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Thursday, April 30, 2020
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Wednesday, April 1, 2020
लाकडाउन कथा: कंसपीरेसी सिध्दान्त
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| Image from Internet |
दिल्ली में भी मामले बढ़ गये हैं. देश के अन्य हिस्सों में भी यही हाल है. दिन में दुकानें पूरी तरह बन्द रहती है. लोगों का डर अलग अलग रूपों में व्यक्त हो रहा है. सोशल मीडिया, न्यूज चैनल, अखबार, जो कि प्रिंट में आ नहीं रहे, केवल आनलाईन संस्करण मौजूद हैं, सब जगह बस एक ही चीज है: कोरोना. शुरुआत में, मतलब दस पंद्रह दिन पहले हम भारतीयों ने आदत अनुसार महामारी की गम्भीरता को समझा नहीं. जब तक यह चीन के वुहान, जहां से यह शुरु हुआ उसके आसपास व कुछ एक अन्य देशॊं में था, आम जनता का तो छॊड़िये, सरकरों ने भी सोचा की काम चल जायेगा. अन्ततः जब संक्रमण चीन से निकल कर पहले ईरान , फिर स्पेन और अब अमेरिका में हजारों को लोगों डस लिया, तब हमने मामले की गंभीरता को समझा और सब कुछ बन्द किया. लाकडाउन केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में पहले ही घोषित कर दिया गया था.
एक बात यह भी है कि अगर मान लिया जाय कि चीन ने ऐसा जानबूझ कर किया तो यह देखना होगा कि वे इस वैश्विक महामारी से कैसे लाभ कमाते दिख रहे हैं ? क्या चीन स्वास्थ्य उपकरणों का बड़ा निर्यातक है ? चीन जो निर्यात करता है या कर सकता है उसके कम्पोनेन्ट क्या क्या हैं. इन्टरनेट जो जानकारी मिलती है वह इस प्रकार है:
"The top exports of China are Broadcasting Equipment($231B), Computers ($146B), Office Machine Parts($90.8B), Integrated Circuits ($80.1B) and Telephones($62B)."
source: https://oec.world/en/profile/country/chn/
बहरहाल, आजकल कंसपीरेसी सिध्दान्तों का जमाना है. हर बड़ी वैश्विक घटना के पीछे इस तरह की कुछ संकल्पनायें खोज निकाली जाती हैं. कंसपीरेसी सिध्दान्तों के बारे में विस्तार से समझना रुचिकर हो सकता है. इस विषय पर ज्यादा अध्ययन तो नहीं है लेकिन मिशेल बरकन की एक किताब है “अ कल्चर आफ कंसपीरेसी” जिसकी मुख्य बातों को अगली पोस्ट में साझा करने की कोशिश करुगा !
Tuesday, March 31, 2020
लाकडाउन कथा: प्राग्माटिज्म !
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| वीरान सड़कें. दिल्ली गुड़गाव रोड |
अभी शाम का समय है. मैं कुछ काम की चीजें लेने बाहर गया था. सर्जिकल दस्ताने व मास्क तो पहनना जरुरी है सबको. सब पहन भी रहे हैं. दो तीन वर्ष पहले मैं अकेले मास्क पहन के घूमता था. अब सब साथ हैं. अच्छा लगता है. दुकानें सुबह दो घण्टे के लिए और शाम को दो घण्टे के लिए खुलती हैं. सारी दुकानें नहीं. सब्जी, दवा व प्रोविजन स्टोर्स. ठेले पर सब्जी वाले भी मौजूद रहते हैं. दिन भर वीरान पड़ी गलियों में शाम को थोड़ी सी चहल पहल दिखायी देती है. लेकिन ज्यादा नहीं. बीस पच्चीस मिनट के अन्तराल पर पुलिस की लारी दिख जाती है. वे सबको दूर दूर खड़े होने व मास्क पहनने के लिए कहते हुये चले जाते है, अगर उन्हें कहीं रुक कर कोई विशॆष निर्देष देने की आवश्यकता नहीं महसूस होती है तो.
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| दक्षिण पश्चिम दिल्ली का एक हिस्सा. सामान लेने के लिय पंक्ति में खड़े लोग. |
वैसे जहां मैं रहता हूं यह गूजरों की लोकलिटी है तो पुलिस वालॊं की धौंस भी, अगर कभी दिखानें पड़े तो, न चाहते हुये भी, आईपीसी के सभी नियमॊं का पालन करते हुये भी थॊड़ी सी सेलेक्टिव होती है. कल ही शाम को चार पांच लड़के गली के मुहाने पर, जो कि मुख्य सड़क पर खुलती है, खड़े थे. कांस्टेबल भाई उतरे, और एक बिहारी सब्जी वाले के आसपास खड़े लोगों को निर्देश देकर चले गये. वो भी क्या कर सकते थे. प्राग्माटिज्म एक ऐसा सिध्दांत है जो सभी विचारधाराओं, दर्शनों का पापा है. इसके बिना कोई भी विचार, सिध्दान्त पंगु है.
जहां मैं हमेशा सब्जी लेता हूं वह "ज्वाइंट" आज बन्द था, पास लगे एक ठेले वाले के पास चला गया. वह सब्जियां देने के साथ साथ आसपास खड़े लोगों को बड़ी ही गर्मजोशी से यह बता रहा था कि अपने पचास साल के जीवन में उसने ऐसा कर्फ़्यू नहीं देखा. जब इन्दिरा गांधी नहीं रही थी तब भी वह यही था. लेकिन ऐसा बन्द उसने नहीं देखा. इसके बाद उसने यह भी बताया की यह कलयुग की महामारी है. उसके गुरु जी जो अब नहीं रहे उन्होंने तीन साल पहले ही यह बता दिया था कि ऐसा होगा. उसने बड़ी ही गम्भीरता से बताया कि यह महामारी औरतों के कारण आयी है. औरतें अब धर्म का पालन नहीं करतीं, इसलिए ऐसा हो रहा है. वह दर्शन प्रतिपादन में और आगे बढ़ रहा था और कुछ अकथनीय बातें कहना शुरु कर रहा था कि मैं वहां से चल दिया. प्राग्माटिज्म !
Saturday, November 23, 2019
Saturday, October 26, 2019
Sunday, October 20, 2019
व्यक्ति व समूह
Sunday, May 26, 2019
छिटपुट
1.
जो कविताएं
नहीं लिखी गई
मन में उमग कर रह गई
उन्हें घुटन नहीं होती होगी ?
कब्र में दबे होने जैसी ?
2.
उतर आया धुधलका शाम का
खिड़की से दीखता आसमान
शान्त उदास स्थिर,
एक और दिन बीत गया
कभी न लौटने के लिए।
Friday, December 7, 2018
चीनी की तरह
Thursday, November 22, 2018
मठाधीशी की कला
जरूरी नहीं कि हृदय में ईश्वर का प्रकाश ही आपको व्यावहारिक तौर पर स्थिर, गंभीर, आत्मप्रवृत्त बनाता हो। अपने चित्त के घामड़पन, अपनी कुटिलता की शक्ति में निर्द्वन्द व अटल विश्वास भी व्यक्ति को वाह्य तौर पर उतनी ही स्थिरता देता है जितना कि वास्तविक सत्य का बोध।
उदाहरण के लिए आप अपने आसपास के तमाम बड़े-छोटे मठाधीशों को देख सकते हैं।
Saturday, November 3, 2018
पहले जैसे
प्रमोशन के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा
आफिस की तक झक
नहीं हो रही सेविंग से लेकर
कई दिनों से छूट जा रही जिम
और समय न मिलने से
न हो पा रहे मेडीटेशन की चिन्ता के बीच
मैं अक्सर सोचा करता हूं कि
पहले जैसे
कविताएं भी लिखा करूं !
लेकिन !
सिर्फ सोचने से क्या होता है ?
बताईए !
सपना
सच हो कर आंखों के सम्मुख आता है
आंखें उन्हें चीन्ह नहीं पाती हैं !
आखों के अधूरेपन में
सपना सपना ही रह जाता है !
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Sunday, October 28, 2018
मच्छरात्मकता
शान्ति से आलआऊट पीकर
दीवार पर बैठे मच्छर को
ऊंगली से कोंच कर मार दिया मैंने !
समझ नहीं आता
क्या ठीक किया मैंने !
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#कुकविता
Monday, October 8, 2018
दो कविताएं
दो कविताओं के लिखे जाने के बीच का समय
अब बढ़ गया है
जीवन ये ही है
इस वाक्य के बाद
चिह्न कौन सा खड़ा करू ?
विस्मयादिबोधक ? प्रश्नवाचक ? पूर्णविराम ?
क्या ?
दो कविताओं के बीच का समय
यही खोया हुआ चिन्ह
लील जाता है
Sunday, September 23, 2018
Saturday, September 15, 2018
चार्ल्स बडलेयर की पांच कविताएं
चार्ल्स बडलयर उन्नीसवीं सदी फ्रांस के साहित्यिक परिदृश्य के प्रमुख कवि हैं. ९ अप्रैल १८२१को पेरिस में जन्मे चार्ल्स एक प्रखर कवि होने के साथ साथ अपने समय के प्रख्यात कला-आलोचक, महान गद्य लेखक, प्रभावी अनुवादक भी थे. औद्योगीकरण के प्रभाव में
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