Sunday, June 23, 2013

सोच (२)



सब कुछ स्वयं में ही विरोधाभासी है । जो है, उसी में उसका विरोध है , विपरीत है । सच में झूठ है, झूठ में सच है , मौत में जीवन है , जीवन में मौत है, जो अच्छा है , वही क्षण के एक बिन्दु के बाद बुरा है , बुरा है वही स्थान की एक अलग विमा में अच्छा है !
और सबसे रहस्यमय हैं इन विपरीतताओं के संधिस्थल , वे गूढ क्षितिज , जहां सच झूठ से मिलता है , मौत जीवन से मिलती है , जीवन मौत से मिलता है और गहन संवेदना विषण्ण हिंसा से मिलती है !

Monday, June 10, 2013

सुन तो लो , दीर्घापांग !



दीर्घापांग* !
जाने दो , गया , जो गया
अब क्या लेना उससे !

ढ़ूढ लो तुम कण्व आश्रम में
नये पते ,
नये वृन्त , नये पुष्प !

बस जब स्मृति संस्पर्श से
महत्तम हो व्यथा के समापवर्त्य
बैठ द्वारे कण्व कुटि के
उन धान के पौधों को निहारना
जिन्हें शकु रोप छॊड़ चली गयी है !
खड़े होंगे वे वैसे ही अभी जस के तस
बढ़ेगें फूलेंगे फलेंगे झरेंगे सूखेगे फिर वे
इस बार बिना शकु के रोपे ही
खुद उगेंगे
बनकर दूसरे
नये पौधे नहीं
बल्कि वही , ठीक वही
जिन्हें शकु रोप छोड़ चली गयी है !

दीर्घापांग !
तुम वहीं बैठना !
घण्टों, विलम्बित मौन से शून्य में खिंचे हुये
सजल उनींदी पलकों में
किसी अन्जान पहाड़ी पुहुंप सी
सरलता की तरलता भर
उन धान की पंक्तियों को निहारते रहना
साथ ही निहारना
विस्तृत सम्मुख
विशद स्पष्ट नील व्योम पट मध्य
समूह संपृक्त , अकेला भटकता रह गया
असहाय गल-दश्रु , करतल आकृति धारी श्वेत जलद पुंज !

इन सब स्मृति अवशेषॊं में भटकते हुये जब
थोड़े परिचित थोड़े अपरिचित , किन्तु बुझ चुके
किसी भव्य घनीभूत स्नेह ममत्व पुंज की छाया
छू निकले
तुम्हारे शिशु नवनीत कपोलों को
और
साथी मेरे भोले ! कर जाय व्यर्थ इक धक्के से
इन सब स्मृति अवशेषों को ,
सब धान के पौधों को ,
मालिनी तट के कुन्जॊं को ,
अमलतास के झक झक गुच्छॊं को ,
तब रखना धैर्य मित्र मेरे !
लगे यूं कि जैसे
आश्रम में जब सांध्य आराधन ,य
ज्योपरान्त
कण्व सहित सब ऋत्विक गण
बैठे हो ध्यान मौन तल्लीन
गोधलि के विस्तृत प्रांगण में ,
शिरीष गुल्मों पर
वन
ज्योत्स्ना हो रही बिखर ,
जंगली सन्नाटे की वीणा पर
राग यमन हो डूब रहा
और तुम बैठे हो
वृक्ष तले गुमसुम
क्षितिज द्वित्व में विलीन होता दिवाकर अगोरते
तभी हां ठीक तभी
श्रेय पूरित
प्रांजल नेहमयी
वही परिचित शकु की पुकार
का छद्म आभास हो आये
और व्याकुल मन इधर उधर देख
इक बूंद बन ढ़रक जाये !

तब रखना धैर्य , मित्र मेरे !


 *अभिज्ञान शाकुन्तलम्‍ में वह घायल हिरन जिसे  शकुन्तला ने बचाया था व बाद में पाल कर बड़ा किया था.

Monday, May 27, 2013

पत्तों पर ओस


Knitting Girl, 1869अनाम दिन किसी शाम
छोड़ आये जो तुम
उस अजान पेड़ से बतियाने में भूलकर उसपर
थोड़ा सा गौरैया के छोटे बच्चे सा प्यार
वह प्यार के दो चमकीले मोती बन अब
दो सीपी सी आंखों में बस गया है !

उस दिन हवा की कॊठरी में
टहलते वक्त कच्ची दोपहर को
गीली हवा के ताखॊं पर रख आये  तुम
प्यारी सपनीली बातों की दो पुड़िया !
वह भी मधुरी चिठ्ठी बन
दो कानों में बजती रहती है !

देखॊ !
उस दिन अजाने
नीले फूलॊं के गुच्छे को
भर आंखॊं में भर सांसॊं में
दुलराया था जो तुमने
वह भी
घने नेह की मृदुल डली सा
उस एक हिये में
अंजता रहता है !

Thursday, May 16, 2013

Thursday, May 9, 2013

सूरज की डायरी



सूरज की डायरी का
एक पन्ना –- एक दिन !


पन्नों में तीन चार रंगों के शेड  !


किशोरवय सूरज जब
किसी और अन्तरिक्ष मण्डल में था ,
रहस्यमयी प्रौढ़ निहारिकाओं से घिरा हुआ , तब की स्मृतियां !


सूरज के दहकते मनः प्रिज्म से होकर
दिन के पन्नें पर सात रगों के बहाने
हजारों रंगों की फुहारें
फुहरती , बिखरती  , चमकती 
पन्ने में पक्तियों की डाली पर
टुकुर टुकुर बैठी  धरती की चिड़िया के पंखॊं पर !





पन्ने के आधे हाफ में
सूरज का परिपक्व विरागपूर्ण विगत-प्रेम- उल्लास
गहन सान्द्र पीत भासित
किसी मिथक सी सत्य धूप की रोशनायी में
लिखा जाता  !
वहां उपस्थित होते हैं
कुछ अदृश्य गेरुये फूल भी
सम्बोधन  चिन्हों के स्थान पर
पूर्ण  और अर्ध विराम  के बीच
अटके हुये, कहीं !


(आधी कविता. )