Saturday, December 7, 2013

कटोरा और पानी



हमारी संस्कृति , हमारी परंपराएं एक कटोरे जैसी हैं जिसमें हमारी संवेदना का द्रव कटोरे की भाषा में अपना आकार धरता है ।
लघु आयतन द्रव के लिए कटॊरा एक सम्बल है , एक रूप है , एक गति है किन्तु निरन्तर प्रगाढ़ व विस्तृत होते द्रव आयतन के लिए यह एक बन्धन है

Sunday, October 27, 2013

हर्फ़



तुम ,
नीले उजले रंग की 
एक बूंद थी
दवात की बारी पर 
ढरकी हुयी ,
एकाकी, स्वयं में थिर !

मैं,
कलम की नोक की तरह
रहा तुम्हारे पास !

तुम सूख गयी मुझमें...
और हमनें 
लिखे कई  हर्फ़ !

जिन्हें लोग 
उस वक्त बोला किये
जब वे चुप रहे ,
किसी गहरे खोये हुये प्यार
के बारे में सोचते हुये !

वो हर्फ
सूरज, उगने से पहले
फूल, खिलने से पहले
चिड़िया, गाने से पहले
अब,
बांचा करते हैं !! !

उन कुछ
अबूझ और गज़ब के
हर्फ़ों के बारे में
सोचा करता हूं मैं भी
कभी कभी जब
नीले उदास बादलॊं के 
छज्जों में लुढका हुआ
कुछ और 
नहीं सोचना चाहता  !

Monday, October 7, 2013

गैरजरूरी



 
जब निथरती है बूदों की लड़ी
झर झर बादलॊं की बिछावन से
तब नीचॆ खड़ा
नम धरती के 
एक छोटे से हिस्से गुथा
एक वृक्ष होता हूं मैं
बिना किसी प्रयास के
स्वयं ही अस्तित्वगत !

उषा के आश्लेष में 
रक्ताभ जुराबों से जब
फूट पड़ती हैं कुछ झिलमिल किरनें
तब बादलॊं के 
एक सफेद खरगोशी टुकड़े को
अपनी हरी देह पर जगह जगह सजाये
मोक्ष का भी मोह छोड़ चुके
किसी योगी के मन जैसी
थिर और शान्त घाटी होता हूं मैं !

अचानक जब कभी 
हवाओं की सोहबत में
भोले भाले रजत मेघ दल
भूल अपने रास्ते
घेर लेते हैं 
मेरे आस पास के सब दृश्य –---
दूर पहाड़ पर वो झोपड़ी ...
ढलान पर खड़ा वो अकेला पाइन ...
शिखर पर अटका वो चर्च का त्रिभुज ...
  सब ! ! !
तब
इस विलीन हो रहे दृश्य में
मैं
अन्ततः बचा रह गया
एक गैरजरूरी रहस्य होता हूं
स्वंय के लिये ही अबूझ
       स्वंय के लिये ही अज्ञेय !     

Saturday, August 10, 2013

किसान का बेटा



[ज्यूडिथ रिट की कविता "लीजेण्ड" का भावानुवाद/(Adaptation) ]

लेकर बन्दूक निकल आया किसान का बेटा ,
दौड़ पड़ा काला गबरा पीछे उसके !
मकड़ी के जालों ने बांधे पैर ,
उफनती नदियों ने रोकी राह ,
उसकी पुतलियों  से कंटीली झाड़ियों ने
नोच लेने चाहे रोशनी के गुच्छे ,
दुधिया हुआ आसमान ,बरसे चूने के पत्थर !

लेकिन वह एकनिष्ठ चलता रहा !
अपनी बन्दूक और काले गबरे से कहा उसने
वह मसल सकता है शाखांए
लांघ सकता है नदियां ,
तीक्ष्ण दृष्टि से भस्म कर सकता है
रास्ते की लिजलिजी मकड़ियां !

बांधे सर पर काली पगड़ी
वह, बेटा किसान का गुजर गया चारागाहों से ,
उत्तुंग शिखरों ने करना चाहा आक्रान्त अपनी दुर्गम ऊंचाइयों से
बूढ़ा मनहूस काला कौवा टर्राया “ मरेगा तू एक दिन !”
साथ ही गिरे मूसलाधार झंझावात
जैसे आसमान से गिर रहें हो फावड़े ,
किन्तु वह अविचल ! वह अनवरत ! कहा उसने 
फांद सकता है पहाड़
चीर सकता है चट्टानें
और किसी भी क्षण ,
मसल सकता है पुराने मनहूस कौवे की गरदन !

इस तरह
पहुंचा वह दिन के उस हिस्से में
जहां सूरज बूढ़ा हो झरने लगा था राख-सा ,
खड़ी थी सम्मुख रात लिए विस्तृत मुख विवर
यूं कि जैसे हो कोई बन्दूक की नली ,
या पुरानी फटी काली पगड़ी ,
या कि पीछे भूंकता दौड़ता काला कुत्ता !
झर रहा सूरज झरता रहा राख सा
चिचियाते रहे मैना और कबूतरों के झुण्ड ,
बढ़ी घासों ने झुक बिझाये उसके लिये बिछौने ,
और तब
पीछे छूट चुके काले गबरे के बाद
उसने तोड़ दी अपनी बन्दूक ,
तार तार कर डाली अपनी काली पगड़ी !

लेकिन तभी !
हां ठीक तभी !
रात के श्यामल दरपन में
विहंसा  एक इन्द्रधनुष
कि जैसे उसके हिय की आस-कनी ही खिली हो हो इन्द्रधनुष !
वह दौड़ा शशक सा तेज़
चढ़ गया ,हो जैसे कोई लोमड़ी
करने हस्तगत वह इन्द्रधनुष
बर्फ के बड़े टुकड़े की तरह ! स्वर्ण - वलय की तरह !
फड़फड़ाते हुये बिखर गये
चिचियाते मैना और कबूतरों के झुण्ड !
पहाड़ पर घासों ने सीधे कर दिये
अपने श्लथ पड़े डैने  !


अपनी टूटी बन्दूक के बजाय
किसान के बटे ने
बलिष्ठ बाहुओं में लटकाया जगमग इन्द्रधनुष
वह विरल दृश्य ! ! !
सरीसृप दौड़ पड़े निरखने ।
हट गये रास्ते से सब जन्तु ,स्वागतेय
रहा भासित सूर्य सा वह इन्द्रधनुष ,
चहुं दिशा गूंज उठा जयगीत ,
आक्षितिज उठे उद्गार ,
यह है शौर्य अतुलनीय
यह है शौर्य अकल्पनीय
है यह शौर्य अविश्वसनीय !

वह  उर्जस्वी ! बेटा किसान का !
चला घर को उमंग में
झुलाये कन्धे पर इन्द्रधनुष .