझसे , बना चन्दन , घिसा मुझको
फिर मुझी पर पोत सारा , चन्दन गन्ध मादल कर दिया !
दी थाल वेदना की ,सजाने को आंसुओं के मौन दीप
फिर फेर एक दुलार पूरित करूणार्द्र दृष्टि, ज्योतित सभी को कर दिया !
थे विशद विप्लव , संवेग-वात्याचक्र-प्रकम्पित सत्व
गहन आह्लाद में बोर तुमनें, अखण्ड - प्रशान्ति - यज्ञ ॠत्विक बना दिया !
कहो !
इस घने अवसाद में यह
जड़ी बूटी कहां पाये ?
राग की यह वैजयन्ती
तुम कहां से लहा लाये ?
Saturday, June 12, 2010
फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !
सोचा था
चलेगें सिन्धु की थाह लेने
नीली अतल गहराइयों की
स्वयं पर एक छाप लेने ।
था स्वप्न चलेंगे एक बार
निरखने विशद अनुभूतियॊं के
गहन कानन लता कुंज गह्वर ,
चुनेगें कुछ पुष्प
चेतना की सजावट को
संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के।
अजाने मन की
हुलसती एक चाहना थी
उड़ेगें हम भी संवेदना के प्रसार में ,
बतियायेगें
व्योम के निस्तब्ध वितान से
गहन मौन की बातें ।
वृन्त पर जो पुष्प है चुप समर्पित
उससे भी मिलेगें जानने को उसका समर्पण
अपने निविड़ एकान्त में वह किस तरह
देता है स्वयं को , अवसन्न , अशेष
अम्बर की निस्सीम विशालता को ?
सांझ की नीलम पट्टिका ओढ़
सुदूर बहुत सलिल तीरे ,स्तब्ध
सो रही है जो हरे गाछों की घनी बस्ती
जिन पर चांद से चुरायी चन्द्रिका को
बना अच्छत छींटते हैं प्रकाश कीट
विशाल वृक्ष जिनमें , अर्द्ध-मुखरित , स्तिमित
कर रहें हैं श्रेयस सांध्य गीत मौन वाचन
मौन ही की धुन पर , लयमयी , सुरमयी
सोचा था
सुनेगें
गुनेगें उन्हें भी ।
किन्तु
नियति तो यह थी नहीं ।
फिर लौट आये हैं
चेतना के हंस कछारों से ही ।
गहनता
फिर एक स्वप्न बन कर रह गयी है ।
गये थे थाह लेने अतल गहराइयों की
लेकिन
ठगा है खुद ही ने खुद को,
फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !
कविता के विरोध में
भाव पंचर हो गये हैं !
मन न जाने क्यों
अपना मसौदा
कविता को देना नहीं चाहता
है बहुत कुछ पास उसके
कहने को , सुनाने को
कविता को देने को
कविता हो जाने को
लेकिन वह दबाये बैठा है
सटकाये बैठा है ! ! !
वह नाराज है शायद कविता से
कि वह बड़ी डिप्लोमेट हो गयी है !
मन के मसौदों को नीलाम कर रही है !
सभी विधायक दबावों को
फिस्स कर दे रही है
सभी सृजनात्मक बलॊं को बिखेर दे रही है !
Saturday, May 29, 2010
निःशब्द
चलती हवा में
झूमते पेड़ की खुशी का गीत
मुझॆ पढ़ने नहीं आता !
तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! !
बसन्ती बयार में
मचलती चिड़िया की चहकन
मुझे लिखने नहीं आती !
तुम्हारी हंसी भी कहां लिख पाता हूं ! ! !
पहली फुहार में
तर बतर भीजतें पलाश की बूंद बूंद खुशी
मुझे समझ नहीं आती !
तुम्हारी निःशब्द मुस्कुराहटे
ठिठुरती रात के बाद
जवान हुयी ताजा धूप का अल्हड़पन
मुझे पीने नहीं आता !
तुम्हें आंख भर देख कुछ बोल कहां पाता हूं ! ! !
Sunday, May 23, 2010
दूब
बिना जिल्द की
वह फटी पुरानी कापी,
अपनी सब किताब की
ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं
जिस पर बीच बीच में थककर
मैं कुछ नया लिखा करता हूं ।
वैसे तो पढ़ने की इस मेज पर
हैं बहुत कापियां
जिस पर मैं धरती और नक्षत्र
लिखा करता हूं
लेकिन दबी किनारे सबसे नीचे
बीते वर्ष की बची पन्नों वाली पर,
भीतर बढ़ती हरी दूब की
कचनारी कोंपले लिखा करता हूं ।
बिना जिल्द की
वह फटी पुरानी कापी,
अपनी सब किताब की
ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं !
Wednesday, May 19, 2010
निर्मोही
तुम्हारे शब्दों में
कुछ फूल हॊते हैं !
उन्हें छूकर
मैं जाग जाता हूं !
जगाओगे नहीं मुझे ?
निष्ठुर !
तुम्हारी चहकन में
कुछ रंग होते हैं !
उनके परस से मैं
बहक जाता हूं !
बहकाओगे नहीं मुझॆ ?
पाथर !
इन रंग और शब्दों से
मेरी सांस बनती है !
आंखॊं में चमक पिघलती है
और
बातॊं में खनक फटकती है ! !
लेकिन तुम .......
चुप हो अब भी ?
कुछ तो कहो
निर्मोही !
Monday, April 12, 2010
प्रतीक्षा
हरे पत्तों में , ,,
खूब मल कर
मुंह धोयी
और भी चटकार
गोरी हो ली जैसे ................
छोटे सफेद
गमकते फूलों
की लड़ियों से
गढ़ी
नीक नीक , ढेर -सी
चांदी की बाली ,,,,,,,,,
और अब
अंग अंग
धारे बैठी है
जोहती बाट
पहली मद्धिम बरसात की ! ! !
मै तो निरखूं
तुम्हें ही
ओ अकेली ! विलग, मुदिता
भरा बदन ,
गाढ़ मन ,
क्वारी नीम की डंठल !




