Saturday, January 1, 2022

आत्मा के सपने

तुम्हारी देह में

मैं नहीं खोजता तुम्हारी आत्मा 

जिससे छू सकूँ । 


आत्मा देह का सपना है। 

टूटने दो । 

तुम्हारे सीने पर जो दो आधे लिखे अक्षर हैं 

उन्हीं से रच कर एक अज्ञात लिपि 

मैं 

अपनी देह को देना चाहता हूँ 

सुधि के कुछ अधूरे खण्ड काव्य ।



वस्तुत: हमारी देहें 

पुतला है ! 

वे जीवित होना चाहती है ! 


देखो अपने होंठों को !

किसी जंगली फूल के लाल पत्ते ! 

सुनों, मेरे तुम , कहता हूँ तुमसे ! 

मध्दम स्पर्श की रोशनी में 

वे विलुप्त हो जाएँगें ! 

वे चलें जाएँगे खोजनें 

आत्मा के सपने ,

जीवित होने भ्रम !

साज़िश

 सच को दूसरे सिरे से देखने पर 

पता चलता है 

सच के प्रति हमारी वासना कितनी हिंसक है 


सच हर किसी को एक जैसा बना देने की साज़िश है

हम अपने होने की सजा पाते हैं ।


धीरे धीरे वे सभी लड़कियां  ख़त्म हो गई हैं 

जिन्हें मैं प्यार करता था 

या कर सकता था । 


ये मेरी अक्षमता नहीं है । 

उदासीनता भी नहीं है । 

ऊब भी नहीं है । 


ये है बस 

चीज़ों को ठीक से जान लेने के बाद की शान्ति । 


गहरे प्रेम 

उदात्त प्रेम को महान बताती तमाम कविताएँ व कवि 

अपराधी है । 



गहरी भावनाओं से हिंसा ऊपजती है ।

भावनाओं में गहरा हुआ प्रेम या तो हिंसक होगा या नपुंसक ।

Wednesday, May 20, 2020

पुतली




by anupriya 





                                                    हमारी  पद यात्राओं की थाप से ही 
                                                    धरती घूमती है अपने अक्ष पर,

                                                    हम जहां से आये थे 
                                                    वहीं लौट जायेगे ,

                                                    रास्तों को अपनी कथरी की तरह मोड़ कर 
                                                    साथ ले जायेगें ,

                                                    स्वेद व रक्त की बूँदें जो रह गयी है वहाँ
                                                    वही हमारा अर्जन हैं ,

                                                    टूटे मटमैले खिलौने जैसे अपने बच्चों को 
                                                    हम वे सौंप देंगे 
                                                    और कहेंगे 
                                                    कि 
                                                    वे इसे अपनी आँखों में पुतली बनाकर पहन लें !

Saturday, May 16, 2020

मिट्टी

जब मैं नींद से जागा 
मैंने अपनी देह को मिट्टी पाया 

हाथ मिट्टी पैर मिट्टी पूरी देह मिट्टी 

मैंने अपनी आत्मा खोजनी चाही 
मुझे मिला 
थोड़ी सी नम मिट्टी का एक ढेला 

मैंने कहा मेरी भाषा कहा है 
कुछ भुरभुरी मिट्टी के टुकड़ों ने कहा 
यहाँ हैं 

मैं चकित था 
मैंने कहा 
मुझे वापस करो मेरे स्वप्न 

सूखी दूर तक बिखर सके 
ऐसी मिट्टी के एक टुकड़े ने कहा 
चलो मैं चलूँ तुम्हारे साथ ! 

मैंने कहा मुझे मेरी धरती वापस चाहिए 
उन्होंने कहा 
तुम्हीं धरती हो 
सूरज की आँच से बचे हुए अंधेरों को 
अपने कणों में रक्त की तरह फैलने दो !

Friday, May 15, 2020

गति

मैं डरता हूं

वह कवि होने से

जो अपने ही बिम्बों की फफूंद में

भटक  जायेगा.

 

जो खुद को

अपने कहे अर्थों का 

जिम्मेदार मानेगा.

 

जिसे विश्वास हो चला है भाषा में

शब्दों पर,

उनके पुराने अर्थों में, पूरा.


जो कविता को लेकर 

जाना चाहता है

एक स्थान से

दूसरे स्थान पर.

 

           मैं डरता हूं

Tuesday, May 12, 2020

हवा

हवाओं को पता है

इस दुनिया के सारे रहस्य

इसलिए ही
वे चुप और अदृश्य रहती हैं ।

हवाएँ धरती की आत्मा हैं ।


मिट्टी पहाड़ सूरज नदी आदमी

सब हवाओं के यहाँ गिरवी हैं ! 

Saturday, May 9, 2020

अभिव्यक्ति

लकड़ी में छुपी आग 

हवा में चिड़िया की उड़ान 

मिट्टी में पहाड़

पत्थर में समय 

देह में मौत 


अभिव्यक्ति का मतलब 
हमेशा व्यक्त हो जाना नहीं होता ! 

जिम्मेदारी

भूख के लिए ज़िम्मेदार ठहरायी गई 
रोटी ! 
जीवन की दुर्घटना के लिए 
किया गया कटघरे में खड़ा 
हवाओं को ! 

नदी ने जब अपनी बात कही 
तो माना गया उसे बाढ़ 

कोयल ने मोर ने जब चींख चींख कर 
त्रासदी की चेतावनी दी 
उन्हें बताया गया सौन्दर्य के अप्रतिम गीत ! 

सागरों ने जब छोड़ दी थोड़ी सी ज़मीन सूरज के लिए 
किसी ने कहा इसे अपनी विजय ! 

Friday, May 8, 2020

ईश्वर की पालिटिक्स

उसके बनाये लोग 
जानने न लगे एक दूसरे को
इसलिए उसने गढ़ी भाषा 

प्रेम में हारे 
तमाम लोग 
उसे तलाश न लें एक साथ
इसलिए उसने खड़े किये 
पूजाघर 

उसके हाथों से बाहर 
न सरक जाय ये दुनिया 
इसलिए ही 
ईश्वर ने बनायी भूख !

भूख भाषा और सुरक्षित रहें पूजाघर 
इसलिए उसने चुने राष्ट्राध्यक्ष 
खोदीं सीमाएँ , खड़ी की सेनाएँ
हत्याओं को किया महिमामण्डित 


ईश्वर ! कैसे बने तुम क्रूर इतने ? 
आख़िर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है ?

Wednesday, May 6, 2020

अन्तहीन कथाओं की तलाश

Image from internet

कोई पुरानी इमारत
कोई पिछले जमाने का किला
कोई ऐतिहासिक खण्डहर

ये सब
समय की चादर में
बारीक सुराख से होते हैं.

इनके पास से गुजरते हुये
इनमें से होते हुये
हम अतीत की किसी आधी अधूरी कहानी में
कोई पात्र बन कर
अपने को ही पहचान लेना चाहते हैं


हजारों साल पहले तराशी गयी
किसी खिड़की को ताकते हुये
वस्तुतः हम खोज रहे होते है कोई रास्ता
सशरीर वापस लौट जाने का.

नहीं  ,यह अतीत का आकर्षण नहीं है.
गुलमोहर की डाल पर फुदकती
गौरैया भी जानती है समय एक चादर है  घने धुऎं की

हमारे लौट जाने की आस
अन्तहीन कथाओं की तलाश है.  


Sunday, May 3, 2020

बरसात जब होती है

Pic From https://paintingvalley.com/rain-drawing

बरसात जब होती है
सड़कें गलियां मिट्टी
सब भींग जाते हैं.
हर तरफ हर चीज नम
घिरे बादल ठण्डी हवायें
सब शान्त होता है.

मन ऐसे में भूल जाता है
समय के अनुशासन
स्मृति के तारतम्य ,
पुरानी बरसातों की
तमाम यादें
कर देता है घालमेल.

लगता है अचानक
कि अरे ये वही बरसात है
जिसने बचपन में
स्कूल के कमरे में
भर दिया था पानी
फिर गणित के अध्यापक ने कहा था
बाकी कल !
मन में फूट पड़े थे हुलास के
विकल झरने.

भान होता है
यही पानी की छीटें
करती थी घोषणा
कि कच्चे हरे आम
अब रसीले पीले होगें
और व्यग्र बालक कोई
स्मृतियों में
कर रहा होगा  घर में
आम की पहली खेप के लिए फसाद !

बरसात जब होती है
मन की परतों में वह गांव
जहां सारी पगडंडियां मिट्टी थी
नम हो ऊपर सरक आता है.

तरबतर हुयी मड़ई से
टपकता मटमैला पानी,
अपने मटमैलेपन में भी
एकदम साफ पानी
जमीन पर नीचे जो गढ्ढे बनाता था
उसकी सीधी रेखा का रहस्य
उनकी एक सी गहराई
आज भी विस्मित करते हैं.

शाम की लालटेन के
टिमटिमाते पीले उजास में
मढ़राते ढेर सारे भुनगे-पतंगों साथ
आग में भूनी भींगी मटर
पीसे मिर्चे साथ खिलाने वाले
वो बूढे बाबा न जाने कब के
खत्म हो गये !
बरसात जब होती है
फिर से पास आकर
इस तरह किसी बरसाती सांझ
मुझे अकेले पाकर
बहुत दूर के किसी अनजाने गांव में
घटा कोई रहस्यमयी किस्सा सुनाते है.

अब भी, बरसात जब होती है.


Friday, May 1, 2020

दिशाएं

ईश्वर 
अकेला होता हुआ 
प्रेम है ।


प्रेम 
दुनिया की लौटता हुआ 
ईश्वर है । 


वैरागी को वहम था
कि उसे ईश्वर चाहिए !

Thursday, April 30, 2020

प्रतीकों के बाहर













घर को चला है
मजदूर
लाकडाउन में
दो बच्चे भूखे
एक पत्नी बीमार 
उसका सामान हैं।

दूर नहीं घर उसका
पलक भर दूरी है
लम्बी सड़कें तो बहाना हैं
घर एक सपना है
बस पलकें झपकाना है
वहां रोज का आना जाना है।

वह दुनिया उसकी नहीं
जहां रोज उगता है सूरज
जहां रात पड़ती है ओस
और तेज चलने से
घट जाती हैं दूरियां।

वह दुनिया उसकी नहीं
जहां ठण्डे पानी से
बुझ जाती है प्यास
जहां अच्छे खाने के 
चन्द निवालों से
मिट जाती है पेट की तड़प.

वह
किसी और 
दुनिया से आया है.

वह दुनिया
हमारी भाषा के 
बाहर की दुनिया है

वह दुनिया
ईश्वर को प्रसन्न कर देने वाले मत्रों
के परास के बाहर की दुनिया है
शास्त्रों में कहीं भी नहीं हैं दृष्टांत
उस दुनिया के.

हमारी आंखों के सामने होते हुये भी  
अदृश्य सी है
वह दुनिया.

हमारे टूटे घरों को जोड़ने
खेतों में बीजों को प्रेम देने
कारखानॊं की मशीनों को
अपनी देह की गरमाहट से
पालने वाला वह
किसी और दुनिया से
उल्का पिण्ड की तरह आता है
हमारे जीवन की लय व तुक
हमें समझा कर
हमारे होने को आसान बनाकर
अदृश्य हो जाता है.

प्रेम नहीं, ग्लानि से भरी

हम अपनी भाषा में
उसके अदृश्य होने को
कोई शब्द देना चाहते है !

स्नेह नहीं, किसी न की गयी हत्या
के पश्चाताप से क्षुब्ध
अपनी संदेदनाओं के दबाव में
हम
उसकी पसलियों में
करकती भूख के लिए
कोई प्रतीक खोजना चाहते हैं.

नहीं मिलता कोई
शब्द,
नहीं मिलता कोई
प्रतीक.

उसकी पीड़ा
हमारी भाषा को 
असफल कर देती है
व हमारे अस्तित्व की 
वहनीयता को निरर्थक.



Wednesday, April 29, 2020

सभ्यता के ताम्रपत्र

मैंने देखा है पत्थरों 
को काग़ज़ जैसा 

जब मैं सम्राट था 
मैंने लिखे उन पर 
अपने विजय गीत 

जब मैं हार गया 
मैंने पूजा उन्हें 
आस्था के अभिलेख 
बने वे 


जब मैं कवि बना 
मैंने उनसे 
सन्नाटा सीखा 


भूखे मज़दूर की भूख में 
धैर्य का अल्पविराम 
पत्थरों की सीख थी 


जिसे बरसात भी काट सकती थी 
वह समय की धार को 
झेल गया 
पत्थर बना 
इतिहास के अभिलेख 
पले उसकी कोख में 


लाखों वर्ष पुराने 
किसी पत्थर से पूछो कभी 
सभ्यता की घास 
समय के जंगल 
मानव एक स्वप्न
कितने आये कितने गये ! 

अन्तत: ईश्वर बनने का बोझ
उठाया किसने ?

Wednesday, April 1, 2020

लाकडाउन कथा: कंसपीरेसी सिध्दान्त


Image from Internet
आज लाकडाउन का सातवां दिन है. भारत में अब संक्रमित लोगों की संख्या हजार के पार पंहुच गयी है. मरने वाले २९ के आसपास हो गये हैं. हर कोई डरा हुआ, भयग्रस्त है. सब अपने अपने तरीके से परिस्थिति का आकलन कर रहे है. और यही मान रहे कि स्थिति और खराब होने वाली है.  शाम को फोन पर मां  ने हम दोनों को सख्त हिदायत दी की अब कुछ भी हो जाय आने वाले दस दिनों तक एकदम घर से नहीं निकलना है. उनका इशारा मेरी ही तरफ ज्यादा था क्योकिं अनु तो वैसे भी दिन भर घर में ही यहां वहां करती रहती हैं. उनके लिए लाकडाउन की जिन्दगी कोई बहुत अधिक विचित्रताओं भरी नहीं है. एक सामान्य भारतीय लड़की के जीवन के कई साल तो नीयर लाकडाउन में ही बीतते हैं. तो दिन भर घर पर बने रहना, कुछ कुछ करते रहना, उनके लिए उतना उबाऊ नहीं है जितना मेरे लिए है.

दिल्ली में भी मामले बढ़ गये हैं. देश के अन्य हिस्सों में भी यही हाल है. दिन में दुकानें पूरी तरह बन्द रहती है. लोगों का डर अलग अलग रूपों में व्यक्त हो रहा है. सोशल मीडिया, न्यूज चैनल, अखबार, जो कि प्रिंट में आ नहीं रहे, केवल आनलाईन संस्करण मौजूद हैं, सब जगह बस एक ही चीज है: कोरोना. शुरुआत में, मतलब दस पंद्रह दिन पहले हम भारतीयों ने आदत अनुसार महामारी की गम्भीरता को समझा नहीं. जब तक यह चीन के वुहान, जहां से यह शुरु हुआ उसके आसपास व कुछ एक अन्य देशॊं में था, आम जनता का तो छॊड़िये, सरकरों ने भी सोचा की काम चल जायेगा. अन्ततः जब संक्रमण चीन से निकल कर पहले ईरान , फिर स्पेन और अब अमेरिका में हजारों को लोगों डस लिया, तब हमने मामले की गंभीरता को समझा और सब कुछ बन्द किया. लाकडाउन केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय  राज्यों में पहले ही घोषित कर दिया गया था.  

भय और आपदा की ऐसी स्थिति में तमाम तरह की कंसपीरेसी सिध्दान्तों का बोलबाला हो चला है. एक बात जो शुरु से ही सुनने में आ रही थी वो ये कि यह सब चीन ने जानबूझ कर किया. ये वायरस उसने अपनी प्रयोगशाला में बनाया और हर जगह फैला दिया. ऐसा इसलिए कि दूसरे देश उनके बनाये हुये आवश्यक आकस्मिक उपस्कर खरीदेंगे जिससे उनका व्यापार बढ़ेगा. इस पीछे जो सबसे मजबूत दलील दी गयी वो ये थी कि वुहान में तो यह वायरस फैला किन्तु पास के ही बीजिंग में नहीं फैला. इसके  उल्टे दूसरे देशों में तेजी से फैल गया. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कोरोना को चायनीज वायरस कहा.

इन बातों पर विश्वास करना न करना व्यक्तिगत चयन हो सकता है जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप के वाट्सेप ने आपको क्या बताया है. ! क्योकिं आजकल लोग मां-बाप-भाई-बहन की सुने न सुने एप की जरुर सुनते हैं. खुद इन बातों पर विश्वास करने से पहले मैंन जो तर्क अपने आप को दिये उनमें एक बात मैंने अपने आप को सबसे ज्यादा बतायी ( किसी और को बताना खतरे से खाली नहीं) कि आज विश्व की अर्थ व्यवस्था आपस में गहरे तौर पर जुड़ी हुयी है. चाहे अमेरिका हो या चीन या भारत या कोई बड़ी वैश्विक इकाई , एक दूसरे को बहुत ज्यादा नुकसान पंहुचाकर किसी को कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला है. चीन तो वैसे भी एक्सपोर्ट ड्रिवेन अर्थव्यवस्था है. भारत व अमेरिका जहां उसके बड़े व्यापार हिस्सेदार हैं वहीं यूरोपियन यूनियन जैसी  समूह भी महत्वपूर्ण हैं. चीन के कुल निर्यात का 4  से 5 % भारत आता है. इसी तरह लगभग 16 से 17 % अमेरिका जाता है. ईयू के आंकड़े भी लगभग इतने ही है. ऐसी स्थिति कॊई भी अर्थव्यवस्था अगर मंदी का शिकार होती है तो रिपल इफेक्ट से सब डूबेंगें. वाट्सएप पर यह बात हो सकता है न पहुंची हो लेकिन कुछ सत्य है इस तर्क में. कोई भी देश जानबूझ कर ऐसा नहीं करेगा. ऐसा करना आत्मघाती होगा. विश्व एक व्यवस्था से चलता है जिसे हो सकता है हम पूरी तरह न समझ पाते हों लेकिन वे काम करती हैं व उनमॆं बदलाव तत्क्षण व सरल नहीं होता.

एक बात यह भी है कि अगर मान लिया जाय कि चीन ने ऐसा जानबूझ कर किया तो यह देखना होगा कि वे इस वैश्विक महामारी से कैसे लाभ कमाते दिख रहे हैं ? क्या चीन स्वास्थ्य उपकरणों का बड़ा निर्यातक है ? चीन जो निर्यात करता है या कर सकता है उसके कम्पोनेन्ट क्या क्या हैं. इन्टरनेट जो जानकारी मिलती है वह इस प्रकार है:

"The top exports of China are Broadcasting Equipment($231B), Computers ($146B), Office Machine Parts($90.8B), Integrated Circuits ($80.1B) and Telephones($62B)." 
source: https://oec.world/en/profile/country/chn/ 



स्पष्ट है कि ज्ञात रूप से चीन स्वास्थ्य यंत्र बनाने की होड़ में नहीं है. हालाकि यह  मात्र एक आकलन है लेकिन यह आंकलन तथ्यों के आधार पर है. 

एक दूसरा पहलू ये भी है कि चीन व अमेरिका के बीच अभी कुछ दिनों पहले तक ट्रेड वार चरम पर था. यह ट्रेड वार भी एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा था जिसमें दोनॊं देश वैश्विक फलक पर अपनी हेजेमनी बरकार रखने के लिए सतत प्रयासरत हैं व अपना प्रभुत्व जताने का कॊई भी मौका जाने नहीं देते. इसी क्रम में अमेरिका ने मौका पाते ही वायरस को चायनीज वायरस बता दिया जिससे चल रही तमाम कंसपीरेसी सिद्धांन्तों को बल मिला. अन्यथा, कोरोना SARs परिवार का एक प्राकृतिक वायरस है. चीन की गलती ये थी कि उसने सही समय पर अपने डाक्टर्स की बात नहीं सुनी. जिस डाक ने इस महामारी के दस्तक की सूचना दी उसको प्रताड़ित किया व बिल्कुल भारतीय तरीके से सही आंकड़े सबसे छुपाये. इसके अलावा बाकी सब होक्स लगता है.


बहरहाल, आजकल कंसपीरेसी सिध्दान्तों का जमाना है. हर बड़ी वैश्विक घटना के पीछे इस तरह की कुछ संकल्पनायें खोज निकाली जाती हैं. कंसपीरेसी सिध्दान्तों के बारे में विस्तार से समझना रुचिकर हो सकता है. इस विषय पर ज्यादा अध्ययन तो नहीं है लेकिन मिशेल बरकन की एक किताब है “अ कल्चर आफ कंसपीरेसी” जिसकी मुख्य बातों को अगली पोस्ट में साझा करने की कोशिश करुगा !


Tuesday, March 31, 2020

लाकडाउन कथा: प्राग्माटिज्म !


वीरान सड़कें. दिल्ली गुड़गाव रोड
आज चार दिन हो गये सब कुछ बन्द हुये. लाकडाउन. सब कुछ बन्द. दुकानें बन्द, कार्यालय बन्द, लोग बन्द. सड़के सूनी है. बाजार वीरान हैं. बाहर निकलने पर पुलिस आप पर लाठियां बरसा सकती है. यह कोरोना नामक विषाणु का प्रकोप है. वायरस शब्द में वह फ़ील नहीं आता जो विषाणु शब्द दे जाता है. इसलिये वायरस नहीं लिखा. आज विश्व के लगभग 199 देश इस महामारी को अनुभव कर रहे है. हजारों लोग मर चुके हैं, लाखों संक्रमित है.

अभी शाम का समय है. मैं कुछ काम की चीजें लेने बाहर गया था. सर्जिकल दस्ताने व मास्क तो पहनना जरुरी है सबको. सब पहन भी रहे हैं. दो तीन वर्ष पहले मैं अकेले मास्क पहन के घूमता था. अब सब साथ हैं.  अच्छा लगता है. दुकानें सुबह दो घण्टे के लिए और शाम को दो घण्टे के लिए खुलती हैं. सारी दुकानें नहीं. सब्जी, दवा व प्रोविजन स्टोर्स. ठेले पर सब्जी वाले भी मौजूद रहते हैं. दिन भर वीरान पड़ी गलियों में शाम को थोड़ी सी चहल पहल दिखायी देती है. लेकिन ज्यादा नहीं. बीस पच्चीस मिनट के अन्तराल पर पुलिस की लारी दिख जाती है. वे सबको दूर दूर खड़े होने व मास्क पहनने के लिए कहते हुये चले जाते है, अगर उन्हें कहीं रुक कर कोई विशॆष निर्देष देने की आवश्यकता नहीं महसूस होती है तो. 
दक्षिण पश्चिम दिल्ली का एक हिस्सा.
सामान लेने के लिय पंक्ति में खड़े लोग.

वैसे जहां मैं रहता हूं यह गूजरों की लोकलिटी है तो पुलिस वालॊं की धौंस भी, अगर कभी दिखानें पड़े तो, न चाहते हुये भी, आईपीसी के सभी नियमॊं का पालन करते हुये भी थॊड़ी सी सेलेक्टिव होती है. कल ही शाम को चार पांच लड़के गली के मुहाने पर, जो कि मुख्य सड़क पर खुलती है, खड़े थे. कांस्टेबल भाई उतरे, और एक बिहारी सब्जी वाले के आसपास खड़े लोगों को निर्देश देकर चले गये. वो भी क्या कर सकते थे.  प्राग्माटिज्म एक ऐसा सिध्दांत है जो सभी विचारधाराओं, दर्शनों का पापा है. इसके बिना कोई भी विचार, सिध्दान्त पंगु है.  

मैं शाम को सब्जी लेने निकला था. वैसे मेरा हरी सब्जियों में बिल्कुल विश्वास नहीं है. सब केमिकल खा पी के बड़ी होती हैं, फलती फूलती हैं. बिना मेलाथ्यान के आप बालकनी में मिर्च तक नहीं उगा सकते. यह मैंने हाल फिलहाल में करके देखा. रायानिक जहर, जिसका बीस ग्राम भी सीधे आपके अन्दर चला जाय तो आपकी आत्मा का नेक्ट सायकल रेडी. लेकिन ये सब भी सब्जियों के माध्यम से डायल्यूट करके हम थोड़ा थोड़ा खा लेते हैं. प्राग्माटिज्म !

जहां मैं हमेशा सब्जी लेता हूं वह "ज्वाइंट" आज बन्द था, पास लगे एक ठेले वाले के पास चला गया. वह सब्जियां देने के साथ साथ आसपास खड़े लोगों को बड़ी ही गर्मजोशी से यह बता रहा था कि अपने पचास साल के जीवन में उसने ऐसा कर्फ़्यू नहीं देखा. जब इन्दिरा गांधी नहीं रही थी तब भी वह यही था. लेकिन ऐसा बन्द उसने नहीं देखा. इसके बाद उसने यह भी बताया की यह कलयुग की महामारी है. उसके गुरु जी जो अब नहीं रहे उन्होंने तीन साल पहले ही यह बता दिया था कि ऐसा होगा. उसने बड़ी ही गम्भीरता से बताया कि यह महामारी औरतों के कारण आयी है. औरतें अब धर्म का पालन नहीं करतीं, इसलिए ऐसा हो रहा है. वह दर्शन प्रतिपादन में और आगे बढ़ रहा था और कुछ अकथनीय बातें कहना शुरु कर रहा था कि मैं वहां से चल दिया. प्राग्माटिज्म !





Saturday, November 23, 2019

रात

रात घिर आयी बे आवाज
आसपास
ऐसे जैसे 
यही कहीं बिखरी हुई थी 
आसपास
बे आवाज
सदियों से

Saturday, October 26, 2019

बँटवारा

जीतने के लिए
दुनिया को
बाँटना पड़ता है
दो हिस्सों में ।

साफ़ साफ़ अलग किए गए
दो हिस्से। 

Sunday, October 20, 2019

व्यक्ति व समूह


व्यक्ति पर एक निजी व्यक्ति के रूप में और व्यक्ति पर एक समूह के अवयव के रूप में, मानसिक/आत्मिक विकास के जो नियम लगते हैं वे सामान्यतः बहुत  अलग कभी कभी एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हैं. मोटे अर्थों में एक उदाहरण दिया जा सकता है. जीवन के शुरुआती समय में , या बाद में भी, ठीक से पढ लिख पाने, मन मस्तिष्क ठीक से विकसित हो इसके लिये आवश्यक क्रिया-कलापों में खुद को झोंक देने के लिए व्यक्ति को थोड़ा सा  "स्वार्थी या आत्म केन्द्रित"होना जरूरी है. ऐसा होने पर आदमी बलेल्ला बन बाद में देश दुनिया का नुकसान ही करता है.

किन्तु, इसके ठीक विपरीत, विस्तृत फलक पर सामाजिक जीवन में हम यह नहीं कह सकते कि एक व्यक्ति का किसी भी रूप में आत्मकेन्द्रित या  स्वार्थी होना ठीक है. एक समूह को सहकारिता, आपसी सौहार्द्र के मूल्यों पर ही काम करना है. नहीं तो वह पतित हो जायेगा. 

यहां सीधा विरोधाभास है. यह विरोधाभास महत्वपूर्ण है.बहुत सारे सामाजिक सुधार के आन्दोलन, आध्यात्मिक मिशन इसीलिए असफल हो जाते है क्योंकि वे इस विरोधभास को हल नहीं करते. व्यक्ति एक इकाई के तौर पर अपनी निजता में जिन मूल्यों, प्रक्रियाओं, धारणाओं के आधार पर अपने को अपने से, अपने को ईश्वर से, अपने काम व कला से, अपने को समाज से जोड़ता है वे  ही मूल्य, प्रक्रियाएं, धारणाएं जरूरी नहीं की उसके समाज में व्यव्हृत किये जाने वाले आदर्शों के रूप में स्थापित हों. अथवा इसका उल्टा. वे दोंनॊ बिल्कुल अलग व यदा कदा विरोधाभासी भी हो सकतीं हैं.

”संसार माया है’’, एक मुमुक्षू अगर निजी तौर पर यह माने, जाने तो यह उसकी उपल्ब्धि है. लेकिन अगर पूरा समाज ही बिना किसी वास्त्विक बोध के एक नियम के तौर पर यह मानने लगे और इस आधार पर अपने ढ़ाचे खड़े करे तो अन्य समूहों की तुलना में वह एक आलसी, कमजोर व पिछड़ा हुआ समाज होगा.  क्योंकि अगर सब माया ही है तो क्यॊं बेवजह टॆंशन लेना. 
आध्यात्मिक विकास के लिये सन्तों साधकों ने ऐसी ही कई अन्य बातों पर जोर दिया है. जैसे   ”तर्क करना छॊड़ दो, विश्वास सीखो,” आदि आदि. यह काम एक साधक या साधकॊं का एक समूह करे तो ठीक, लेकिन यही बात अगर पूरे समाज को एक नियम के तौर पर सिखा दी जाय, तो उस समाज का आधुनिक ज्ञान विज्ञान में पिछड़ना तय है क्यॊकिं बुध्दि-विलास तर्क वितर्क के बिना  विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति असंभव है. ्कहीं हमारे साथ कुछ ऐसा ही तो नहीं हुआ है ?