Friday, September 11, 2015

नागालैण्ड की लोककथायें: एक लड़की की कथा जिसे सर्प दंश से मरना था !




एक बार की बात है एक परिवार रहता था जिसमें सिर्फ दो ही बच्चे थे. उन दिनों एक बार घर का मुखिया माथा लेने ( नर-मुण्ड शिकार अभियान पर) गया क्योंकि वह एक योध्दा था. वह और उसके साथी अपने पीछे अपनी पत्नियों और बच्चों को घर पर छोड़ , बहुत दूर के गांवों में शत्रुओं का शिकार करने चले गये. 

यह सुनने में आता है कि उस व्यक्ति की पत्नी को जल्द ही बच्चा होने वाला था. बहुत बहादुरी व सफलतापूर्वक युध्द करने के बाद परिवार का मुखिया युध्द में मारे गये शत्रुओं का सिर पुरस्कार स्वरूप लिए हुये वापस आ रहा था. रास्ता बहुत लम्बा होने के कारण वे जंगल के रास्ते में किसी स्थान पर “संगपित संग” नामक विशाल व घने वृक्ष के नीचे रुके ताकि रात बिता सकें.  

Ang (Chief) of Village in Costume with Gun, Ceremonial Dao (Machete), and Carrying Bag Near Carved Facade of his Longhouse 1954Konyak (Copyright Protected)
वहां वे उसी पेड़ की छाया में सोये. उन्होंने अपने शत्रुओं के सिर अपने घास के पतले बिछावन से पास रख दिया. ऐसा कहा जाता है कि उस रात उस योध्दा ने एक सपना देखा. सपने में भी वही बड़ा सा पॆड़ ,वही छाया थी. उसने देखा बड़े ही विचित्र और विकृत रूप वाले दो मनुष्य जो कि ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्रेत थे , कहीं जा रहे थे. वे प्रेत योध्दा को देख थोड़ी देर रुके एवं बताया कि सुदूर गांव में किसी स्त्री को बच्चा होने वाला है. वे वहीं जा रहे हैं. इतना कह कर वे चले गये.
स्वप्न देखने वाले योध्दा को लगा कि वह स्वप्न नहीं बल्कि सच्चाई देख रहा है. और वस्तुतः सच में यह एक अर्थपूर्ण आभास था. योध्दा उठ बैठा. वह सोचने लगा कि कहीं उसका यह आभास सुदूर गांव में स्थित उसकी पत्नी के होने वाले बच्चे से तो नहीं जुड़ा हुआ है?  उसकी इस सोच ने उसे अशान्त कर दिया. 

थोड़ी देर बाद वह पुनः सोया और फिर से सपना देखा जो कि पहले वाले सपने से जुड़ा हुआ था. इस सपने में भी वही दोनों प्रेत उसी विशाल पेड़ की छाया के नीचे आये जहां योध्दा सो रहा था. अतः योध्दा ने उन्हें सामने पाकर , जैसे कि वे सच में ही सामने खड़े हों, उनसे उस गर्भिणी औरत के होने वाले बच्चे के बारे में पूछा , जैसा कि वे पिछले स्वप्न में कह गये थे.
योध्दा के प्रश्नों का जवाब देते हुये प्रेतों ने बताया की उस औरत को एक लड़की पैदा हुयी है. उन्होंने और कहा कि उस लड़की की मौत सांप के काटने से होगी, ऐसा प्रेतों ने निर्धारित कर दिया है. इस स्वप्न के बाद योध्दा पुनः उठ बैठा. उसे पता चला यह भी एक स्वप्न ही था, निस्संदेह ही सच्चाई नहीं. फिर भी उसने तुरन्त ही सपनों के बारे में सोचना शुरु कर दिया. उसे लग रहा था कि दोनों सपने सुदूर गांव में उसकी पत्नी को होने वाले बच्चे से जुड़े हो सकते हैं. 

अशान्त व थका हुआ , घर का हाल चाल जानने के लिए चिन्तामग्न वह घर पहुंचा. जब उसने एक नन्ही लड़की को अपनी पत्नी के पास लेटे हुये देखा तब तथ्यों की पुष्टि करने के लिए पूछताछ की कि उसकी पत्नी को कब बच्चा हुआ ? और वह स्पष्ट हो गया कि जिस रात उसने स्वप्न देखा था उसी रात उसकी पत्नी को बच्चा हुआ था. 

तुरन्त ही उसने अपना सपना और उसकी संभावित व्याख्या अपनी पत्नी को बताया और कहा कि हो सकता है कि वह सपना परमपिता परमेश्वर द्वारा उनके बच्चे के भाग्य की भविष्यवाणी हो. उसी समय उसने अपनी पत्नी को चेतावनी भी दी वह लड़की को कहीं भी , गांव के बाहर न भेजे और घर पर ही रखे ताकि किसी जहरीले सांप को उस पर हमला करने का मौका न मिले और उसकी मृत्यु न हो.
इन परिस्थितियों में दोनों ने बचाव के हर उपाय करने  का निर्णय लिया जिससे उनकी बेटी संर्प-दंश से होने वाली मृत्यु के भयानक दुर्भाग्य से बच सके क्योकिं आओ नागा परम्पराओं के अनुसार संर्प-दंश से होने वाली मृत्यु एक शर्मनाक , लज्जास्पद मौत होती थी जिसे अपोडिया ( Apodea) कहते हैं, जैसा कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए सपने में हुयी भविष्यवाणी में देखा था.

इसी प्रकार के माहौल में उनकी बेटी बड़ी हुयी व किशोर हो गयी. इसके बाद उसके माता पिता ने उसे बार बार चेतावनी दी  ताकि उसके जीवन में कोई अनिष्ट न हो. फिर भी उसके जीवन में वह समय आ गया जब उसे शादी करके अपने पति के साथ पति के गांव जाना था. 

खतरे का आभास करके पिता ने उसके पति को आदेश दिया कि वह लड़की को अपने कन्धे पर उठाकर दूसरे गांव ले जाय. लड़के ने पिता की बात मानकर वादा किया कि पूरे रास्ते वह लड़की को कहीं भी पैदल नहीं चलने देगा और अपने कन्धे पर ले जायेगा. इस वादे के साथ उन्होंने यात्रा शुरू की ताकि कम से कम रास्ते में उसे कोई सांप न काट सके व उसकी मृत्यु न हो. 

इस प्रकार उन्होंने आधे रास्ते की दूरी तय कर ली , तभी लड़की ने अपने पति से कुछ देर रुकने के लिए कहा ताकि वह मूत्र विसर्जन कर सके. वे वही रुक गये और लड़की थोड़ा आगे झाड़ी की तरफ बढ़ी. तभी उसका पैर एक मरे हुये सांप हुये छोटे सांप के मुंह के ऊपर से रगड़ गया जो उसकी नजरों से ओझल पड़ा हुआ था. तत्क्षण ही सांप के दांत लड़की के पैरॊं में धस गये और नसों में जहर पहुंच जाने के कारण भयानक दर्द शुरु हुआ. वहां से उसे जल्दी जल्दी गांव ले जाया गया. गांव पहुंचते पहुंचते उसके प्राण पखेरू उड़ गये. 

यह हमें बताता है कि ईश्वर ने जो नियति निर्धारित की है वह घटित होनी ही है, उसे कोई नहीं बदल सकता. क्योकिं सब कुछ उसी तरह होगा जैसा ऊपर वाले ने निर्धारित कर रखा है.

Wednesday, August 5, 2015

नागालैण्ड की लोक कथाएं : कोढ़ी का इलाज



(लोक को समझने का एक उपयुक्त माध्यम हो सकती हैं लोककथायें. नागालैण्ड के मोकोकचुंग शहर में घूमते हुये मिली एक छॊटी सी पुस्तक में आई. बेन्डान्गंगाशी जो कि एक अंडरग्राउंड लीडर थे, द्वारा संकलित पचास लोककथाएं मुझे मिली. संकलन अंग्रेजी में था. लेकिन पढकर लगा की कथाओं में नागा लोक संस्कृति की जटिलताओं व साथ ही साथ , सरलताओं की सफल अभिव्यक्ति हुयी हैं. किसी “इचबा” (बाहरी/भारतीय) के नागालैण्ड को समझने , देखने का एक जरिया हो सकती हैं ये कथाएं. प्रस्तुत है अनुवाद का यह प्रयास........)



Ang (Chief) in Partial Costume, with Ear Plugs and Necklaces And Two of his Wives in Costume Near Woven Bamboo Houses with Thatch Roofs 1954 Konyak (Copyright protected)
कोढ़ी का इलाज
(A Leper finds healing power)
बहुत वर्षों पहले की बात है। एक जवान आदमी था जिसे चमड़ी का रोग था। उसकी पूरी देह पर गन्दे निशान थे। इस कारण उसके गांव वालों ने उससे कोई भी बात व्यवहार बन्द कर दिया था व उससे घृणा करते थे. एक जवान आदमी के तौर पर वह भी दूसरे जवानों की तरह अपने आप को किसी लड़की से जुड़ा हुआ देखना चाहता था और इसलिय अक्सर वह रात को अरेजू ( छात्रावास जैसा जिसमें गांव की सारी कुंवारी लड़कियां एक साथ रहती हैं)   के चक्कर लगाता था. फिर भी किसी सुन्दर लड़की ने उसमें रुचि नहीं दिखायी. कोई उससे बात नहीं करना चाहता था. 

  यहां तक कि उसे पूरी दुनियां ही बिलकुल सूनी लगने लगी थी. इतनी सूनी जैसे कि नर्क हो. ऐसा कहा जाता था कि वह गांव के एक सम्मानित परिवार से था लेकिन इससे उसकी कठिन समस्या का निदान नहीं हुआ. उसने बहुत सोचा. सोचा और सोचा. आशाओं , निराशाओं से जूझते हुये अन्त में उसने अपने प्रिय सगे सम्बन्धियों , नाते रिश्तेदारों को छोड़कर जंगल में बसने  का निर्णय लिया. उसने आशा की कि उसे थोड़ी शान्ति मिलेगी. अपने निर्णय के अनुसार भोर में ही उसने दुख और जरूरतों से भरे जंगली जीवन के लिए अपना गांव छोड़ दिया. और बहुत दिनों तक जंगल में यहां वहां भटकने के बाद वह एक गुफा में पहुंचा . वहां पास में ही एक छोटा सा झरना था. 

यहां तक कि तुरन्त ही उसने वहीं रहने की सोची और रहने के लिए हर जरूरी जुगाड़ किया. बहुत सी व्यवस्था के बाद वहां रहने लायक घर जैसा हो पाया. तब , उसी दिन से वह वहां अकेले ही रहा. किसी भी आदमी के सम्पर्क से अछूता, केवल जंगली जानवरों व घने अंधेरे जंगल के शैतानों की संगति में. 

वहां रहते हुये एक दिन सुबह वह अपनी गहरी निद्रा से उठा और गुफा में चुपचाप शान्ति से बैठा रहा. तभी उसे एक आवज सुनायी दी. उसे लगा कि आसपास झाड़ियों में कुछ है. वह धीरे से उठा और दबे पांव उधर गया जहां से आवाज आ रही थी.      
                                                   


जैसे ही उसने झाड़ियों के बीच झांका , उसे एक बड़ा पेर (कोबरा, जहरीला सांप) दिखायी दिया. ध्यान से देखने पर पता चला कि पेर की पूरी देह पर कोई रोग है जिससे उसकी चमड़ी सड़ गयी है. वह बहुत बुरा लग रहा था, मानो उसे कुष्ठ रोग हो.
पेर धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा. उस व्यक्ति ने अपने आप को पेड़ों के पीछे छुपा लिया और चुपचाप पेर को देखता रहा. पेर थोड़ी दूर जाकर वहां उगी एक चौड़े पत्तों वाली घास को खाने लगा . आदमी आश्चर्यपूर्वक पेर और उस घास को देखता रहा. कुछ पत्तियां खा लेने के बाद पेर धम्म से पास के झरने के गहरे पानी में डुबकी लेने उतर गया.
काफी समय तक नहाने के बाद पेर( सांप) गहरे पानी से बाहर आया. लेकिन अब वह एकदम नया पेर लग रहा था. उसकी त्वचा बहुत मुलायम व कोमल हो गयी थी. उस पर वह गन्दा कुष्ठ रोग नहीं था. यह शानदार परिवर्तन बस कुछ मिनटों में हुआ था. इसके बाद पेर वहां से झाड़ियों में सरक गया, कभी दुबारा न दिखने के लिए.
यह सब देखकर जवान व्यक्ति एकदम स्तम्भित रह गया. उसने उस जादूई पौधे के बारे में जानना चाहा जो सांप की ऐसी गन्दी और भयानक चमड़ी की बीमारी को दो पल में धुल सकता है. थोड़ा ही खोजने के बाद उसे वह पौधा मिल गया . यह सोचकर कि जैसे पेर की चमड़ी चमक उठी , वैसी उसकी भी हो जाएगी, जवान आदमी ने पौधे की कुछ पत्तियां निगल ली , कुछ अपनी देह पर मल ली. उसके बाद पेर की तरह उसने भी झरने के गहरे पानी में डुबकी लगा दी. और जब वह बाहर आया तो उसने अपने शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा.
अब उस जवान व्यक्ति की देह पर गन्दी और जर्जर चमड़ी कहीं भी नहीं थी. थी तो बस चमकदार कोमल , नयी त्वचा, बिलकुल किसी बच्चे जैसी. अत्यन्त ही आह्लादमय आश्चर्य के साथ वह जवान व्यक्ति एक नए प्राणी के तौर पर बाहर आया. जैसे कि यह सब एक सपना हो. हांलाकि यह सब एक सच था. और उस जवान व्यक्ति के पास कोई ऐसा शब्द नहीं था जिससे इस आश्चर्यजनक रूप से चंगा कर देने वाली शक्ति के प्रति हो रही खुशी को व्यक्त कर सके. इसी खुशी में वह अपने घर, गांव की ओर चल पड़ा, अपनी अधेरी गुफा को सदा के लिए छोड़कर.    
जैसे ही उसने झाड़ियों के बीच झांका , उसे एक बड़ा पेर (कोबरा, जहरीला सांप) दिखायी दिया. ध्यान से देखने पर पता चला कि पेर की पूरी देह पर कोई रोग है जिससे उसकी चमड़ी सड़ गयी है. वह बहुत बुरा लग रहा था, मानो उसे कुष्ठ रोग हो.
पेर धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा. उस व्यक्ति ने अपने आप को पेड़ों के पीछे छुपा लिया और चुपचाप पेर को देखता रहा. पेर थोड़ी दूर जाकर वहां उगी एक चौड़े पत्तों वाली घास को खाने लगा . आदमी आश्चर्यपूर्वक पेर और उस घास को देखता रहा. कुछ पत्तियां खा लेने के बाद पेर धम्म से पास के झरने के गहरे पानी में डुबकी लेने उतर गया.
काफी समय तक नहाने के बाद पेर( सांप) गहरे पानी से बाहर आया. लेकिन अब वह एकदम नया पेर लग रहा था. उसकी त्वचा बहुत मुलायम व कोमल हो गयी थी. उस पर वह गन्दा कुष्ठ रोग नहीं था. यह शानदार परिवर्तन बस कुछ मिनटों में हुआ था. इसके बाद पेर वहां से झाड़ियों में सरक गया, कभी दुबारा न दिखने के लिए.
यह सब देखकर जवान व्यक्ति एकदम स्तम्भित रह गया. उसने उस जादूई पौधे के बारे में जानना चाहा जो सांप की ऐसी गन्दी और भयानक चमड़ी की बीमारी को दो पल में धुल सकता है. थोड़ा ही खोजने के बाद उसे वह पौधा मिल गया . यह सोचकर कि जैसे पेर की चमड़ी चमक उठी , वैसी उसकी भी हो जाएगी, जवान आदमी ने पौधे की कुछ पत्तियां निगल ली , कुछ अपनी देह पर मल ली. उसके बाद पेर की तरह उसने भी झरने के गहरे पानी में डुबकी लगा दी. और जब वह बाहर आया तो उसने अपने शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा.
अब उस जवान व्यक्ति की देह पर गन्दी और जर्जर चमड़ी कहीं भी नहीं थी. थी तो बस चमकदार कोमल , नयी त्वचा, बिलकुल किसी बच्चे जैसी. अत्यन्त ही आह्लादमय आश्चर्य के साथ वह जवान व्यक्ति एक नए प्राणी के तौर पर बाहर आया. जैसे कि यह सब एक सपना हो. हांलाकि यह सब एक सच था. और उस जवान व्यक्ति के पास कोई ऐसा शब्द नहीं था जिससे इस आश्चर्यजनक रूप से चंगा कर देने वाली शक्ति के प्रति हो रही खुशी को व्यक्त कर सके. इसी खुशी में वह अपने घर, गांव की ओर चल पड़ा, अपनी अधेरी गुफा को सदा के लिए छोड़कर.   

उस जवान का गांव वापस आना एक सपने जैसा ही था. उसके सगे सम्बन्धियों ने उसका खूब स्वागत किया. उसने लोगों को उत्साहपूर्वक बताया कि किस तरह पेर (सांप) के दिखाये गये जादूयी पौधे से उसने अपनी भयानक बिमारी का इलाज किया. इस अवसर पर सभी ने ध्यानपूर्वक पौधे के बारे में जानकारी ली. और प्रसन्नतापूर्वक सर्वशक्तिशाली ईश्वर को धन्यवाद दिया जिसने अपने सेवकों को सांप के द्वारा एक भयानक बीमारी से ठीक होने का रास्ता दिखाया.
वस्तुतः सर्वशक्तिशाली ईश्वर के इस गहन प्रेम के
लिए पूरे गांव ने खूब उत्सव मनाया.

इसके बाद वह व्यक्ति अपने पुराने दिनों की तरह , रोज रात अरेजू (लड़कियों का छात्रावास) गया. वहां उसने लड़कियों के व्यवहार में बहुत परिवर्तन महसूस किया. पुराने दिनों से अलग, घुसते ही , लड़कियों ने उसे आग के पास वाला स्थान बैठने के लिये दिया. लेकिन उसने बैठने के लिए वह स्थान लेने से इन्कार कर दिया और पुराने दिनों की तरह वह कमरे के एक कोने में बैठा. इससे तुरन्त ही लड़कियां आंसू बहाने लगी. जल्द ही सबने आंसू पोछे और एक दूसरे से बहाना किया कि धुंए की वजह से उनके आंसू निकलने लगे थे.


जल्द ही उस व्यक्ति ने शादी कर ली और सभी बीमारियों से आजाद एक सुखी घर बसाया, अपने बुरे अतीत को भुलाकर. उस आदमी का नाम लामसंग था. और वह जिस गुफा में रहा था उसे अब लामसंग यदेन कहा जाता है. यह गुफा अब भी उंग्मा गांव के पास लामसंग रोगी के दुख व कठिनाई की कहानी कहती , स्थित है. 

Sunday, August 2, 2015

धर्म एक तवायफ़ है।

संस्थागत धर्म एक तवायफ़ है।
राजनीति के कोठे पर नाचा करती है।


रसूख की लार से गीली कर उसकी देह
सत्ता के ठेकेदार
करते हैं दानवी उपभोग।


आज से नहीं
बहुत पहले से।

Sunday, May 3, 2015

चार पैरों वाला दूलहा

वो हंसती भी थी
रोती भी थी।
एक ही साथ।

घरवालों ने आज ही
तय किया था
खरीदना
उसके लिए
एक चार पैरों वाला इन्जिनीयर दुलहा।
नीलामी पूरी पारदर्शी थी
सबके लिए एक दाम
भ्रष्टाचार मुक्त
पन्द्रह लाख कैश एक चारपहिया ।


वो चुप थी ।
बोलती भी थी ।
एक ही साथ।

मां ने डाटा भी था
बहुत आज
बन्द करो दिनभर अब
ये मोबाइल में अनजाने मैसज पढ़ना
बाहर जाना जीन्स पहनना
चार पैरों वाले दुलहे को
पसंद नहीं ये सब।


वो दिखती भी थी ।
अदृश्य भी थी।
एक ही साथ।

आज ही हुई थी उसकी
अंग अंग नुमाइश
लोग देखने आये थे
अपनी ही मां को न जाने क्या हुआ था
मां ने ही सजाया संवारा
ट्रे ले भेजा था दलान में ।
सांस्कृतिक वेश्यावृत्ति के इस धन्धे में
बात ऐसे ही तो बनती है...
चेहरे का आकार कैसा है...
चमड़ी की चमक कैसी है....
स्तनों का उभार कैसा है......


वो थी भी।
और नहीं भी थी।
एक ही साथ।

Thursday, April 30, 2015

कविता में

जब
दुनिया गर्म हो चुकी होगी बहुत
तब भी
थोड़ी ठण्डक बची रहेगी
कविता में।

जब ऊपर नीचे
चहुंदिश
होगी ध्वनि ही ध्वनि
जीवन के एकमात्र निशान की तरह
थोड़ा सा सन्नाटा
बचा रहेगा
कविता में।

नहीं होने की कगार पर
पहुंच चुकी हर चीज़
सिर्फ संग्रहालयों
संरक्षित अभयारण्यों में ही नहीं
कविता की उपत्यकाओं में भी
चोरी छिपे
बचा ली जाएगी।

वो
बिन ब्याही मांए
अधूरी विधावाएं
भूखा किसान
शामिल न  हो किसी दंगे में
ऐसा कोई भगवान
सबके लिए 
पूर्ण विराम के बाद भी
थोड़ी जगह
बची रहेगी
कविता में।

टूट जाएंगे जब
कथा के सूत्र
यहाँ वहाँ बिखर जाएंगे सब पाठ
विक्षिप्त इतिहास
टुकड़े टुकड़े रोप आएगा स्वयं को
कविता की क्यारियों में
ताकि बचा लिया जाए
फिर से पनपने को।


कविता में
बचा रहेगा सब कुछ
जो जरूरी है।

Monday, April 27, 2015

शान्त सतह

ऊपर की
शान्त सतह से
कहाँ पता चलता है
क्या क्या कुछ है
गहरे अन्तर !

देखो तो..
धरती..
सागर..
पेड़..
पहाड़
और
खुद
तुम ही

देखो तो....

कितनी गतियां
 कितने विप्लव
 पलते भीतर
 खिलते भीतर
 देखो तो....

Thursday, April 23, 2015

किसान के बारे में बिलकुल नहीं













हर संवेदना के
अपने भगवान होते हैं
दरी के नीचे अखबार से
काटकर छुपाए हुए भगवान !
घुस आते हैं जो संवेदक की
सहस्र वर्ष पुरानी
ब्रह्माण्डीय कोशिकीय़ स्मृति के छज्जे फ़ांदकर ! 

हर वक्त वो करते रहते हैं
संवेदना का यौन शोषण !
अधिकार भी है उन्हें
चूंकि वे भगवान हैं
विचार सम्मत
बजार सम्मत !
अखबार सम्मत !

हर संवेदना का
अपना बैंक अकांउन्ट
बैंक बैलेन्स भी होता है
जांचते रहते है जिन्हें
जहरीले केंचुए
केन्द्रिय विश्वविद्यालयों,
संस्थानों, गैर सरकारी संस्थानों, 
खबरों के घूर में पलने वाले  !
और जारी करते रहते हैं
संवेदनाओं के बैंक बैलेन्स के हिसाब से
उनके गहरे, उथले , तीव्र होने के
ऐतिहासिक अकादमिक दस्तावेज
जो अन्ततः
विश्व-समस्याओं के निदान हेतु प्रतिबद्ध
महान यहूदी चिन्ताओं का आधार बनेगी !

हर संवेदना के
अपने अपने साहित्य 
अपने अपने ब्रांडेड  कवि भी हुआ करते हैं !
हस्तक्षेप के कवि,
रोध, प्रतिरोध के कवि....
तरह तरह के कवि...
द्वार पर अपने पाले
विचारधारा/(ओं) की एक कुतिया ...

ओ ! मरे हुए किसान की जिन्दा आत्मा !
ट्विटर पर भेजूंगा मैं तुमको भागवत का सार...
नैंनम्‍ छिन्दति शस्त्राणि....
नैंनम्‍ दहति पावकः...
उससे पहले ,
छोटे से ब्रेक में...

आओ ! देखो !
तुम्हें ज्ञात हो न ज्ञात हो !
बरसात ने नहीं ,
 बरबाद फसल ने नहीं , 
तुममें दफ़्न ऐसी ही बहुत सी संवेदना ने
ललकारा था तुम्हारी आत्महन्ता आस्था को
जिसका भगवान
जिसका बैंक अकाउन्ट
जिसके कवि
जहरीले केचुऎ निकाल लाये हैं
दरी के नीचे से ,
सड़ान्ध भरे कमरों से !
बस्साती बजबजाती लाईब्रेरियों से ! ! !

अब तुम्हारे बाद ,
हर बार की तरह,
किसी वैयक्तिक आग्रह से मुक्त
तुम्हारी  यह खोजी जा चुकी संवेदना ही दोषी है
सब घात , प्रतिघातों की
पापॊं, अत्याचारॊं की...
इसलिए
यह खोजी जा चुकी संवेदना
अब रंगी जायेगी,
पोती जायेगी, सरे आम बाजार में
ढकी हुयी नंगी बेची भी जाएगी...
इसी के सहारे
नया इतिहास लिखा जाएगा..
पृथ्वी के नये आकार की खोज की जायेगी ..
सौर मण्डल में ग्रहों की संख्या
प्रशान्त महासागर की गहराई ..
सब बदल दी जाएगी...

ओ ! मरे हुए किसान की जिन्दा आत्मा !
तुम झुको !
दर्शन करो
अपनी संवेदना के इस नये भगवान के !
लगाओ अंगूठा
अपनी संवेदना के बैंक बैलेन्स के कागजात पर  ,
अगर आत्मा रहते हुए भी
बचा रह गया हो पास तुम्हारे तब......

और हां ! अगली बार
जन्मते हुए
ठीक से चुनना अपनी संवेदनाऎ!
बचना
भगवानों से,
बैंक बैलेन्सों से,
कवियों से,
जहरीले केचुओं से......
हां ! इन्हीं में से कुछ
मुझसे भी...... 

Wednesday, April 22, 2015

अन्ततः


मैं जानता हूँ
 रह जाऊँगा अकेले किसी रात जैसे
 सबसे अन्त में बचा रह गया
 कोई पानी का छर्रा
 छहर छहर हुई बारिश बाद।
 पता है मुझे
 टूटने में भी
 सबसे अन्त में होगा मेरा विलगाव
 जब जा चुके होंगे सारे पीले पत्ते
 मुझे कुछ होने का भ्रम देने वाली डार से
 सबसे अन्त में बाँटूगा मैं
 पृथक होने के भाव में जबरदस्ती लिखे सूक्तों का सारांश
 क्योंकि अन्त में तो नहीं बचती कविता भी
 शब्द व अर्थ तो झर चुके होते हैं कब के !

पता है मुझे
 देखूंगा मैं
 सारा का सारा अन्त
 जब जा चुके होंगे सब
 मैं खड़ा रहूँगा
 समय जब खत्म हो रहा होगा
 किसी अनाम अन्तिम कथा को
 मिथक कह
 मैं उसे विदा दूँगा
 आकाश जब रीत रहा होगा
 अन्तिम बार उसे महसूस करूँगा
 साँसों से अन्दर लूंगा
 फिर बाहर कर दूंगा.....

मालूम है मुझे
 अवनि जब अन्तिम बार
 उसी अथाह विस्मृति में
 खोज आयेगी
 एकदा पुनः
 सूरज के गलियारे में अपनी
 खोयी चांदी की गुड़िया...
वहीं रहूँगा मैं
 मुस्कुराता हुआ....
जानता हूँ मैं
 रह जाऊँगा
 किसी रात अकेला....... 

Monday, February 2, 2015

हिन्दी




ध्वनि ,शब्द
और अर्थ से परे
बस एक भाषा ही नहीं
हिन्दी !
तुम एक जागृत संवेदना वृत्त हो ,
अभिव्यक्ति के नवीन सोपानों में
हमारी समग्र सामासिक चेतना को
प्रतिपल नव्य उत्स देती !

कक्षाओं , व्याकरण की किताबों ,
शिक्षण की अनेक प्रविधियों व
व्यवहार के बहु प्रसंगों को ही नहीं
हिन्दी !
तुम हमारे अस्तित्व की
उन भंगिमाओं को भी पूर्ण करती हो
जिनसे हम अपने अन्तस को
बाह्य से जोड़ पाते हैं !

अपने दृश्य वाक्यों की
भीतरी अदृश्य संरचनाऒं में से ,
शब्दों के नेपथ्य की
अर्न्तभूत
अर्थ भाव बॊध गुहाओं  से ,
वृहद गद्यांशों पद्यांशों से ,
पराभूत
चेतना को धुलकर साफ कर देने वाले
परिमार्जित मानवीय ग्यान बिम्बों में
हिन्दी !
तुम हमारे व्यक्तित्व की
उन रस धाराओं को
बड़े करीने से ,
बड़ी कुशलता , बड़ी अदब से
सजा कर , सवांरकर रखा है
जो हमारी सभ्यता के मूल उत्स को
समय के क्रूर पंजों की पहुंच से दूर करती हैं ,
हमें अक्षुण्ण बनाती हैं ।

हिन्दी !
तुम एकमात्र हो !
हम सोच ही नहीं सकते कोई विकल्प
तुम्हारे लिये
क्योंकि
हमनें ही तुम्हें नहीं
बल्कि तुमनें भी हमें
हमारी समन्वय व समायोजन की
सहिष्णु सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के साथ
समझा है
आत्मसात किया है
अभिव्यक्त किया है ! ! !