Saturday, February 16, 2013

मंगलेश डबराल को पढ़ते हुये

कवि हो जाने के बाद एक बार ठीक से

दुबारा कवि न हो पाना वापस

मुश्किल है बहुत ही  शायद असंभव भी !


शुक्र है मैं कवि नहीं हूं ! 

ईश्वर सभी कवियों की आत्मा को शान्ति दे  !

Wednesday, February 13, 2013

अधूरी इच्छा

सुर्ख़ लाल
दहकते कोयले जैसा प्यार
तुम्हें करने की
हुलस कर अधूरी रह गयी
बलवती इच्छा .........! !

याद आयीं अभी 

काट कर लटकाये गये
मांस के लोथ से टपकती

अदृश्य दर्द की बूंदे !!!

Monday, January 21, 2013

प्यार किसी का !


कभी कभी
रंग होता है
हवाओं में भी
और बोलती है
धूप की पीली चिड़िया भी
अगर हो आखों में
प्यार किसी का
अनबोला ,अनचीन्हा सा !
     

Saturday, January 19, 2013

आज की सुबह !


छलकती है

पहाड़ॊं के पीछे

पिघली चांदी की नदी

 छोटी छॊटी पंक्तियों में

लगी सफेद बादल की मेड़ॊं पर

पड़ रही छीटें !

 

आसमान की क्यारियां

हो रही भोर के उल्लास में

नीली पीली !

 


इस तरफ की

गहरी धुन्ध भरी घाटी में

बाकी है

बिखरी रात की स्याही

आकर जिसे अभी लीप देगी

जलती चांदी की नदी में तैरती

सूरज के चमकदार हीरे की डोंगी ! 





 

 

Friday, January 11, 2013

आधा इन्द्रधनुष !

तुम्हारे बायें कपोल पर
ठीक कान के पास से  
नव्य हरित लतिका प्रतान सी
एक हल्की सी रेखा
ठुड्डी के  पीछे से शुरू हो कर
बिलकुल वहां तक जाती है
जहां से
गार कर
अमावस की एक भरी-पूरी प्रौढ़ रात
निचोड़े गये दो चार बूंद
कजरारे रंग रंगे तुम्हारे केश
शुरू होते हैं !

शायद वो कोई नस है ...मध्दम सी

जैसे  सफेद बर्फ के पहाड़ पर  
छिटकती सुबह की पीली आंच से उलझ कर
नील व्योम की तरफ
लरजती क्वांरी भाप की लतायें !

अक्सर देखा करता हूं मैं उन्हें , निःशब्द
समय की डॊंगी से उतर कर ,
जमे हुये सन्नाटों से लिपटे कुछ क्षणॊं में  
जब तुम मगन हो कुछ कर रही  
अनभिज्ञ होती हो मुझसे !

मन में मेरे सामने की पहाड़ी पर
रूपायित हो उठता है
तीव्र वर्षण उपरान्त
सद्य स्नात ,खिला हुआ
धवल नीलाभ गगन
और उस पर उस किनारे
अभी अभी उठ कर डूब गये
किसी मधुर राग-सा,
उगा हुआ
आधा इन्द्रधनुष  !

Monday, January 7, 2013

खरगोश कहीं के ! ! !

हल्की नीली जीन्स पर
ब्राऊन कलर के मोन्टे कार्लॊ जैकेट में
प्योर वूलेन ऐरॊ का
टहकार काला मफलर डाले
इस साफ सर्द दुपहर में
तुम
सफेद झक झक फूलॊं की
एक पंक्ति पर झुकी हुयी
थोड़े दूर खड़े मुझ को
कुछ दिखाने की कोशिश में
बड़े खुश-से हो !
खरगोश कहीं के ! ! !
मैं देखता हूं ,
और बस देखता हूं !
शान्त , स्तब्ध .
झाग-से रंग के कोहरे की
एक हल्की परत
मेरे तुम्हारे बीच में है
और  उससे कहीं गाढ़ी
ठीक तुम्हारे पीछे  
जैसे हवा के जुलाहे ने
बिखरे इन रजत तुहिन कनों से बुनकर
झीना सा भींगा हुआ एक दरीचा
टांग दिया हो
तुम्हारे पीछे !
मैं देखता हूं ,
और बस देखता हूं !
विस्मृत, स्थिर.
खरगोश कहीं के ! ! !

Sunday, December 23, 2012

आज फिर



आज फिर
पहाड़ों पर हुयी होगी सांझ,
लेकिन नहीं था मैं वहां !
सांझ हर एक ,हर एक रात
सदियों का एक, एक कदम !! !

आज फिर
गहरी काही सिलवटों में उलझी
पहाड़ॊं की तलहटी में
नीली धुन्ध के फाहों की पांख लिये
बूढ़े अपरान्ह के उदास पीले परिन्दे उतरे होगें
और रात को जन्म देकर
गर्भवती सांझ सदा के लिये
आसमान से झालर की तरह लटकती
इन सारामती की चोटियों पर
कहीं सो गयी होगी !
इस तरह सदियों ने
एक कदम और चल लिया होगा !
लेकिन नहीं था मैं वहां !

हर सांझ,
शायद एक पुष्प !
और समय ,
जो इन इतिहास चबाती विशद पहाड़ियों पर
अनन्त काल से बीत रहा है
अनन्त काल तक बीतता रहेगा,
एक वृक्ष !!  !
हर रोज दिन ढले
पहाड़ियों पर आच्छन्न
समय के इस वृक्ष पर
सांझ का फूल खिलता है !
सूरज के कटोरे में
लाल केसरिया कत्थयी आदि
कई विचित्र अवर्णनीय रंग घोल
कभी स्निग्ध नीले आसमान की पंखुड़ी पर
तो कभी आक्षितिज निर्लेप विस्तृत  
समुद्री हरे रंग के सन्नाटे का बूटा जड़ी
किसी अज्ञात  प्रिय को समर्पित-सी बिछी
जंगल की दरी पर
फेंका जाता है  !
आधी हरी आधी नीली
वो चटकार जंगली चिड़िया
जिसका नाम मैं नहीं जानता
मेरी बालकनी के सामने वाले
पाईन की फुनगी पर बैठ
दूर तलक 
अपनी रस्सी जैसी बिखरने वाली हूंक से
फेकें गये रगों को 
यहां वहां सजाती है !

इस तरह 
सांझ का फूल खिलता है
रात को जन्म दे झर जाता है  !
सदियां एक कदम और चल लेती हैं
समय का वृक्ष 
थोड़ा और बड़ा हो जाता है !
लेकिन आज जब यह सब हुआ  
नहीं था मैं वहां !

Saturday, December 22, 2012

काल-पुरुष मौन होगा !


त्रास !

..............

मूल्य , अस्मिता और संवेदनायें

वर्षों पहले पुते चूने की पपड़ी-से
झरते दिखते होंगे तुम्हे

हास्पीटल के उस कमरे में

जहां तुम्हारी क्लान्त आत्मा

अपनी क्षत-विक्षत देह की गुदड़ी

लपेटे

समय के वेन्टिलेटर पर पड़ी होगी !


तुम्हारी भीगी सूखी
बन्द पलकों के अन्धियारों में

भटकते होगें वो कई अनाथ निश्छल प्रश्न

जो तुम्हारी आत्मा ने गीली आर्त ध्वनि में

पूछा होगा काल पुरुष से !

और वह मुंह फेर चुप रहा होगा !

चुप रहा होगा इस बात पर कि

तुम्हारे इस छोटे से हिस्से में उगा , फैला

आदमी का यह बसाव  

परिमार्जन और विकास की इतनी कबड्डियों के बाद भी

इतना विषण्ण ! इतना हीन ! कैसे ?? !!!


धर्म , दर्शन , विज्ञान और तकनीक की

संलग्न अनुशंसायें लिये फिरता यह जीव

भौतिकी से परा भौतिकी की सुर्तियां चुभलाता यह जीव

इतना कुत्सित ! इतना जघन्य ! कैसे ?? ! !


त्रास !


काल-पुरुष मौन होगा ! अनुत्तरित !






Saturday, August 11, 2012

काई

मन ,
जैसे काई हो ...
जम गया हो
समय की चिकनी फर्श पर
छितरा हुआ ....

Friday, July 6, 2012

“कालिंग”……..

नये वाले मोबाइल के भी
कान्टैक्ट में सेव हैं
कुछ पुराने,
बन्द पड़े , 
आऊट आफ़ सर्विस,
नम्बर  !

अपरिचित अन्धेरों और
असम्बद्ध सन्नाटॊं से त्रस्त
किसी रात
टेबल पर बैठा ,
कलम खुट खुट करता,
लैम्प की रोशनी पढता ,
मन
दिनों बाद
न जाने कब
मोबाइल पर चला जाता है
और
यह जानते हुये भी कि
इन नम्बरों पर अब फोन नहीं जाता ,
मर चुके हैं ये नम्बर ,
डायल कर देता है उन्हें !

स्क्रीन पर 
चिन्ह उभर आता है
“कालिंग”……..
और बिन्दुओं की एक रेखा 
जलती बुझती रहती है …

Saturday, April 7, 2012

फिर से प्यार ...


(यह समयान्तर में छ्प चुकी एक पुरानी कविता है)


चलो छॊड़ो जाने दो
अब वह बड़ा वाला प्रेम ,
वो सच्चा और गहरा वाला प्रेम ,
वो निर्मल वर्मा और अज्ञेय वाला प्रेम ,
वो इमली ब्रान्टॆ और लारेन्स वाला प्रेम ,
चलो छोड़ो , रहने भी दो
वह तो हो चुका अब हमसे ।

आओ चलो !
शाम को टहलते हुये
क़ाफी पीने चलते हैं ।
नेस्कफे में किनारे वाली बेन्च पर
आमने सामने बैठते हैं
लंका के अरोमा प्रोविजन से
आते वक्त खरीदी गयी
वनीला पेस्ट्री व चाकलॆट पास्ता के बाद
दो गरम गरम झाग भरी कापचीनो मंगाते हैं ।
आसपास बैठे
चूं चूं करते, परस्पर निमग्न
एकदम जोरदार व जबरदस्त प्रेम करनेवालों से
बिलकुल अलग
बहुत देर तक बिना किसी भाव के
अनुद्विग्न , शून्य
हम
एक दूसरे से
हल्की हल्की ढेर सारी बातें बतियाते हैं ।
बातें, साबुन के बड़े बड़े फुग्गों सी बातें
जो अपने आप में
एकदम पूरी होती हैं ,
कुछ देर तक मन के व्योम में
हौले हौले तैरती रहती हैं
और फिर पीछे अपने
सिवास हल्की सी नमी के
और कुछ नहीं छोड़ती  ! ! !

तो इस तरह बतियातें हैं ।

बतियानें में यदा कदा
एक दूसरे को देख भी लेते हैं
जैसे अनवरत वर्षों से
एक दूसरे को ही देख रहे हॊं
या जैसे
एक पेड़ दूसरे पेड़ को देखा करता है ----
चुपचाप ---बिना किसी भाव के
बस एक अनभिव्यक्त अन्तःप्रेरणा से ।


आओ चलो ! ज्यादा न सोचो !
न तुम अमृता प्रीतम हो सकती हो
और न मैं इमरोज़ .
सिर्फ किताबें पढ़ने से कुछ नहीं होता ।
देखॊ ! सद्य प्रसूता स्त्री सी जीर्ण ,
सिक्त व तुष्ट उदासी लिये इस पीली सांझ की
अलसायी हवा में
शान्त , गाढ़े हरे , कतारबद्ध खड़े
इन विशाल रहस्यमयी पेड़ों के लिये
शिशिर का सन्देश है ।
अगर मैं कवि होता
तो इस पर एक अच्छी कविता लिखता,
तुम्हें
इन रम्य वृन्तों पर खिले
प्रगल्भ रक्तिम पुष्प
और स्वयं को
तुम्हारे आसपास की
स्नेहिल हवा लिखता  ! !
लेकिन छोड़ो ! !
न मैं लारेन्स का पाल मारल हूं
न तुम मिरियम ।
चलो , अन्धेरा काफी हो गया है
अब नेस्कफे बन्द होगा ।

Tuesday, September 6, 2011

अन्ना को समय ने रचा है ।


अन्ना को समय ने रचा है
वह बहरा नहीं है

संस्कृतियों के मेले से छांटकर
समय 
अपनी उत्तुंग प्राचीर पर 
टांकता है
अव्यय मूल्यों के 
कुछ क्षीण भित्ति-चित्र !

समुदाय के सामूहिक बौद्धिक नैतिक
ह्रास के प्रतिपक्ष में
अन्वेषित की जाती है
विनय अहिंसा मण्डित
पुनर्नवा आस्था !

अन्ना को समय ने रचा है
वह बहरा नहीं है

तृषा व्योमोह में
स्वत्व के सत्व -स्खलन से
रचे जा रहे
विकृत भ्रटाचार के  
व्यभिचारी विश्वकोश खण्डन में
सतत लिपि बध्द की जाती है
आत्म प्रतिबध्द,
विनिर्माण हेतु शतधा आबद्ध,
विशद प्रासंगिक नैतिक मूल्यों की
निस्पृह संहिताएं !

अन्ना को समय ने रचा है
वह बहरा नहीं है

Saturday, July 30, 2011

विस्मृत....... सदा के लिये !


दर्द ठीक हो गया
तो बची रह गयी
अगली खुराक ,
मेज पर पड़ी है
धूल फांकती,
किसी दिन फेंक दी जायेगी
एक अर्थहीन निर्मम
सहानुभूति के साथ ।

कुछ ऐसे ही
पुरानी कापियों के पिछले पन्नों में
आधी ढरक कर
बिना पूरा हुये ही
चुप हो , ठहर कर
सूख गयी है
कई
तरह तरह की
विचित्र और अद्भुत
कविताएं  !
किसी दिन
अपनी अपूर्णता के सन्दर्भ  में
परिभाषित होकर
कर दी जायेगी
विस्मृत
सदा के लिये !

Friday, May 13, 2011

फिर कभी !


खुद ही सब कुछ छोड़ आये हैं
फिर भी एक कतरा बेजुबान सी
उम्मीद है कहीं कि 
वहां से आवाज आयेगी
फिर कोई !

सबको पहचानते थे बखूबी
रंग रंग से वाकिफ थे उनके
फिर भी सबके सामने कर दिया इन्कार
किसी एक को भी पहचानने से
(वहएकहीकईहोकर आया था !)
तब भी एक बात बेबात सी है मन में
कि वे आयेंगे बुलाने हमको
फिर कभी !

दर्द को मांगने
लब्ज आया तो था
हमने गुरूर में कह दिया, जाओ !
तुम्हारे बस की बात नहीं ,
मिलेगें,
फिर कभी !