Friday, January 14, 2022

जीवाश्म

किसी लोककथा में फँसी रह गयी वेदना 

हज़ारों वर्ष पुरानी एक प्रतिमा के मन की स्मृतियाँ 

बादलों के पुराने जन्म 

जीवाश्मों के स्वप्न 


इनमें मेरी भाषा है 

मेरे ख़त्म हो जाने के बाद बची रह गई 


कई बार कहेगी वह मुझे 

बिना मेरे जाने 

बिना मेरे हुए 



एक झरने में पानी बनूँगा मैं 

शुरुआत

सबसे पहले देह में 

कहाँ से शुरू होती होगी मौत  ? 


तमाम कोलाहलों के बाद 

गिरी स्याही सी  फैलती होगी  

देह में 


सपने कहाँ रखती होगी नींद

जैसे मौत रख लेती हैं हमारी आँख 



चुप हो जाने के बाद 

कानों को कैसे लगते होंगे शब्द 


हवा की सरसराहट 

धूप की उजास 

फूलों के रंग 

स्मृतियों की अटकनें 

किसे दे आती होगी मौत 


देह के धुएँ में 

मौत की आग 


 




व्यक्तिगत सी बात

किसी छोटी जगह पर 

बरसात बड़ी ही व्यक्तिगत बात सी होती  है ! 


छोटी जगह पर 

गिरती बरसात को 

हमारे पुराने दुख 

याद होते हैं 


वह उन पेड़ को भी 

पहचानती है जिन्हें हम 

पसन्द करते आये हैं  



तमाम खो गयी तसल्लियों को 

बरसात बिना दोहराव के 

पुनपुनखोज लाती है  

हमारे होने को हमें बताती है  



बरसात जा चुके लोगों को ,

स्मृति से परे ,

एक भीनी सी  महक के  तौर पर 

हमारे बिल्कुल पास रखकर जाती है  

दुखद स्मृतियों में से दुख हटाकर 

नम हवा की किश्त बना कर ! 

Saturday, January 1, 2022

आत्मा के सपने

तुम्हारी देह में

मैं नहीं खोजता तुम्हारी आत्मा 

जिससे छू सकूँ । 


आत्मा देह का सपना है। 

टूटने दो । 

तुम्हारे सीने पर जो दो आधे लिखे अक्षर हैं 

उन्हीं से रच कर एक अज्ञात लिपि 

मैं 

अपनी देह को देना चाहता हूँ 

सुधि के कुछ अधूरे खण्ड काव्य ।



वस्तुत: हमारी देहें 

पुतला है ! 

वे जीवित होना चाहती है ! 


देखो अपने होंठों को !

किसी जंगली फूल के लाल पत्ते ! 

सुनों, मेरे तुम , कहता हूँ तुमसे ! 

मध्दम स्पर्श की रोशनी में 

वे विलुप्त हो जाएँगें ! 

वे चलें जाएँगे खोजनें 

आत्मा के सपने ,

जीवित होने भ्रम !

साज़िश

 सच को दूसरे सिरे से देखने पर 

पता चलता है 

सच के प्रति हमारी वासना कितनी हिंसक है 


सच हर किसी को एक जैसा बना देने की साज़िश है

हम अपने होने की सजा पाते हैं ।


धीरे धीरे वे सभी लड़कियां  ख़त्म हो गई हैं 

जिन्हें मैं प्यार करता था 

या कर सकता था । 


ये मेरी अक्षमता नहीं है । 

उदासीनता भी नहीं है । 

ऊब भी नहीं है । 


ये है बस 

चीज़ों को ठीक से जान लेने के बाद की शान्ति । 


गहरे प्रेम 

उदात्त प्रेम को महान बताती तमाम कविताएँ व कवि 

अपराधी है । 



गहरी भावनाओं से हिंसा ऊपजती है ।

भावनाओं में गहरा हुआ प्रेम या तो हिंसक होगा या नपुंसक ।

Wednesday, May 20, 2020

पुतली




by anupriya 





                                                    हमारी  पद यात्राओं की थाप से ही 
                                                    धरती घूमती है अपने अक्ष पर,

                                                    हम जहां से आये थे 
                                                    वहीं लौट जायेगे ,

                                                    रास्तों को अपनी कथरी की तरह मोड़ कर 
                                                    साथ ले जायेगें ,

                                                    स्वेद व रक्त की बूँदें जो रह गयी है वहाँ
                                                    वही हमारा अर्जन हैं ,

                                                    टूटे मटमैले खिलौने जैसे अपने बच्चों को 
                                                    हम वे सौंप देंगे 
                                                    और कहेंगे 
                                                    कि 
                                                    वे इसे अपनी आँखों में पुतली बनाकर पहन लें !

Saturday, May 16, 2020

मिट्टी

जब मैं नींद से जागा 
मैंने अपनी देह को मिट्टी पाया 

हाथ मिट्टी पैर मिट्टी पूरी देह मिट्टी 

मैंने अपनी आत्मा खोजनी चाही 
मुझे मिला 
थोड़ी सी नम मिट्टी का एक ढेला 

मैंने कहा मेरी भाषा कहा है 
कुछ भुरभुरी मिट्टी के टुकड़ों ने कहा 
यहाँ हैं 

मैं चकित था 
मैंने कहा 
मुझे वापस करो मेरे स्वप्न 

सूखी दूर तक बिखर सके 
ऐसी मिट्टी के एक टुकड़े ने कहा 
चलो मैं चलूँ तुम्हारे साथ ! 

मैंने कहा मुझे मेरी धरती वापस चाहिए 
उन्होंने कहा 
तुम्हीं धरती हो 
सूरज की आँच से बचे हुए अंधेरों को 
अपने कणों में रक्त की तरह फैलने दो !

Friday, May 15, 2020

गति

मैं डरता हूं

वह कवि होने से

जो अपने ही बिम्बों की फफूंद में

भटक  जायेगा.

 

जो खुद को

अपने कहे अर्थों का 

जिम्मेदार मानेगा.

 

जिसे विश्वास हो चला है भाषा में

शब्दों पर,

उनके पुराने अर्थों में, पूरा.


जो कविता को लेकर 

जाना चाहता है

एक स्थान से

दूसरे स्थान पर.

 

           मैं डरता हूं

Tuesday, May 12, 2020

हवा

हवाओं को पता है

इस दुनिया के सारे रहस्य

इसलिए ही
वे चुप और अदृश्य रहती हैं ।

हवाएँ धरती की आत्मा हैं ।


मिट्टी पहाड़ सूरज नदी आदमी

सब हवाओं के यहाँ गिरवी हैं ! 

Saturday, May 9, 2020

अभिव्यक्ति

लकड़ी में छुपी आग 

हवा में चिड़िया की उड़ान 

मिट्टी में पहाड़

पत्थर में समय 

देह में मौत 


अभिव्यक्ति का मतलब 
हमेशा व्यक्त हो जाना नहीं होता ! 

जिम्मेदारी

भूख के लिए ज़िम्मेदार ठहरायी गई 
रोटी ! 
जीवन की दुर्घटना के लिए 
किया गया कटघरे में खड़ा 
हवाओं को ! 

नदी ने जब अपनी बात कही 
तो माना गया उसे बाढ़ 

कोयल ने मोर ने जब चींख चींख कर 
त्रासदी की चेतावनी दी 
उन्हें बताया गया सौन्दर्य के अप्रतिम गीत ! 

सागरों ने जब छोड़ दी थोड़ी सी ज़मीन सूरज के लिए 
किसी ने कहा इसे अपनी विजय ! 

Friday, May 8, 2020

ईश्वर की पालिटिक्स

उसके बनाये लोग 
जानने न लगे एक दूसरे को
इसलिए उसने गढ़ी भाषा 

प्रेम में हारे 
तमाम लोग 
उसे तलाश न लें एक साथ
इसलिए उसने खड़े किये 
पूजाघर 

उसके हाथों से बाहर 
न सरक जाय ये दुनिया 
इसलिए ही 
ईश्वर ने बनायी भूख !

भूख भाषा और सुरक्षित रहें पूजाघर 
इसलिए उसने चुने राष्ट्राध्यक्ष 
खोदीं सीमाएँ , खड़ी की सेनाएँ
हत्याओं को किया महिमामण्डित 


ईश्वर ! कैसे बने तुम क्रूर इतने ? 
आख़िर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है ?

Wednesday, May 6, 2020

अन्तहीन कथाओं की तलाश

Image from internet

कोई पुरानी इमारत
कोई पिछले जमाने का किला
कोई ऐतिहासिक खण्डहर

ये सब
समय की चादर में
बारीक सुराख से होते हैं.

इनके पास से गुजरते हुये
इनमें से होते हुये
हम अतीत की किसी आधी अधूरी कहानी में
कोई पात्र बन कर
अपने को ही पहचान लेना चाहते हैं


हजारों साल पहले तराशी गयी
किसी खिड़की को ताकते हुये
वस्तुतः हम खोज रहे होते है कोई रास्ता
सशरीर वापस लौट जाने का.

नहीं  ,यह अतीत का आकर्षण नहीं है.
गुलमोहर की डाल पर फुदकती
गौरैया भी जानती है समय एक चादर है  घने धुऎं की

हमारे लौट जाने की आस
अन्तहीन कथाओं की तलाश है.  


Sunday, May 3, 2020

बरसात जब होती है

Pic From https://paintingvalley.com/rain-drawing

बरसात जब होती है
सड़कें गलियां मिट्टी
सब भींग जाते हैं.
हर तरफ हर चीज नम
घिरे बादल ठण्डी हवायें
सब शान्त होता है.

मन ऐसे में भूल जाता है
समय के अनुशासन
स्मृति के तारतम्य ,
पुरानी बरसातों की
तमाम यादें
कर देता है घालमेल.

लगता है अचानक
कि अरे ये वही बरसात है
जिसने बचपन में
स्कूल के कमरे में
भर दिया था पानी
फिर गणित के अध्यापक ने कहा था
बाकी कल !
मन में फूट पड़े थे हुलास के
विकल झरने.

भान होता है
यही पानी की छीटें
करती थी घोषणा
कि कच्चे हरे आम
अब रसीले पीले होगें
और व्यग्र बालक कोई
स्मृतियों में
कर रहा होगा  घर में
आम की पहली खेप के लिए फसाद !

बरसात जब होती है
मन की परतों में वह गांव
जहां सारी पगडंडियां मिट्टी थी
नम हो ऊपर सरक आता है.

तरबतर हुयी मड़ई से
टपकता मटमैला पानी,
अपने मटमैलेपन में भी
एकदम साफ पानी
जमीन पर नीचे जो गढ्ढे बनाता था
उसकी सीधी रेखा का रहस्य
उनकी एक सी गहराई
आज भी विस्मित करते हैं.

शाम की लालटेन के
टिमटिमाते पीले उजास में
मढ़राते ढेर सारे भुनगे-पतंगों साथ
आग में भूनी भींगी मटर
पीसे मिर्चे साथ खिलाने वाले
वो बूढे बाबा न जाने कब के
खत्म हो गये !
बरसात जब होती है
फिर से पास आकर
इस तरह किसी बरसाती सांझ
मुझे अकेले पाकर
बहुत दूर के किसी अनजाने गांव में
घटा कोई रहस्यमयी किस्सा सुनाते है.

अब भी, बरसात जब होती है.


Friday, May 1, 2020

दिशाएं

ईश्वर 
अकेला होता हुआ 
प्रेम है ।


प्रेम 
दुनिया की लौटता हुआ 
ईश्वर है । 


वैरागी को वहम था
कि उसे ईश्वर चाहिए !

Thursday, April 30, 2020

प्रतीकों के बाहर













घर को चला है
मजदूर
लाकडाउन में
दो बच्चे भूखे
एक पत्नी बीमार 
उसका सामान हैं।

दूर नहीं घर उसका
पलक भर दूरी है
लम्बी सड़कें तो बहाना हैं
घर एक सपना है
बस पलकें झपकाना है
वहां रोज का आना जाना है।

वह दुनिया उसकी नहीं
जहां रोज उगता है सूरज
जहां रात पड़ती है ओस
और तेज चलने से
घट जाती हैं दूरियां।

वह दुनिया उसकी नहीं
जहां ठण्डे पानी से
बुझ जाती है प्यास
जहां अच्छे खाने के 
चन्द निवालों से
मिट जाती है पेट की तड़प.

वह
किसी और 
दुनिया से आया है.

वह दुनिया
हमारी भाषा के 
बाहर की दुनिया है

वह दुनिया
ईश्वर को प्रसन्न कर देने वाले मत्रों
के परास के बाहर की दुनिया है
शास्त्रों में कहीं भी नहीं हैं दृष्टांत
उस दुनिया के.

हमारी आंखों के सामने होते हुये भी  
अदृश्य सी है
वह दुनिया.

हमारे टूटे घरों को जोड़ने
खेतों में बीजों को प्रेम देने
कारखानॊं की मशीनों को
अपनी देह की गरमाहट से
पालने वाला वह
किसी और दुनिया से
उल्का पिण्ड की तरह आता है
हमारे जीवन की लय व तुक
हमें समझा कर
हमारे होने को आसान बनाकर
अदृश्य हो जाता है.

प्रेम नहीं, ग्लानि से भरी

हम अपनी भाषा में
उसके अदृश्य होने को
कोई शब्द देना चाहते है !

स्नेह नहीं, किसी न की गयी हत्या
के पश्चाताप से क्षुब्ध
अपनी संदेदनाओं के दबाव में
हम
उसकी पसलियों में
करकती भूख के लिए
कोई प्रतीक खोजना चाहते हैं.

नहीं मिलता कोई
शब्द,
नहीं मिलता कोई
प्रतीक.

उसकी पीड़ा
हमारी भाषा को 
असफल कर देती है
व हमारे अस्तित्व की 
वहनीयता को निरर्थक.