Wednesday, September 15, 2010

कविता और बुढ़िया


इस चक्कर में
कि किसी दिन
एक ही बार
लिखूंगा कोई खूब अच्छी सी
जबरदस्त कविता
मैंने नहीं लिखने दी
खुद को
अनेक छोटी छोटी
अ- अच्छी कविताएं!!!!!

इस तरह अनेक भाव उमगे
और नष्ट हो गये !
मैं ,अमानुष ! पाखण्डी !
देखता रहा चुपचाप
इन भ्रूण हत्याओं को
यह सोच कर कि
भावों , संवेदना-वृत्तों का भी
होता है पुर्नजन्म
और अभिव्यक्ति की स्पृहा को त्याग
जब मन में दम तोड़ता है कोई अनभिव्यक्त भाव
तो नष्ट होने के बजाय वह प्रवृत्त होता है
अपने परिष्कृत विकास के नये आयाम में !!!!

इसलिये ही
हर शाम
मैं सड़क नहीं
गली वाले रास्ते से
पैदल ही जाता रहा अस्सी घाट
क्योंकि गली के मुहाने वाली लकड़ी की गुमटी में
कोई चाय पान की दुकान नहीं
बल्कि रहती है
चार पांच बरसात झेल चुकी
बगईचा अगोरने के लिए लगाई गयी
पुआल की मढ़ई-सी जर्जर बुढि़या !

चूंकि बुढि़या जीवित है !
और जिन्दा रहने पर खाने को कुछ चाहिये
सो बुढ़िया रोज शाम को
चार फुट की गुमटी के ठीक बाहर
(सौभाग्यवश) आठ फुट की इस व्यस्त गली में
अपने छोटे से हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त हुये स्टॊव
पर रोटियां पकाती है !
बाहर ही , शाम को भी, नहाती है ,
फिर खुद को
और कुछ अधूरे स्वप्नों सी
उन पकी अधपकी रोटियों को लेकर
वापस अपनी गुमटी में लौट जाती है ,
शायद इस दुनियां से बहुत दूर !

मैं बगल में ,
किसी दुकान पर बैठा
यह सब देखता हूं
और बस देखता हूं !
कुछ सोचता नहीं हूं
हर रोज बस थोड़ा और
आक्रान्त व
कुण्ठित होता हूं !

अनेक भाव उफनते हैं
उमगते हैं
कई नपुंसक आक्रोश व
कुष्ठ रोगी संवेदनाएं
जिनसे बड़ी अच्छी कविता बन सकती है ,
कविता बन जाने को
चिचियाते , घिघियाते हैं
लेकिन
कलम खुट्ट खुट्ट करता , टॆबल पर चुपचाप
बहुत देर तक
मैं कुछ सोचता बैठा रहता हूं
तब तक
न जाने कब
पन्नों की पक्तियों में
उभर आती हैं
साईकिल के हवा निकले ट्य़ुब जैसे
रोटी बेलते हाथों की झुरियां
और मैं चुपचाप
बिना कुछ लिखे
कापी बन्द कर उठ जाता हूं !

10 comments:

  1. "There is always a seperation between the man who suffers and the artist who creates ; and the greater the artist the greater the seperation." टी० एस० एलिअट ने कहा था .
    "कई नपुंसक आक्रोश व
    कुष्ठ रोगी संवेदनाएं---- कविता बन जाने को
    चिचियाते , घिघियाते हैं " artist आर्जव और sufferer आर्जव का अलगाव बखूबी रेखांकित किया है. बधाई .
    लंबे अंतराल के बाद धमाकेदार वापसी पर स्वागत है.

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  2. उफ!!

    आपने तो लगता है कलम तोड दी है.

    सार्थक प्रभाव दे रही है ये कविता

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  3. अनेक भाव उफनते हैं
    उमगते हैं
    कई नपुंसक आक्रोश व
    कुष्ठ रोगी संवेदनाएं
    जिनसे बड़ी अच्छी कविता बन सकती है ,
    कविता बन जाने को
    चिचियाते , घिघियाते हैं

    ओह बहुत गज़ब की अभिव्यक्ति

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  4. आप की रचना 17 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

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  5. चर्चा मंच से आया -अगली कविता प्रतीक्षित है !

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  6. अभिषेक जी....बेहतरीन भावाभिव्यक्ति| बहत ही सुन्दर कविता|
    यहाँ पर पहुँचाने के लिए ....अनामिका जी आपको बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूँगा|
    ब्रह्माण्ड

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  7. abhishek , is pidhi ko likhte dekhti hun to man ko sukun milta hai . Hindi to aaj ka yuva varg jaanta hi nahin, aise mein koi achchhi kavita padhne ko mil jaaye to bahut khushi hoti hai.
    Anamika ji ek achchhe blog se parichit karane ke liye aabhar!

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  8. अनेक भाव उफनते हैं
    उमगते हैं
    कई नपुंसक आक्रोश व
    कुष्ठ रोगी संवेदनाएं
    जिनसे बड़ी अच्छी कविता बन सकती है ,

    -जबरदस्त!! वाह!

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  9. कई नपुंसक आक्रोश व
    कुष्ठ रोगी संवेदनाएं मिलकर
    दहकाती हैं आग
    इनमें तपकर
    कुंदन सा चमकता है कवि
    और लिखता है..
    ह्रदय परिवर्तित कर देने वाली
    एक कविता।

    निरर्थक नहीं होता
    बैठना
    यहाँ-वहाँ
    जब हो
    गहरी
    संवेदना।
    ....बधाई।

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