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Saturday, August 11, 2012
Friday, July 6, 2012
“कालिंग”……..
नये वाले मोबाइल के
भी
कान्टैक्ट में सेव
हैं
कुछ पुराने,
बन्द पड़े ,
आऊट आफ़ सर्विस,
आऊट आफ़ सर्विस,
नम्बर !
अपरिचित अन्धेरों और
असम्बद्ध सन्नाटॊं
से त्रस्त
किसी रात
टेबल पर बैठा ,
कलम खुट खुट करता,
लैम्प की रोशनी पढता
,
मन
दिनों बाद
न जाने कब
मोबाइल पर चला जाता
है
और
यह जानते हुये भी कि
इन नम्बरों पर अब फोन
नहीं जाता ,
मर चुके हैं ये नम्बर
,
डायल कर देता है उन्हें
!
स्क्रीन पर
चिन्ह उभर आता है
चिन्ह उभर आता है
“कालिंग”……..
और बिन्दुओं की एक
रेखा
जलती बुझती रहती है …
जलती बुझती रहती है …
Saturday, April 7, 2012
फिर से प्यार ...
(यह समयान्तर में छ्प चुकी एक पुरानी कविता है)
चलो छॊड़ो जाने दो
वो सच्चा और गहरा
वाला प्रेम ,
वो निर्मल वर्मा
और अज्ञेय वाला प्रेम ,
वो इमली ब्रान्टॆ
और लारेन्स वाला प्रेम ,
चलो छोड़ो , रहने
भी दो
वह तो हो चुका अब
हमसे ।
आओ चलो !
शाम को टहलते हुये
क़ाफी पीने चलते
हैं ।
नेस्कफे में
किनारे वाली बेन्च पर
आमने सामने बैठते
हैं
लंका के अरोमा
प्रोविजन से
आते वक्त खरीदी
गयी
वनीला पेस्ट्री व
चाकलॆट पास्ता के बाद
दो गरम गरम झाग
भरी कापचीनो मंगाते हैं ।
आसपास बैठे
चूं चूं करते,
परस्पर निमग्न
एकदम जोरदार व
जबरदस्त प्रेम करनेवालों से
बिलकुल अलग
बहुत देर तक बिना
किसी भाव के
अनुद्विग्न ,
शून्य
हम
एक दूसरे से
हल्की हल्की ढेर
सारी बातें बतियाते हैं ।
बातें, साबुन के
बड़े बड़े फुग्गों सी बातें
जो अपने आप में
एकदम पूरी होती
हैं ,
कुछ देर तक मन के
व्योम में
हौले हौले तैरती
रहती हैं
और फिर पीछे अपने
सिवास हल्की सी
नमी के
और कुछ नहीं
छोड़ती ! ! !
तो इस तरह
बतियातें हैं ।
बतियानें में यदा
कदा
एक दूसरे को देख
भी लेते हैं
जैसे अनवरत वर्षों
से
एक दूसरे को ही
देख रहे हॊं
या जैसे
एक पेड़ दूसरे पेड़
को देखा करता है ----
चुपचाप ---बिना
किसी भाव के
बस एक अनभिव्यक्त
अन्तःप्रेरणा से ।
आओ चलो ! ज्यादा न
सोचो !
न तुम अमृता
प्रीतम हो सकती हो
और न मैं इमरोज़ .
सिर्फ किताबें
पढ़ने से कुछ नहीं होता ।
देखॊ ! सद्य
प्रसूता स्त्री सी जीर्ण ,
सिक्त व तुष्ट
उदासी लिये इस पीली सांझ की
अलसायी हवा में
शान्त , गाढ़े हरे
, कतारबद्ध खड़े
इन विशाल रहस्यमयी
पेड़ों के लिये
शिशिर का सन्देश
है ।
अगर मैं कवि होता
तो इस पर एक अच्छी
कविता लिखता,
तुम्हें
इन रम्य वृन्तों
पर खिले
प्रगल्भ रक्तिम
पुष्प
और स्वयं को
तुम्हारे आसपास की
स्नेहिल हवा
लिखता ! !
लेकिन छोड़ो ! !
न मैं लारेन्स का
पाल मारल हूं
न तुम मिरियम ।
चलो , अन्धेरा
काफी हो गया है
अब नेस्कफे बन्द
होगा ।
Tuesday, September 6, 2011
अन्ना को समय ने रचा है ।
अन्ना को समय ने रचा है ।
वह बहरा नहीं है ।
संस्कृतियों के मेले से छांटकर
समय
अपनी उत्तुंग प्राचीर पर
टांकता है
अव्यय मूल्यों के
कुछ क्षीण भित्ति-चित्र !
समुदाय के सामूहिक बौद्धिक नैतिक
ह्रास के प्रतिपक्ष में
अन्वेषित की जाती है
विनय व अहिंसा मण्डित
पुनर्नवा आस्था !
अन्ना को समय ने रचा है ।
वह बहरा नहीं है ।
तृषा व्योमोह में
स्वत्व के सत्व -स्खलन से
रचे जा रहे
विकृत भ्रटाचार के
व्यभिचारी विश्वकोश खण्डन में
सतत लिपि बध्द की जाती है
आत्म प्रतिबध्द,
विनिर्माण हेतु शतधा आबद्ध,
विशद व प्रासंगिक नैतिक मूल्यों की
निस्पृह संहिताएं !
अन्ना को समय ने रचा है ।
वह बहरा नहीं है ।
Saturday, July 30, 2011
विस्मृत....... सदा के लिये !
तो बची रह गयी
अगली खुराक ,
मेज पर पड़ी है
धूल फांकती,
किसी दिन फेंक दी जायेगी
एक अर्थहीन निर्मम
सहानुभूति के साथ ।
कुछ ऐसे ही
पुरानी कापियों के पिछले पन्नों में
आधी ढरक कर
बिना पूरा हुये ही
चुप हो , ठहर कर
सूख गयी है
कई
तरह तरह की
विचित्र और अद्भुत
कविताएं !
किसी दिन
अपनी अपूर्णता के सन्दर्भ में
परिभाषित होकर
कर दी जायेगी
विस्मृत
सदा के लिये !
Friday, May 13, 2011
फिर कभी !
खुद ही सब कुछ छोड़ आये हैं
फिर भी एक कतरा बेजुबान सी
उम्मीद है कहीं कि
वहां से आवाज आयेगी
फिर कोई !
सबको पहचानते थे बखूबी
रंग रंग से वाकिफ थे उनके
फिर भी सबके सामने कर दिया इन्कार
किसी एक को भी पहचानने से
(वह ’एक’ ही ’कई’ होकर आया था !)
तब भी एक बात बेबात सी है मन में
कि वे आयेंगे बुलाने हमको
फिर कभी !
दर्द को मांगने
लब्ज आया तो था
हमने गुरूर में कह दिया, जाओ !
तुम्हारे बस की बात नहीं ,
मिलेगें,
फिर कभी !
Tuesday, March 22, 2011
समय बच गया था
अनवरत गुजरते हुये
हर द्वार पर से
बिना प्रतीक्षा किये
किसी की भी
कुछ की भी !
अहर्निश गतिशील रहते हुये भी
समय बच गया था
धुले गये बरतन किनारे
छुपी रह गयी चिकनायी की तरह ,
टॆबल ग्लास पर
पोछे जाने के बाद भी
चुपचाप बिछी रह गयी
एक पतली परत धूल की तरह
समय बच गया था ,
अनबीता !
स्मृतियों में फंसे....
न जिये जा सके
टुकड़े टुकड़े जीवन को
फिर से दिये जाने के लिये ,
काल चक्र की इस किताब के
कुछ पात्रों,
कुछ संवादों को
फिर से,
ठहर कर ,
ठीक से
सुने जाने के लिये,
सुने जाने के लिये,
दुहराये जाने को
दिये जाने के लिये
दिये जाने के लिये
समय बच गया था !
दोपहर के घने नीरव सन्नाटे में
अलमारी में लाइन से सजी
अनेक किताबों की चुप्पी को
समझते हुये मैंने पाया कि
समय बच गया था ,
उन किताबों के पीछे
उजागर होते ही
कहीं और टिकुरने के लिये सरकती,
कोने में सटकी
छिपकली की तरह
कोने में सटकी
छिपकली की तरह
समय बच गया था
मन में ,
स्मृति में ,
किसी किताब में
किसी पात्र के जरिये
फिर से गुजरने को !
Friday, February 4, 2011
अनुपस्थिति (२)
कमरा सब तरफ से बन्द था
फिर भी न जाने कहां से
ठण्डी हवा आती रही !
नब्ज रोककर पूरा बदन सिकोड़े हुये
हर कतरा हवा का दूर फेंक आया था मैं
फिर भी सांस जाने कैसे आती जाती रही !
मेरी जिन्दगी की हर कहानी से अपने नाम के
हर शख्स को मिटाकर चले गये हो तुम
दूर बहुत एक लम्बा दरम्यां बनाकर
दिल जानता है ये दिमाग को इकरार है इसका
फिर भी न जाने किस उम्मीद का बहरूपिया
दिल के इस भोले दर्द को रोज सांझ
बेवजह ……………यूं ही …………….छेड़ …….जाता है !
Thursday, January 27, 2011
Wednesday, January 12, 2011
दुनिया चलती रहती है !
चलती रहती है
और चलती रहती है !
क्योंकि इस दुनियां में
बहुत से अच्छे साफ दिल लोगों ने
बड़े मन से खूब चभककर
जिससे अच्छावाला प्यार किया
उसे ब्याह न सके !
तरह तरह की बातें सोच
चुप रहे
फिर चुप ही रह गये
कुछ कह न सके !
फिर ?
फिर क्या? ???
लुट गये
पिट गये
कुच गये
दिल दिमाग सब
पिचुक गये
सिद्धान्त सब झर गये
बदल गयी बोली
फिर ?
फिर क्या???
ढल गये दुनियादारी में
मानने लगे पप्पा का हर कहा
चुपचाप कर ली नौकरी
उहां वाले मौसा के मामी
के फलनवां दमाद की
सुघ्घर सी बिटिया के
जीवन में कर गये अजोर !
फिर ?
फिर क्या???
कविता खतम ! ! !
आ रहा है याद कुछ पुराना ???
छोड़िये हटाईये ……….
जाइये मूं धोकर आईये !
यह दुनिया चलती रहती है !
चलती रहती है और चलती रहती है...........
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