मैं जानता हूँ
रह जाऊँगा अकेले किसी रात जैसे
सबसे अन्त में बचा रह गया
कोई पानी का छर्रा
छहर छहर हुई बारिश बाद।
पता है मुझे
टूटने में भी
सबसे अन्त में होगा मेरा विलगाव
जब जा चुके होंगे सारे पीले पत्ते
मुझे कुछ होने का भ्रम देने वाली डार से
सबसे अन्त में बाँटूगा मैं
पृथक होने के भाव में जबरदस्ती लिखे सूक्तों का सारांश
क्योंकि अन्त में तो नहीं बचती कविता भी
शब्द व अर्थ तो झर चुके होते हैं कब के !
पता है मुझे
देखूंगा मैं
सारा का सारा अन्त
जब जा चुके होंगे सब
मैं खड़ा रहूँगा
समय जब खत्म हो रहा होगा
किसी अनाम अन्तिम कथा को
मिथक कह
मैं उसे विदा दूँगा
आकाश जब रीत रहा होगा
अन्तिम बार उसे महसूस करूँगा
साँसों से अन्दर लूंगा
फिर बाहर कर दूंगा.....
मालूम है मुझे
अवनि जब अन्तिम बार
उसी अथाह विस्मृति में
खोज आयेगी
एकदा पुनः
सूरज के गलियारे में अपनी
खोयी चांदी की गुड़िया...
वहीं रहूँगा मैं
मुस्कुराता हुआ....
जानता हूँ मैं
रह जाऊँगा
किसी रात अकेला.......
