Thursday, April 30, 2020

प्रतीकों के बाहर













घर को चला है
मजदूर
लाकडाउन में
दो बच्चे भूखे
एक पत्नी बीमार 
उसका सामान हैं।

दूर नहीं घर उसका
पलक भर दूरी है
लम्बी सड़कें तो बहाना हैं
घर एक सपना है
बस पलकें झपकाना है
वहां रोज का आना जाना है।

वह दुनिया उसकी नहीं
जहां रोज उगता है सूरज
जहां रात पड़ती है ओस
और तेज चलने से
घट जाती हैं दूरियां।

वह दुनिया उसकी नहीं
जहां ठण्डे पानी से
बुझ जाती है प्यास
जहां अच्छे खाने के 
चन्द निवालों से
मिट जाती है पेट की तड़प.

वह
किसी और 
दुनिया से आया है.

वह दुनिया
हमारी भाषा के 
बाहर की दुनिया है

वह दुनिया
ईश्वर को प्रसन्न कर देने वाले मत्रों
के परास के बाहर की दुनिया है
शास्त्रों में कहीं भी नहीं हैं दृष्टांत
उस दुनिया के.

हमारी आंखों के सामने होते हुये भी  
अदृश्य सी है
वह दुनिया.

हमारे टूटे घरों को जोड़ने
खेतों में बीजों को प्रेम देने
कारखानॊं की मशीनों को
अपनी देह की गरमाहट से
पालने वाला वह
किसी और दुनिया से
उल्का पिण्ड की तरह आता है
हमारे जीवन की लय व तुक
हमें समझा कर
हमारे होने को आसान बनाकर
अदृश्य हो जाता है.

प्रेम नहीं, ग्लानि से भरी

हम अपनी भाषा में
उसके अदृश्य होने को
कोई शब्द देना चाहते है !

स्नेह नहीं, किसी न की गयी हत्या
के पश्चाताप से क्षुब्ध
अपनी संदेदनाओं के दबाव में
हम
उसकी पसलियों में
करकती भूख के लिए
कोई प्रतीक खोजना चाहते हैं.

नहीं मिलता कोई
शब्द,
नहीं मिलता कोई
प्रतीक.

उसकी पीड़ा
हमारी भाषा को 
असफल कर देती है
व हमारे अस्तित्व की 
वहनीयता को निरर्थक.



Wednesday, April 29, 2020

सभ्यता के ताम्रपत्र

मैंने देखा है पत्थरों 
को काग़ज़ जैसा 

जब मैं सम्राट था 
मैंने लिखे उन पर 
अपने विजय गीत 

जब मैं हार गया 
मैंने पूजा उन्हें 
आस्था के अभिलेख 
बने वे 


जब मैं कवि बना 
मैंने उनसे 
सन्नाटा सीखा 


भूखे मज़दूर की भूख में 
धैर्य का अल्पविराम 
पत्थरों की सीख थी 


जिसे बरसात भी काट सकती थी 
वह समय की धार को 
झेल गया 
पत्थर बना 
इतिहास के अभिलेख 
पले उसकी कोख में 


लाखों वर्ष पुराने 
किसी पत्थर से पूछो कभी 
सभ्यता की घास 
समय के जंगल 
मानव एक स्वप्न
कितने आये कितने गये ! 

अन्तत: ईश्वर बनने का बोझ
उठाया किसने ?

Wednesday, April 1, 2020

लाकडाउन कथा: कंसपीरेसी सिध्दान्त


Image from Internet
आज लाकडाउन का सातवां दिन है. भारत में अब संक्रमित लोगों की संख्या हजार के पार पंहुच गयी है. मरने वाले २९ के आसपास हो गये हैं. हर कोई डरा हुआ, भयग्रस्त है. सब अपने अपने तरीके से परिस्थिति का आकलन कर रहे है. और यही मान रहे कि स्थिति और खराब होने वाली है.  शाम को फोन पर मां  ने हम दोनों को सख्त हिदायत दी की अब कुछ भी हो जाय आने वाले दस दिनों तक एकदम घर से नहीं निकलना है. उनका इशारा मेरी ही तरफ ज्यादा था क्योकिं अनु तो वैसे भी दिन भर घर में ही यहां वहां करती रहती हैं. उनके लिए लाकडाउन की जिन्दगी कोई बहुत अधिक विचित्रताओं भरी नहीं है. एक सामान्य भारतीय लड़की के जीवन के कई साल तो नीयर लाकडाउन में ही बीतते हैं. तो दिन भर घर पर बने रहना, कुछ कुछ करते रहना, उनके लिए उतना उबाऊ नहीं है जितना मेरे लिए है.

दिल्ली में भी मामले बढ़ गये हैं. देश के अन्य हिस्सों में भी यही हाल है. दिन में दुकानें पूरी तरह बन्द रहती है. लोगों का डर अलग अलग रूपों में व्यक्त हो रहा है. सोशल मीडिया, न्यूज चैनल, अखबार, जो कि प्रिंट में आ नहीं रहे, केवल आनलाईन संस्करण मौजूद हैं, सब जगह बस एक ही चीज है: कोरोना. शुरुआत में, मतलब दस पंद्रह दिन पहले हम भारतीयों ने आदत अनुसार महामारी की गम्भीरता को समझा नहीं. जब तक यह चीन के वुहान, जहां से यह शुरु हुआ उसके आसपास व कुछ एक अन्य देशॊं में था, आम जनता का तो छॊड़िये, सरकरों ने भी सोचा की काम चल जायेगा. अन्ततः जब संक्रमण चीन से निकल कर पहले ईरान , फिर स्पेन और अब अमेरिका में हजारों को लोगों डस लिया, तब हमने मामले की गंभीरता को समझा और सब कुछ बन्द किया. लाकडाउन केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय  राज्यों में पहले ही घोषित कर दिया गया था.  

भय और आपदा की ऐसी स्थिति में तमाम तरह की कंसपीरेसी सिध्दान्तों का बोलबाला हो चला है. एक बात जो शुरु से ही सुनने में आ रही थी वो ये कि यह सब चीन ने जानबूझ कर किया. ये वायरस उसने अपनी प्रयोगशाला में बनाया और हर जगह फैला दिया. ऐसा इसलिए कि दूसरे देश उनके बनाये हुये आवश्यक आकस्मिक उपस्कर खरीदेंगे जिससे उनका व्यापार बढ़ेगा. इस पीछे जो सबसे मजबूत दलील दी गयी वो ये थी कि वुहान में तो यह वायरस फैला किन्तु पास के ही बीजिंग में नहीं फैला. इसके  उल्टे दूसरे देशों में तेजी से फैल गया. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कोरोना को चायनीज वायरस कहा.

इन बातों पर विश्वास करना न करना व्यक्तिगत चयन हो सकता है जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप के वाट्सेप ने आपको क्या बताया है. ! क्योकिं आजकल लोग मां-बाप-भाई-बहन की सुने न सुने एप की जरुर सुनते हैं. खुद इन बातों पर विश्वास करने से पहले मैंन जो तर्क अपने आप को दिये उनमें एक बात मैंने अपने आप को सबसे ज्यादा बतायी ( किसी और को बताना खतरे से खाली नहीं) कि आज विश्व की अर्थ व्यवस्था आपस में गहरे तौर पर जुड़ी हुयी है. चाहे अमेरिका हो या चीन या भारत या कोई बड़ी वैश्विक इकाई , एक दूसरे को बहुत ज्यादा नुकसान पंहुचाकर किसी को कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला है. चीन तो वैसे भी एक्सपोर्ट ड्रिवेन अर्थव्यवस्था है. भारत व अमेरिका जहां उसके बड़े व्यापार हिस्सेदार हैं वहीं यूरोपियन यूनियन जैसी  समूह भी महत्वपूर्ण हैं. चीन के कुल निर्यात का 4  से 5 % भारत आता है. इसी तरह लगभग 16 से 17 % अमेरिका जाता है. ईयू के आंकड़े भी लगभग इतने ही है. ऐसी स्थिति कॊई भी अर्थव्यवस्था अगर मंदी का शिकार होती है तो रिपल इफेक्ट से सब डूबेंगें. वाट्सएप पर यह बात हो सकता है न पहुंची हो लेकिन कुछ सत्य है इस तर्क में. कोई भी देश जानबूझ कर ऐसा नहीं करेगा. ऐसा करना आत्मघाती होगा. विश्व एक व्यवस्था से चलता है जिसे हो सकता है हम पूरी तरह न समझ पाते हों लेकिन वे काम करती हैं व उनमॆं बदलाव तत्क्षण व सरल नहीं होता.

एक बात यह भी है कि अगर मान लिया जाय कि चीन ने ऐसा जानबूझ कर किया तो यह देखना होगा कि वे इस वैश्विक महामारी से कैसे लाभ कमाते दिख रहे हैं ? क्या चीन स्वास्थ्य उपकरणों का बड़ा निर्यातक है ? चीन जो निर्यात करता है या कर सकता है उसके कम्पोनेन्ट क्या क्या हैं. इन्टरनेट जो जानकारी मिलती है वह इस प्रकार है:

"The top exports of China are Broadcasting Equipment($231B), Computers ($146B), Office Machine Parts($90.8B), Integrated Circuits ($80.1B) and Telephones($62B)." 
source: https://oec.world/en/profile/country/chn/ 



स्पष्ट है कि ज्ञात रूप से चीन स्वास्थ्य यंत्र बनाने की होड़ में नहीं है. हालाकि यह  मात्र एक आकलन है लेकिन यह आंकलन तथ्यों के आधार पर है. 

एक दूसरा पहलू ये भी है कि चीन व अमेरिका के बीच अभी कुछ दिनों पहले तक ट्रेड वार चरम पर था. यह ट्रेड वार भी एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा था जिसमें दोनॊं देश वैश्विक फलक पर अपनी हेजेमनी बरकार रखने के लिए सतत प्रयासरत हैं व अपना प्रभुत्व जताने का कॊई भी मौका जाने नहीं देते. इसी क्रम में अमेरिका ने मौका पाते ही वायरस को चायनीज वायरस बता दिया जिससे चल रही तमाम कंसपीरेसी सिद्धांन्तों को बल मिला. अन्यथा, कोरोना SARs परिवार का एक प्राकृतिक वायरस है. चीन की गलती ये थी कि उसने सही समय पर अपने डाक्टर्स की बात नहीं सुनी. जिस डाक ने इस महामारी के दस्तक की सूचना दी उसको प्रताड़ित किया व बिल्कुल भारतीय तरीके से सही आंकड़े सबसे छुपाये. इसके अलावा बाकी सब होक्स लगता है.


बहरहाल, आजकल कंसपीरेसी सिध्दान्तों का जमाना है. हर बड़ी वैश्विक घटना के पीछे इस तरह की कुछ संकल्पनायें खोज निकाली जाती हैं. कंसपीरेसी सिध्दान्तों के बारे में विस्तार से समझना रुचिकर हो सकता है. इस विषय पर ज्यादा अध्ययन तो नहीं है लेकिन मिशेल बरकन की एक किताब है “अ कल्चर आफ कंसपीरेसी” जिसकी मुख्य बातों को अगली पोस्ट में साझा करने की कोशिश करुगा !


Tuesday, March 31, 2020

लाकडाउन कथा: प्राग्माटिज्म !


वीरान सड़कें. दिल्ली गुड़गाव रोड
आज चार दिन हो गये सब कुछ बन्द हुये. लाकडाउन. सब कुछ बन्द. दुकानें बन्द, कार्यालय बन्द, लोग बन्द. सड़के सूनी है. बाजार वीरान हैं. बाहर निकलने पर पुलिस आप पर लाठियां बरसा सकती है. यह कोरोना नामक विषाणु का प्रकोप है. वायरस शब्द में वह फ़ील नहीं आता जो विषाणु शब्द दे जाता है. इसलिये वायरस नहीं लिखा. आज विश्व के लगभग 199 देश इस महामारी को अनुभव कर रहे है. हजारों लोग मर चुके हैं, लाखों संक्रमित है.

अभी शाम का समय है. मैं कुछ काम की चीजें लेने बाहर गया था. सर्जिकल दस्ताने व मास्क तो पहनना जरुरी है सबको. सब पहन भी रहे हैं. दो तीन वर्ष पहले मैं अकेले मास्क पहन के घूमता था. अब सब साथ हैं.  अच्छा लगता है. दुकानें सुबह दो घण्टे के लिए और शाम को दो घण्टे के लिए खुलती हैं. सारी दुकानें नहीं. सब्जी, दवा व प्रोविजन स्टोर्स. ठेले पर सब्जी वाले भी मौजूद रहते हैं. दिन भर वीरान पड़ी गलियों में शाम को थोड़ी सी चहल पहल दिखायी देती है. लेकिन ज्यादा नहीं. बीस पच्चीस मिनट के अन्तराल पर पुलिस की लारी दिख जाती है. वे सबको दूर दूर खड़े होने व मास्क पहनने के लिए कहते हुये चले जाते है, अगर उन्हें कहीं रुक कर कोई विशॆष निर्देष देने की आवश्यकता नहीं महसूस होती है तो. 
दक्षिण पश्चिम दिल्ली का एक हिस्सा.
सामान लेने के लिय पंक्ति में खड़े लोग.

वैसे जहां मैं रहता हूं यह गूजरों की लोकलिटी है तो पुलिस वालॊं की धौंस भी, अगर कभी दिखानें पड़े तो, न चाहते हुये भी, आईपीसी के सभी नियमॊं का पालन करते हुये भी थॊड़ी सी सेलेक्टिव होती है. कल ही शाम को चार पांच लड़के गली के मुहाने पर, जो कि मुख्य सड़क पर खुलती है, खड़े थे. कांस्टेबल भाई उतरे, और एक बिहारी सब्जी वाले के आसपास खड़े लोगों को निर्देश देकर चले गये. वो भी क्या कर सकते थे.  प्राग्माटिज्म एक ऐसा सिध्दांत है जो सभी विचारधाराओं, दर्शनों का पापा है. इसके बिना कोई भी विचार, सिध्दान्त पंगु है.  

मैं शाम को सब्जी लेने निकला था. वैसे मेरा हरी सब्जियों में बिल्कुल विश्वास नहीं है. सब केमिकल खा पी के बड़ी होती हैं, फलती फूलती हैं. बिना मेलाथ्यान के आप बालकनी में मिर्च तक नहीं उगा सकते. यह मैंने हाल फिलहाल में करके देखा. रायानिक जहर, जिसका बीस ग्राम भी सीधे आपके अन्दर चला जाय तो आपकी आत्मा का नेक्ट सायकल रेडी. लेकिन ये सब भी सब्जियों के माध्यम से डायल्यूट करके हम थोड़ा थोड़ा खा लेते हैं. प्राग्माटिज्म !

जहां मैं हमेशा सब्जी लेता हूं वह "ज्वाइंट" आज बन्द था, पास लगे एक ठेले वाले के पास चला गया. वह सब्जियां देने के साथ साथ आसपास खड़े लोगों को बड़ी ही गर्मजोशी से यह बता रहा था कि अपने पचास साल के जीवन में उसने ऐसा कर्फ़्यू नहीं देखा. जब इन्दिरा गांधी नहीं रही थी तब भी वह यही था. लेकिन ऐसा बन्द उसने नहीं देखा. इसके बाद उसने यह भी बताया की यह कलयुग की महामारी है. उसके गुरु जी जो अब नहीं रहे उन्होंने तीन साल पहले ही यह बता दिया था कि ऐसा होगा. उसने बड़ी ही गम्भीरता से बताया कि यह महामारी औरतों के कारण आयी है. औरतें अब धर्म का पालन नहीं करतीं, इसलिए ऐसा हो रहा है. वह दर्शन प्रतिपादन में और आगे बढ़ रहा था और कुछ अकथनीय बातें कहना शुरु कर रहा था कि मैं वहां से चल दिया. प्राग्माटिज्म !





Saturday, November 23, 2019

रात

रात घिर आयी बे आवाज
आसपास
ऐसे जैसे 
यही कहीं बिखरी हुई थी 
आसपास
बे आवाज
सदियों से

Saturday, October 26, 2019

बँटवारा

जीतने के लिए
दुनिया को
बाँटना पड़ता है
दो हिस्सों में ।

साफ़ साफ़ अलग किए गए
दो हिस्से। 

Sunday, October 20, 2019

व्यक्ति व समूह


व्यक्ति पर एक निजी व्यक्ति के रूप में और व्यक्ति पर एक समूह के अवयव के रूप में, मानसिक/आत्मिक विकास के जो नियम लगते हैं वे सामान्यतः बहुत  अलग कभी कभी एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हैं. मोटे अर्थों में एक उदाहरण दिया जा सकता है. जीवन के शुरुआती समय में , या बाद में भी, ठीक से पढ लिख पाने, मन मस्तिष्क ठीक से विकसित हो इसके लिये आवश्यक क्रिया-कलापों में खुद को झोंक देने के लिए व्यक्ति को थोड़ा सा  "स्वार्थी या आत्म केन्द्रित"होना जरूरी है. ऐसा होने पर आदमी बलेल्ला बन बाद में देश दुनिया का नुकसान ही करता है.

किन्तु, इसके ठीक विपरीत, विस्तृत फलक पर सामाजिक जीवन में हम यह नहीं कह सकते कि एक व्यक्ति का किसी भी रूप में आत्मकेन्द्रित या  स्वार्थी होना ठीक है. एक समूह को सहकारिता, आपसी सौहार्द्र के मूल्यों पर ही काम करना है. नहीं तो वह पतित हो जायेगा. 

यहां सीधा विरोधाभास है. यह विरोधाभास महत्वपूर्ण है.बहुत सारे सामाजिक सुधार के आन्दोलन, आध्यात्मिक मिशन इसीलिए असफल हो जाते है क्योंकि वे इस विरोधभास को हल नहीं करते. व्यक्ति एक इकाई के तौर पर अपनी निजता में जिन मूल्यों, प्रक्रियाओं, धारणाओं के आधार पर अपने को अपने से, अपने को ईश्वर से, अपने काम व कला से, अपने को समाज से जोड़ता है वे  ही मूल्य, प्रक्रियाएं, धारणाएं जरूरी नहीं की उसके समाज में व्यव्हृत किये जाने वाले आदर्शों के रूप में स्थापित हों. अथवा इसका उल्टा. वे दोंनॊ बिल्कुल अलग व यदा कदा विरोधाभासी भी हो सकतीं हैं.

”संसार माया है’’, एक मुमुक्षू अगर निजी तौर पर यह माने, जाने तो यह उसकी उपल्ब्धि है. लेकिन अगर पूरा समाज ही बिना किसी वास्त्विक बोध के एक नियम के तौर पर यह मानने लगे और इस आधार पर अपने ढ़ाचे खड़े करे तो अन्य समूहों की तुलना में वह एक आलसी, कमजोर व पिछड़ा हुआ समाज होगा.  क्योंकि अगर सब माया ही है तो क्यॊं बेवजह टॆंशन लेना. 
आध्यात्मिक विकास के लिये सन्तों साधकों ने ऐसी ही कई अन्य बातों पर जोर दिया है. जैसे   ”तर्क करना छॊड़ दो, विश्वास सीखो,” आदि आदि. यह काम एक साधक या साधकॊं का एक समूह करे तो ठीक, लेकिन यही बात अगर पूरे समाज को एक नियम के तौर पर सिखा दी जाय, तो उस समाज का आधुनिक ज्ञान विज्ञान में पिछड़ना तय है क्यॊकिं बुध्दि-विलास तर्क वितर्क के बिना  विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति असंभव है. ्कहीं हमारे साथ कुछ ऐसा ही तो नहीं हुआ है ? 

Sunday, May 26, 2019

छिटपुट

1.
जो कविताएं
नहीं लिखी गई
मन में उमग कर रह गई
उन्हें घुटन नहीं होती होगी ?
कब्र में दबे होने जैसी ?

2.
उतर आया धुधलका शाम का

खिड़की से दीखता आसमान
शान्त उदास स्थिर,

एक और दिन बीत गया
कभी न लौटने के लिए।

Friday, December 7, 2018

चीनी की तरह

ये जंगल
चीनी की तरह 
एक पुड़िया प्यार 
घोल देते हैं सुबह सुबह 
जिन्दगी के कप में
एक नज़र भर देखने पर ! 



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Thursday, November 22, 2018

मठाधीशी की कला

जरूरी नहीं कि हृदय में ईश्वर का प्रकाश ही आपको व्यावहारिक तौर पर स्थिर, गंभीर, आत्मप्रवृत्त बनाता हो। अपने चित्त के घामड़पन, अपनी कुटिलता की शक्ति में निर्द्वन्द  व अटल विश्वास भी व्यक्ति को वाह्य तौर पर उतनी ही स्थिरता देता है जितना कि वास्तविक सत्य का बोध।
उदाहरण के लिए आप अपने आसपास के तमाम बड़े-छोटे मठाधीशों को देख सकते हैं।

Saturday, November 3, 2018

पहले जैसे

पत्नी नौकरी फ्लैट कार
प्रमोशन के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा
आफिस की तक झक
नहीं हो रही सेविंग से लेकर
कई दिनों से छूट जा रही जिम
और समय न मिलने से
न हो पा रहे मेडीटेशन की चिन्ता के बीच
मैं अक्सर सोचा करता हूं कि
पहले जैसे
कविताएं भी लिखा करूं !


लेकिन !
सिर्फ सोचने से क्या होता है ?
बताईए ! 

सपना

अक्सर जब कोई सपना
सच हो कर आंखों के सम्मुख आता है 

आंखें उन्हें चीन्ह नहीं पाती हैं ! 

आखों के अधूरेपन में
सपना सपना ही रह जाता है !



_____________________


Sunday, October 28, 2018

मच्छरात्मकता

शान्ति से आलआऊट पीकर
दीवार पर बैठे मच्छर को
ऊंगली से कोंच कर मार दिया मैंने !

समझ नहीं आता
क्या ठीक किया मैंने !

__________________
#कुकविता

Monday, October 8, 2018

दो कविताएं

दो कविताओं के लिखे जाने के बीच का समय
अब बढ़ गया है

जीवन ये ही है
इस वाक्य के बाद
चिह्न कौन सा खड़ा करू ?

विस्मयादिबोधक ? प्रश्नवाचक ? पूर्णविराम ?
क्या ?

दो कविताओं के बीच का समय
यही खोया हुआ चिन्ह
लील जाता है

Sunday, September 23, 2018

परिपूर्ण

मैं गढ़ू
कुछ ऐसी कविताएं
जो खुद में पूरी हों

बिना किसी पाठक के
बिना दुबारा पढ़े गये

Saturday, September 15, 2018

चार्ल्स बडलेयर की पांच कविताएं


 (नवोत्पल पर प्रकाशित इन पांच भावानुवादित कविताओं को अपने ब्लाग पर भी टांग लेने की सोची ! )






चार्ल्स बडलयर उन्नीसवीं सदी फ्रांस के साहित्यिक परिदृश्य के प्रमुख कवि हैं. ९ अप्रैल १८२१को पेरिस में जन्मे चार्ल्स एक प्रखर कवि होने के साथ साथ अपने समय के प्रख्यात कला-आलोचक, महान गद्य लेखक, प्रभावी अनुवादक भी थे. औद्योगीकरण के प्रभाव में 

तेजी से बदल रहे अपने आसपास के समाज की स्थितियों, हो रहे परिवर्तनों के सापेक्ष एक आम आदमी के जीवन में, मन में, संवेदन में हो रही हलचलों को चार्ल्स ने अपने रचना संसार में बड़ी ही बखूबी से उकेरा है.
हालांकि उन्होंने अपना पहला कविता संग्रह १८४५ में प्रकाशित किया लेकिन उनकी प्रसिध्दि मुख्य रूप से १८५७ में प्रकाशितफ्लावर आफ़ द ईविलनामक कविता संग्रह से है. उनके लेखन में मुख्य रूप से  तीव्र प्रेम, काम, हिंसा, शहरी भ्रष्टाचार, बदलाव, लेस्बियनिज्म,तनाव, वीभत्सता, मृत्यु, व्याकुलता इत्यादि बार बार अलग अलग रूपकों में पाठकॊ से सम्मुख आते हैं. प्रस्तुत कवितायें फ्लावर आफ़ द ईविलसे ली गयी हैं.

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अल्बाट्रोस

अक्सर ऊब रहे नाविक पकड़ लेते हैं
समुद्र के महान पक्षी अल्बाट्रोस को,
नीले आकाश का वह सौम्य यात्री
गूढ़ समुद्र में पीछा करता है जहाजों का !

नाविक जब पकड़ लेते हैं उसे, घायल-त्रस्त,
ये व्योम-नृप, पड़े यहां वहां जहाज के तख्त पर,
लिये दृढ़-महान पंख, हो चुके बेकार-सी पतवार-से
घिसटते हैं नाव के ओर छोर पर,

यह मजबूर ,हास्यास्पद यात्री, पड़ा है जो
विकृत और अक्षम, कभी हुआ करता था कितना भव्य !
एक नाविक कोंचता है चोंच में लकड़ी से,
दूसरा हंसता है उसकी लड़खड़ाती चाल पर !

कवि भी! बादलॊं का सहयात्री है! जोहता तूफान भरे दिन,
तीरन्दाजों पर करता उपहास,किन्तु जमीन पर चींखती भीड़ के बीच
वह चल भी नहीं सकता, उसके दृढ़-विशाल पंख
रास्ते की रुकावट बनते हैं !




पाठक से !


मूढ़ता गलतियां  लिचड़ता पाप
किये आवृत्त हमारी आत्मा को ,
शिराओं में भरते लिजलिजापन
पालते हैं  हम अपना नपुंसक प्रायश्चित्त
ठीक वैसे ही जैसे सड़क का भिखारी
रखता है अपने नपुंसक पिस्सुओं को !

हमारे कुत्सित  पापों के हैं  क्षीण पश्चाताप,
लेकर सत्य निष्ठा की शपथ  हर बार
हम करते हैं  और व्यग्रता से नए पाप
मानकर की मक्कार आसुओं से धुलेंगे हमारे दाग !

अपनी जगह पर कुंडली मारे बैठा है  जादूयी दैत्य
फेंक कर भ्रम-जाल हमारी बंधुआ आत्मा पर
अपने काले-जादू से सोख लेता है सारा सत्व !

प्रतिपल प्रतिपग चहुँओर  हमारे  दैत्य का साया है
हर कुत्सित अमार्जित वस्तु में सुख हमने पाया है,
घिसटते हैं हम हर रोज नर्क में थोड़ा और  आगे
अनाक्रान्त अविचलित नरक की सड़ांध से !


दरिद्र लम्पट जैसे चूसता चूमता है
किसी अधेड़ वेश्या के नोचे गए पिलपिले वक्ष वैसे ही,
हम मौक़ा पाते ही भोग लेते हैं तुच्छ नीच वर्जित सुख
यूँ कि  किसी सूखे संतरे को हम मसल लेते हैं !


गहरे अंदर करोड़ो बजबजाते कीड़ो -कृमियों की तरह
एक दैत्य गणराज्य हमारे मस्तिष्क में करता है सतत उत्पात
जब हम सांस लेते हैं हमारे फेफड़ो तक पसरती है मौत
दुःख भरे क्रन्दनों की अदृश्य धारा  में आवृत !

नरसंहार दंगे हत्या बलात्कार अगर अभी तक
हमारे सुख का हिस्सा नहीं हुए हैं
नहीं बने हैं हमारे भाग्य का अंग
तो मात्र इसलिए की नहीं  है हमारी शिराओ में इतना दम !

सब सियार तेंदुए भेड़िये,
बन्दर बिच्छु गिध्द सांप
सब चींखते बलबलाते सरकते जानवर
जैसे हमारे अंतस की अनेक बुराईयों की समग्र आवाज !

किन्तु एक जंतु जो  है सबसे ज्यादा फरेबी और मक्कार,
बिना किसी दिखावे के शोरगुल के
वह स्वेच्छया कर सकता है पूरी धरती तबाह
निगल सकता है एक ही झटके में अखिल विश्व !

वह है  बोरियत -- 
आँखों  मे  मादकता,
दीखते चमकते  आंसू लिए , हुक्का पीते
सपने देखते, हलकी सी मुस्कान लिए
मेरे प्रिय साथी ! मेरे पाखंडी पाठक !
निश्चित तौर पर तुम उसे जानते हो  !




दिन का अन्त



सांझ के धुंधलके में, जब सूरज खो जाता है,
अर्ध-चेतन वहजीवनथिरकता नांचता है
अपनी लज्जाहीन, भंगुर गुस्ताखियों के साथ !

जैसे ही प्रेमिल-शीतल रात बिखरती है क्षितिज पर
सब कुछ शान्त कर देती है वह, विलीन हो जाता है
तृषा, लज्जा, क्षोभ, वाष्प बनकर !

कवि खुद से कहता है,“अनन्त दुःस्वप्नों की छाया से
भरा मेरा हृदय, विश्राम मांगती मेरी आत्मा, मेरी मेरुरज्जु ,
पा सकेंगे थोड़ा आराम, अगर मैं लेट जाऊं,
स्वयं को तुम्हारी अंधेरी चादर में लपेट कर, ओ जीवनदायी अंधेरों !”




पूरी तरह एक

शैतान और मैं  कर रहे थे  बातें ,
मेरी खोह में बेपरवाह सा मुझे देख
विनीत भाव से पूछा उसने मुझसे--


''बहुत सी रसपूर्ण चीजों में, श्यामल व रक्ताभ मादकताओं में,
तुम्हें उसकी देह का कौन सा हिस्सा, सबसे अधिक खींचता है ?
क्या है सबसे अधिक मधुर?"

कहा मेरी  आत्मा ने लोलुप शैतान से,
''वह अपनी समग्रता में एक विश्रांति है, स्नेह है!  
उसकी देह का कोई एक टुकड़ा नहीं मुझे प्रिय है,


वह भोर का उर्जित तारा है,
स्निग्ध रजनी  की  शांत कर देने वाली अनुभूति है !
उसकी लावण्यता की लय मे खो जाते है चिंतक विचारक !

ओ रहस्यमयी रूपांतरण !
मुझमें, मेरे सब संवेदन एकमेक हो गए है, क्योंकि
उसकी सांसों में भी संगीत है, उसकी भाषा मे मधु-गंध है !


उठान !

घाटियों नदियों झीलों के ऊपर ,
बादलों पहाड़ों जंगलों समुद्रों के ऊपर
सूरज से परे, व्योम के उस पार
सभी धुंधली सीमाओं से आगे !

मेरी स्फूर्त आत्मा ! तुम उड़ो !
जैसे कोई बलिष्ठ तैराक नापता हो समुद्र !
तुम जोत दो अनन्त विस्तार को
अकथ अपौरुषेय उन्माद में !

उठकर इस गंदले वायवीय स्थान से
बहुत ऊपर स्वच्छ हवा में
शोधन करो स्वयं का
साथ ही करो पान स्फटिक-श्वेत-व्योम उद्भूत
पवित्र दैवीय सोमरस का !

जीवन की उदासियों, समस्याओं से परे
जो कर देती है हमारी तीव्रता को श्लथ
उस प्रसन्न मजबूत पंखों वाले व्यक्ति की तरह
छलको ! प्रकाशपूर्ण सूदूरवर्ती विस्तार में !

उस व्यक्ति की तरह जिसके विचार
हंस-बलाका के मजबूत पंखॊं जैसे
हवा में हर सुबह होते हैं गतिशील
जो आच्छादित कर लेता है जीवन को,
समझता है फूलॊं की भाषा
सुनता है न बोलती चीजों की आवाज !




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