Saturday, August 10, 2013

किसान का बेटा



[ज्यूडिथ रिट की कविता "लीजेण्ड" का भावानुवाद/(Adaptation) ]

लेकर बन्दूक निकल आया किसान का बेटा ,
दौड़ पड़ा काला गबरा पीछे उसके !
मकड़ी के जालों ने बांधे पैर ,
उफनती नदियों ने रोकी राह ,
उसकी पुतलियों  से कंटीली झाड़ियों ने
नोच लेने चाहे रोशनी के गुच्छे ,
दुधिया हुआ आसमान ,बरसे चूने के पत्थर !

लेकिन वह एकनिष्ठ चलता रहा !
अपनी बन्दूक और काले गबरे से कहा उसने
वह मसल सकता है शाखांए
लांघ सकता है नदियां ,
तीक्ष्ण दृष्टि से भस्म कर सकता है
रास्ते की लिजलिजी मकड़ियां !

बांधे सर पर काली पगड़ी
वह, बेटा किसान का गुजर गया चारागाहों से ,
उत्तुंग शिखरों ने करना चाहा आक्रान्त अपनी दुर्गम ऊंचाइयों से
बूढ़ा मनहूस काला कौवा टर्राया “ मरेगा तू एक दिन !”
साथ ही गिरे मूसलाधार झंझावात
जैसे आसमान से गिर रहें हो फावड़े ,
किन्तु वह अविचल ! वह अनवरत ! कहा उसने 
फांद सकता है पहाड़
चीर सकता है चट्टानें
और किसी भी क्षण ,
मसल सकता है पुराने मनहूस कौवे की गरदन !

इस तरह
पहुंचा वह दिन के उस हिस्से में
जहां सूरज बूढ़ा हो झरने लगा था राख-सा ,
खड़ी थी सम्मुख रात लिए विस्तृत मुख विवर
यूं कि जैसे हो कोई बन्दूक की नली ,
या पुरानी फटी काली पगड़ी ,
या कि पीछे भूंकता दौड़ता काला कुत्ता !
झर रहा सूरज झरता रहा राख सा
चिचियाते रहे मैना और कबूतरों के झुण्ड ,
बढ़ी घासों ने झुक बिझाये उसके लिये बिछौने ,
और तब
पीछे छूट चुके काले गबरे के बाद
उसने तोड़ दी अपनी बन्दूक ,
तार तार कर डाली अपनी काली पगड़ी !

लेकिन तभी !
हां ठीक तभी !
रात के श्यामल दरपन में
विहंसा  एक इन्द्रधनुष
कि जैसे उसके हिय की आस-कनी ही खिली हो हो इन्द्रधनुष !
वह दौड़ा शशक सा तेज़
चढ़ गया ,हो जैसे कोई लोमड़ी
करने हस्तगत वह इन्द्रधनुष
बर्फ के बड़े टुकड़े की तरह ! स्वर्ण - वलय की तरह !
फड़फड़ाते हुये बिखर गये
चिचियाते मैना और कबूतरों के झुण्ड !
पहाड़ पर घासों ने सीधे कर दिये
अपने श्लथ पड़े डैने  !


अपनी टूटी बन्दूक के बजाय
किसान के बटे ने
बलिष्ठ बाहुओं में लटकाया जगमग इन्द्रधनुष
वह विरल दृश्य ! ! !
सरीसृप दौड़ पड़े निरखने ।
हट गये रास्ते से सब जन्तु ,स्वागतेय
रहा भासित सूर्य सा वह इन्द्रधनुष ,
चहुं दिशा गूंज उठा जयगीत ,
आक्षितिज उठे उद्गार ,
यह है शौर्य अतुलनीय
यह है शौर्य अकल्पनीय
है यह शौर्य अविश्वसनीय !

वह  उर्जस्वी ! बेटा किसान का !
चला घर को उमंग में
झुलाये कन्धे पर इन्द्रधनुष .
 

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