Saturday, May 29, 2010

निःशब्द


चलती हवा में

झूमते पेड़ की खुशी का गीत

मुझॆ पढ़ने नहीं आता !


तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! !


बसन्ती बयार में

मचलती चिड़िया की चहकन

मुझे लिखने नहीं आती !


तुम्हारी हंसी भी कहां लिख पाता हूं ! ! !


पहली फुहार में

तर बतर भीजतें पलाश की बूंद बूंद खुशी

मुझे समझ नहीं आती !


तुम्हारी निःशब्द मुस्कुराहटे भी कहां समझ पाता हूं ! ! !


ठिठुरती रात के बाद

जवान हुयी ताजा धूप का अल्हड़पन

मुझे पीने नहीं आता !


तुम्हें आंख भर देख कुछ बोल कहां पाता हूं ! ! !

9 comments:

  1. तुम्हारी निःशब्द मुस्कुराहटे भी कहां समझ पाता हूं ! ! !
    पर यह कला तो विकसित करनी ही होगी
    सुन्दर रचना एहसास की

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  2. मेरे नए ब्‍लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्‍ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।

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  3. अरे वाह जी बहुत सुंदर जबाब नही

    धन्यवाद

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  4. बहुत सुन्दर !

    तुम्हें आंख भर देख कुछ बोल कहां पाता हूं ! ! ! ................ क्या बात है !

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  5. ’गिरा अनयन नयन बिनु बानी’...! बोल कैसे पाओगे प्यारे !
    निःशब्दता जरूरी सी चीज है इस वक्त !

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