Tuesday, March 22, 2011

समय बच गया था


समय बच गया था,
अनवरत गुजरते हुये
हर द्वार पर से
बिना प्रतीक्षा किये
किसी की भी
कुछ की भी !

अहर्निश गतिशील रहते हुये भी
समय बच गया था
धुले गये बरतन किनारे
छुपी रह गयी चिकनायी की तरह ,
टॆबल ग्लास पर
पोछे जाने के बाद भी
चुपचाप बिछी रह गयी
एक पतली परत धूल की तरह
समय बच गया था ,
अनबीता !

स्मृतियों में फंसे....
न जिये जा सके
टुकड़े टुकड़े जीवन को
फिर से दिये जाने के लिये ,
काल चक्र की इस किताब के
कुछ पात्रों, 
कुछ संवादों को
फिर से,
ठहर कर ,
ठीक से 
सुने जाने के लिये,
दुहराये जाने को
दिये जाने के लिये
समय बच गया था !

दोपहर के घने नीरव सन्नाटे में
अलमारी में लाइन से सजी
अनेक किताबों की चुप्पी को
समझते हुये मैंने पाया कि
समय बच गया था ,
उन किताबों के पीछे
उजागर होते ही
कहीं और टिकुरने के लिये सरकती, 
कोने में सटकी 
छिपकली की तरह
समय बच गया था
मन में ,
स्मृति में ,
किसी किताब में
किसी पात्र के जरिये
फिर से गुजरने को !

Friday, February 4, 2011

अनुपस्थिति (२)


कमरा सब तरफ से बन्द था
फिर भी न  जाने  कहां  से
ठण्डी   हवा    आती   रही !

नब्ज रोककर पूरा    बदन सिकोड़े हुये
हर कतरा हवा का दूर फेंक आया था मैं
फिर भी सांस जाने कैसे आती जाती रही !

मेरी जिन्दगी की हर कहानी से अपने नाम के
हर   शख्स   को मिटाकर  चले गये हो तुम
दूर बहुत    एक   लम्बा  दरम्यां  बनाकर
दिल जानता है ये दिमाग को इकरार है इसका
फिर भी न जाने किस उम्मीद का  बहरूपिया
दिल के   इस   भोले दर्द    को  रोज सांझ
बेवजह ……………यूं ही …………….छेड़ …….जाता है !

Thursday, January 27, 2011

अनुपस्थिति


ढलते……उदास….दिन !
खाली साझें……सन्नाटा !

तेज चलती….रूखी…हवाएं !
बन्द गलियारों में बिखरे
सूखॆ ,खड़खड़ाते पीले पत्ते !

कहीं ये तुम्हारी याद के
कुछ और नाम तो नहीं ?
! !
! !
! !
दिनभर सो कर उठा हूं मैं
चलूं कुछ काम करूं ………..!

जिन्दगी ऐसे तो नहीं चलती ! 

Wednesday, January 12, 2011

दुनिया चलती रहती है !

यह दुनिया चलती रहती है !
चलती रहती है
और चलती रहती है !

क्योंकि इस दुनियां में
बहुत से अच्छे साफ दिल लोगों ने
बड़े मन से खूब चभककर
जिससे अच्छावाला प्यार किया
उसे ब्याह सके !

तरह तरह की बातें सोच
चुप रहे
फिर चुप ही रह गये
कुछ कह सके  !
फिर ?
फिर क्या? ???

लुट गये
पिट गये
कुच गये
दिल दिमाग सब
पिचुक गये
सिद्धान्त सब झर गये
बदल गयी बोली
फिर ?
फिर क्या???

ढल गये दुनियादारी में
मानने लगे पप्पा का हर कहा
चुपचाप कर ली नौकरी
उहां वाले मौसा के मामी
के फलनवां दमाद की
सुघ्घर सी बिटिया के
जीवन में कर गये अजोर !
फिर ?
फिर क्या???

कविता खतम ! ! !
रहा है याद कुछ पुराना ???
छोड़िये हटाईये ……….
जाइये मूं धोकर आईये !
यह दुनिया चलती रहती है !
चलती रहती है और चलती रहती है...........
  

Wednesday, December 22, 2010

जाड़ !

किसी अन्जान,अर्थहीन
दुख के आगोश में
खामोश हरे पेड़ो ने
छोड़ दिया 
अपने अन्तर की उष्मा को
संचित रखने का 
अन्तिम आग्रह !

शाम की जर्द पीली धूप ने
सूरज के चाहते हुये भी
पेड़ो को देने के लिये
कुछ गर्म सपनों की खातिर
किसी पुराने मकान के
मटमैले जर्जर छ्ज्जे पर
खुद को निचोड़ दिया
एकदम अन्दर तक------अन्तिम तह तक !
लेकिन……………..s..s..s..s…s
झरा कुछ भी नहीं सिवाय
दो बूंद ठण्डे
अपदार्थ , अभौतिक , पीलेपन के !

छज्जे पर बैठी गौरैया
बिना चूं चूं किये उड़ गयी
दरार में उगा हिजड़ा पीपल  हिलने लगा !
और वर्षों पहले पेन्ट की हुयी
खदरती खिड़की की कुण्डी खॊल
घर में अकेले रहने वाले बुढ्ढे ने
छज्जे पर पिच्च से थूक दी सुर्ती !

धूप
पीलेपन
पीपल
और बुढ्ढे -----
सबसे सर्वथा मुक्त ,
आग्रहहीन एवं 
हर दृष्टिकोण से सरलीकृत
पेड़ॊ की हर डाल
हर पात पर
उतर आयी 
जाड़----
ठंडी 
सफेद 
शुष्क !


Wednesday, December 15, 2010

ज्वार

ज्वार आया
और चला गया !

तुम्हारे कुछ
शब्दों के साथ
किनारे रेत में
अटका रह गया मैं !

धूल धूसरित
पहचानहीन
चुप !  

Saturday, December 4, 2010

बनारस के ब्लागर्स ...

अरविन्द जी के घर पर आज शाम को बनारस में एक छोटी सी ब्लागर्स मीट . फॊटो में एम वर्मा , आन्टी जी,  उत्तमा दीक्षित , मैं , देवेन्द्र पाण्डेय , अरविन्द मिश्र , बनारसी जी . (बायें से दायें) 









आओ ! बैठो !
चलो , कुछ बातें करें !
बोले , बतियायें !
कुछ सुनें , सुनायें !
कथायें तुम्हारी
कुछ व्यथायें हमारी
गीत कुछ अनकहे
कुछ सपने पुराने !

बैठो ,आराम से पैर करके ऊपर !
कुछ सोचते हुये चाय पीते रहो .
दिल में तुम्हारे इक किताब छोड़कर
कई शब्द  जो बहुत पहले ही तुमसे
रूठ कर झर गये अकेले आंख की कोर से
बुलाओ उन्हें मनाओ उन्हें
हमने मिलकर बनाया है इक छन्द प्यार का ,
इसी में पिरोऒ उन्हें , सजाओ उन्हें !


Wednesday, November 24, 2010

अरे प्यारे भगवान जी !

(जीवन , मृत्यु , प्रेम , संवेदनाएं , विचार इत्यादि ही कविता की मुख्य विषयवस्तु क्यों हॊ ? क्या ठोस  वैज्ञानिक तथ्य व प्रक्रियायें कविता का विषय नहीं हो सकती ? मेरा मन कहता है क्यॊं नहीं हो सकती ? तो परिणाम स्वरूप यह कविता -----)


अरे प्यारे भगवान जी !
कहां से किया तुमने बी. टॆक.
और की
टेक्नालाजी की इतनी पढ़ाई
कि बना सके
यह  जबरदस्त पृथ्वी !!!


मैं तो हैरान हूं
मैं तो परेशान हूं
छत पर खड़े हो कर देखता हूं आसमान
देखता हूं-- स्ट्रेटॊस्फीयर , मेजोस्फीयर , आयनोस्फीयर ,
देखता हूं यह संख्याओं की औकात नापता अनन्तः विस्तार ।



मन भुनभुनाता है अपने आप में ही सोचकर
तुम्हारी यह
हजारों विचित्र व महीन अनवरत प्रक्रियाओं को
चुपचाप इतनी सरलता से
निष्प्रयास अन्जाम देती
केमिस्ट्री !


सतह से पन्द्रह किलोमीटर ही ऊपर
क्षोभमण्डल में तापमान का इतना घटाव ,
यह माइनस सिक्स्टी डिग्री का टेम्परेचर !!!
फिर पचास किलोमीटर ऊपर समताप मण्डल में
ऋण पांच से पांच डिग्री का बढ़ाव ! ! !
फिर इसी तरह अस्सी किलोमीटर पर
ऋण एक सौ दस डिग्रीसेन्टीग्रेट
और चार सौ किलोमीटर यानी आयनोस्फीयर के
उपरी भाग में
धड़ाम से एक हजार डिग्री सेन्टीग्रेट ! ! !


क्या बात है !
विचित्र बात है !
सोचता हूं पगलाता हूं !




यह ठीक है कि
समताप मण्डल में
ओजोन गैस के गलियारे हैं
और सोखकर पराबैगनी विकिरण
ओजोन बढ़ा देती है ताप यहां !! !


यह भी ठीक है कि
आयनन मण्डल में
यही थेथर पराबैगनी किरणें
बेचारे परमाणुओं के सर फोड़ फोड़
कर देती हैं उन्हें आयनित
और इन उष्माक्षेपी अभिक्रियाओं से
निकली उष्मा से
बौरा जाता है आयननमण्डल ! ! !



लेकिन
मेरे प्यारे भगवान जी ! !
ये इतना जबरदस्त अरेन्जमेंट
हुआ कैसे आपसे
कि एक पूरी बड़ी सी लैब ही
फैला डाली इस बेचारी
आज्ञाकारी   पृथ्वी के आसपास ! ! !




जरा कहो तो !
कुछ बताओ तो !


ट्रेड क्या था तुम्हारा ? ? ?
आयनोस्फीयर की व्यवस्था देखकर तो यही लगता है
कि जरूर तुम
ईसी  ब्रान्च से रहे होगे !
नहीं तो कैसे बांटते तुम इस पूरे मण्डल को
डी , ई वन , ई टू , एफ वन ,एफ टू एवं जी परतों में !
कैसे तुम निर्धारित करते कि
डी रिफ्लेक्ट करेगा लांग रेडियेशन वेव्स
ई वन , ई टू मिडियम रेडियेशन वेव्स
एफ वन ,एफ टू शार्ट रेडियेशन वेव्स
व जी बचा खुचा सब !



यह इतना कठिन निर्धारण ?
हर तरंग के लिये अलग अलग ?
हमने तो सोचा था कि
हम सबके लिये
बस यह एक चुल्ली सा मन
और उसमें उछलने वाली
कुछ टिड्डी जैसी भावनाएं बनाकर
इन्हें  उलझे रहने के लिये
कुछ किताबें व
दो चम्मच प्यार देकर
तुम सेफ मॊड में पड़े
आराम कर रहे होगे !




लेकिन नहीं
श्योर हूं मैं
कि खूब मन से की है तुमने
तकनीकी और विज्ञान   की
जबरदस्त पढ़ायी
व चिति के लास्य से निःसृत
इस विशद प्रकृति के
समस्त प्राकृतिक संसाधनों ,
इसके जीवनदायी, निर्व्याज सौन्दर्यभूषित
शस्य श्यामल , हेम आप्लावित
उत्तुंग गिरि शिखर , कन्दरा , गर्त
गुह्य गह्वर
तथा मूर्तिमान रहस्य , इस
गूढ़, असीम , शून्य व्योम के
प्रत्येक सौष्ठव , प्रत्येक सौन्दर्य
व प्रत्येक रहस्य के पीछॆ
खूब ठीक से रचा है
पूरी तरह समझा जा सकने वाला
एक निश्चित व निर्धारित पैटर्न !

Sunday, October 10, 2010

रीडर रिस्पान्स थियरी पर........

चट्टानें बोलती हैं ।

(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )

जो गढ़ी गयीं
मूर्ति बन गयीं
मन्दिर में सज गयीं
वे भी .

जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
सड़कों पर बिछ गयीं
वे भी. 

चट्टानें बोलती हैं ।

(इसमें अर्थ न खोजें
यह कविता नहीं है । )

जो गढ़ी गयीं
मन्दिर में सज गयी
वे पद्य में बोलती हैं
भक्त से बात करती हैं ।

जो तोड़ी गयीं
कंकड़ बन गयीं
वे गद्य व सूत्र में बोलती हैं
जियोलाजिस्ट से बात करती हैं ।

तो
चट्टानें ,
हालांकि बोलती हैं
लेकिन इसमें अर्थ न खोजें
यह  कविता नहीं है !

Wednesday, October 6, 2010

थोड़ी देर ....

चलो . . . ! ! !
थोड़ी देर . . .
साथ रहें !

एक दूसरे को फोन करें
 और...
 हैलो भी ना बोलें ।

बहुत देर तक
चुप रहें . . .

और बिना  कुछ कहे
हल्की सी सांस छोड़
फोन रख दें ।

इतनी दूर होकर भी
चलो . . .! ! !
 थोड़ी देर
साथ रहें !

Thursday, September 30, 2010

खाली समय में

राम !
तुम घबराना नहीं,
तनिक भी डरना नहीं !
तुम्हारी नियति का फैसला
एकदम संवैधानिक होगा  !
सब कुछ
साक्ष्य और धाराओं के
सटीक सहयोग से उपजेगा !
तब तक
राम !
तुम बैठ कर
थोड़ा आराम करो !
खाली समय में कुछ किताबें पढ़ो ,
बाल्मीकी रामायण ,
उपनिषद इत्यादि तो होगें नहीं पास तुम्हारे,
रामचरितमानस के ही
कुछ पन्ने पलटॊ ,
कुछ गुनगुनाओ
एकदम मत डरो !
\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\

मोहम्मद !
 तुम भी मेरी बात मानो ,
चिन्ता एकदम न करो !
असुरक्षित प्रशासनिक राजनैतिक संबन्धों से
जरूर मेरे इस देश की देह पर दिखने लगे हैं
एड्स के कुछ लक्षण
लेकिन तुम निश्चिन्त रहो
कोर्ट पर विश्वास रखो
क्योंकि
कोर्ट को नहीं बनानी है फिर से सरकार
और कोर्ट की अलमारी में सौभाग्यवश
नहीं रखा है कोई भी धर्मग्रन्थ !!!

तो तुम भी
रेहल की गर्द पोछो
और कुरान खॊलकर
कुछ पन्ने पलटो!
जरा देखो कि
सब अर्थ सब व्याख्याएं
ठीक ठाक हैं न !

Friday, September 24, 2010

प्रतिध्वनि !

तुम्हारी आवाज
छोटे छॊटे
अलग अलग
असंबद्ध टुकड़ों में
बहुत देर तक
गिरती रही
मेरे भीतर के किसी
गहरे

और गहरे

कुएं में

हां कुएं  में  !




सनसनाती हुयी

तेजी से

नीचे

और नीचे
बढ़ती

तुममें आयी बदलाहट का अर्थ लिये
मरे शब्दॊं की शिराओं में दौड़ती
जिन्दा आवाजें

अपने पीछे
कुछ हल्की फीकी पड़ती
आवाजों का एक धुआं -सा छोड़ती

अन्ततः उस गहरे कुएं में
बहुत अन्दर तक गयी !

लेकिन वहां
सन्नाटा
जमें हुये लावा की तरह
इतना अधिक और गाढ़ा था
कि
शायद
दम घुट गया उनका !

क्योंकि शून्य मन
जोहता हूं बहुत देर से
अभी तक नहीं आयी
कोई प्रतिध्वनि !

Sunday, September 19, 2010

वेश्यावृत्ति


जीवन तो
जाने कब का
चुक गया था


फिर
वहां

मौत
थी

वही मौत

॒॒॒॒॒॒॒

जाने क्यॊं

चीजें
पैदा हुयी थी

जाने क्यों
चीजें
खत्म
हो गयी


फिर
वहां

मौत
थी


वही
मौत


॒॒॒॒॒॒॒

सब
फूल झर गये

पंछी
सब मर गये
वृन्त
सब पीत हुये

शब्दॊं
में भर गयी सड़ान्ध

उत्सव
की स्मृतियों में लग गये दीमक
मर
कर सड़ गया

प्यार

देह
को उसकी

नोच
कर कौवे

खा
गये


फिर
वहां

मौत
थी


वही
मौत

॒॒॒॒॒॒॒

समय
ने खॊले

फिर
जाने
कितने
नये
चकलाघर

धुंआधार
चलने लगी

फिर
वही

हां वही
जीवन
की अबाध
वेश्यावृत्ति