Monday, June 10, 2013

सुन तो लो , दीर्घापांग !



दीर्घापांग* !
जाने दो , गया , जो गया
अब क्या लेना उससे !

ढ़ूढ लो तुम कण्व आश्रम में
नये पते ,
नये वृन्त , नये पुष्प !

बस जब स्मृति संस्पर्श से
महत्तम हो व्यथा के समापवर्त्य
बैठ द्वारे कण्व कुटि के
उन धान के पौधों को निहारना
जिन्हें शकु रोप छॊड़ चली गयी है !
खड़े होंगे वे वैसे ही अभी जस के तस
बढ़ेगें फूलेंगे फलेंगे झरेंगे सूखेगे फिर वे
इस बार बिना शकु के रोपे ही
खुद उगेंगे
बनकर दूसरे
नये पौधे नहीं
बल्कि वही , ठीक वही
जिन्हें शकु रोप छोड़ चली गयी है !

दीर्घापांग !
तुम वहीं बैठना !
घण्टों, विलम्बित मौन से शून्य में खिंचे हुये
सजल उनींदी पलकों में
किसी अन्जान पहाड़ी पुहुंप सी
सरलता की तरलता भर
उन धान की पंक्तियों को निहारते रहना
साथ ही निहारना
विस्तृत सम्मुख
विशद स्पष्ट नील व्योम पट मध्य
समूह संपृक्त , अकेला भटकता रह गया
असहाय गल-दश्रु , करतल आकृति धारी श्वेत जलद पुंज !

इन सब स्मृति अवशेषॊं में भटकते हुये जब
थोड़े परिचित थोड़े अपरिचित , किन्तु बुझ चुके
किसी भव्य घनीभूत स्नेह ममत्व पुंज की छाया
छू निकले
तुम्हारे शिशु नवनीत कपोलों को
और
साथी मेरे भोले ! कर जाय व्यर्थ इक धक्के से
इन सब स्मृति अवशेषों को ,
सब धान के पौधों को ,
मालिनी तट के कुन्जॊं को ,
अमलतास के झक झक गुच्छॊं को ,
तब रखना धैर्य मित्र मेरे !
लगे यूं कि जैसे
आश्रम में जब सांध्य आराधन ,य
ज्योपरान्त
कण्व सहित सब ऋत्विक गण
बैठे हो ध्यान मौन तल्लीन
गोधलि के विस्तृत प्रांगण में ,
शिरीष गुल्मों पर
वन
ज्योत्स्ना हो रही बिखर ,
जंगली सन्नाटे की वीणा पर
राग यमन हो डूब रहा
और तुम बैठे हो
वृक्ष तले गुमसुम
क्षितिज द्वित्व में विलीन होता दिवाकर अगोरते
तभी हां ठीक तभी
श्रेय पूरित
प्रांजल नेहमयी
वही परिचित शकु की पुकार
का छद्म आभास हो आये
और व्याकुल मन इधर उधर देख
इक बूंद बन ढ़रक जाये !

तब रखना धैर्य , मित्र मेरे !


 *अभिज्ञान शाकुन्तलम्‍ में वह घायल हिरन जिसे  शकुन्तला ने बचाया था व बाद में पाल कर बड़ा किया था.

Monday, May 27, 2013

पत्तों पर ओस


Knitting Girl, 1869अनाम दिन किसी शाम
छोड़ आये जो तुम
उस अजान पेड़ से बतियाने में भूलकर उसपर
थोड़ा सा गौरैया के छोटे बच्चे सा प्यार
वह प्यार के दो चमकीले मोती बन अब
दो सीपी सी आंखों में बस गया है !

उस दिन हवा की कॊठरी में
टहलते वक्त कच्ची दोपहर को
गीली हवा के ताखॊं पर रख आये  तुम
प्यारी सपनीली बातों की दो पुड़िया !
वह भी मधुरी चिठ्ठी बन
दो कानों में बजती रहती है !

देखॊ !
उस दिन अजाने
नीले फूलॊं के गुच्छे को
भर आंखॊं में भर सांसॊं में
दुलराया था जो तुमने
वह भी
घने नेह की मृदुल डली सा
उस एक हिये में
अंजता रहता है !

Thursday, May 16, 2013

Thursday, May 9, 2013

सूरज की डायरी



सूरज की डायरी का
एक पन्ना –- एक दिन !


पन्नों में तीन चार रंगों के शेड  !


किशोरवय सूरज जब
किसी और अन्तरिक्ष मण्डल में था ,
रहस्यमयी प्रौढ़ निहारिकाओं से घिरा हुआ , तब की स्मृतियां !


सूरज के दहकते मनः प्रिज्म से होकर
दिन के पन्नें पर सात रगों के बहाने
हजारों रंगों की फुहारें
फुहरती , बिखरती  , चमकती 
पन्ने में पक्तियों की डाली पर
टुकुर टुकुर बैठी  धरती की चिड़िया के पंखॊं पर !





पन्ने के आधे हाफ में
सूरज का परिपक्व विरागपूर्ण विगत-प्रेम- उल्लास
गहन सान्द्र पीत भासित
किसी मिथक सी सत्य धूप की रोशनायी में
लिखा जाता  !
वहां उपस्थित होते हैं
कुछ अदृश्य गेरुये फूल भी
सम्बोधन  चिन्हों के स्थान पर
पूर्ण  और अर्ध विराम  के बीच
अटके हुये, कहीं !


(आधी कविता. )

Sunday, March 31, 2013

सारामती के जंगलों में





घने जगंलों में
मैं बहुत दूर निकल आया था ।
बहुत दूर ।
जगंलों के भीतर बहुत भीतर
बेतरतीब बिखरे खोये हुये उन रास्तों के पार
जिनपर कभी कोई पथिक गया ही नहीं
वहां आदमी के पास
अपने सीधे साधे जंगलीपन के गुल्म में लिपटी
नवजात धवल आदमीयता के अलावा कुछ और था ही नहीं,
वहां
घने अंधेरों के पार
मैंने प्यार और उजालॊं की बड़ी बड़ी खानें पायी
पाये निश्चल प्यार के चमकीले कौस्तुभ, 
स्पष्ट भावनाओं के हरे मरकत !
थे वहां नश्वरता की नीली रोशनी में
दमकते कुछ ऐसे फूल
जिनसें एक तरह की
न कही जा सकने वाली न समझी जा सकने वाली शाश्वतता लिए
भासित उज्जवल रक्तिम अभ्र झरता था !

बहुत सी पीले पन्नों वाली किताबों की कब्र से बाहर सरक आये
अनेक मिथकीय पात्रों भरी
सपनॊं , गल्पॊं व किंवदन्तियों की अनगिन झाड़ियां
जिनपर कवितायें बिखरी हुयी थी कहीं खिलकर सूख गये लाल टहकार फूल की तरह
तो कहीं किसी बहुत पुरानी साधारण सी कहानी में रोती हुयी लड़की के अन्तिम बूंद आसू की तरह !
इन सब को पार कर मैं
इन घने जंगलों में बहुत दूर निकल आया था !

यहां बादलॊं में प्रेम सघन घनत्व में
पानी की तरह पुता हुआ था ,
जो
सुन्न रात में 
चांदी के बुरादे जड़ी शुभ्र वस्त्र आवृत
प्रागऎतिहासिक मांसल प्रेम स्मृतियों सी
एक के पीछॆ एक , स्थगित सम्बध्दता लिये खड़ी
समुद्री नील पहाड़ियों व सम्मुख उसके
पुरिया धनश्री के गिरान वाले स्वर जैसी
एक गहरे गर्त-सी बजती
घाटी की कगार पर खड़े हो निहारते हुये
कभी आती सांस पर कभी जाती सांस पर
वैसे ही जम जाता है जैसे
प्रथम पुरुष के अधरों पर जम गये थे
प्रथम स्त्री के अधर प्रथम चुम्बन समय !

इस गहरी घाटियों में
पहाड़ॊं  की विमाओं को समझते हुये
मैं भटक गया था
एक ताजी आदमीयता की क्यारियों में उगने वाले 
बिलकुल अलग तरह से कोमल
बिलकुल अलग तरह से प्रगाढ़
सहज बोध भरे शान्त कर देने वाले
प्रांजल स्नेह सम्पुट धरे
आकाश के बहुत पास विहस आये
इन अद्भुत प्रतानों के जंगलॊं में
मैं बहुत दूर निकल आया था !

Tuesday, March 12, 2013

दृश्य


सब ओर बादल हैं. बादलों में पहाड़ हैं . पहाड़ॊं में जंगल हैं . और जंगलों में बस जंगल.
घाटी में सफेद – नीली धुन्ध के बीच पहाड़ों का उपरी सिरा एक लाईन बनाता है।
ऐसा लगता है जैसे उस रस्सी पर पहाड़ टंगे हुये हैं और धुन्ध में सूख रहे हैं ।

 



Monday, March 11, 2013

सोच (1)

समस्या तब शुरू होती है जब हम अपने आप को वह समझने लगते है जो हम नहीं है या कुछ अथक प्रयासोपरान्त हममे जो होने की संभावना है , वह . हमारे आप पास ऎसी कई चीजें है जो हमें इस  भ्रम में डालती हैं .
 ईश्वर  द्वारा रचें गए कुछ बड़े षडयंत्रों में से यह एक है की गहन प्रेम और वास्तविक ज्ञान को मापने के लिए वैसे यंत्र नही हैं जैसे खम्भे की उचाई और गढ्ढे की गहरायी नापने के लिए हैं .