Sunday, November 15, 2009

प्रेम गीत


सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत !

लिखूं सांझ की उतरती उदास धूप में
पीली रोशनी के वलय-सा जगमगाता कनेर !


लिखूं भॊर की पहली किरन को
रंगों के गीत पढ़ाता जवांकुसुम !

लिखूं निशा- वियोग- व्याकुल, वृन्त-प्रछ्न्न
उषा के नासापुटों का गन्धमादक श्वेत नारंगी पारिजात !

लिखूं दूब की पलकों पर रजत स्वप्निल तुहिन कन देख
शिशिरागमन संदेश प्रमुदित आम की चमकीली नयी कोपल !

सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत !
लिखूं चिड़िया !
लिखूं तितली !
लिखूं हवा !
और
फिर
धूप ! ! !

12 comments:

  1. जरूर लिखिये
    लिखिये सम्वेदनाओ की आहट

    लिखिये जिन्दगी की अकुलाहट

    प्रेम गीत लिखिये

    मनमीत लिखिये

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  2. लिखूं चिडिया तितली हवा ..लिखूं प्रेम गीत ...
    निहायत खूबसूरत शब्दों का प्रयोग ..!!

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  3. लिखिये भाई!!!

    वैसे अच्छा लिख गये!!

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  4. आर्जव, मैं मंत्रमुग्ध हूँ शब्दों के ऐसे प्रयोग पर।
    सुबह हसीन हो ग्ई। वाह !
    चलताऊ टिप्पणियों के चक्कर में न पड़ना, रचते रहना।
    अपने शब्दों को असुविधा वाले स्थानों पर भी भटकने दो। मुझे यकीं है कि बहुत उम्दा अक्षर उभरेंगे।

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  5. अच्छी कविता ...
    प्रेम गीत और शेष सृष्टी का व्यापर भी ...
    आभार ... ...

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  6. सुन्दर शब्द सुन्दर भाव ..बहुत पसंद आई यह रचना ..लिखते रहे शुक्रिया

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  7. सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत !
    लिखूं चिड़िया !
    लिखूं तितली !
    लिखूं हवा !
    और
    फिर
    धूप ! ! !

    बहुत खूब ...आप लिखिए तो सही हम आते रहेगे पढने ....!!

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  8. waah saara blog padh kar aisa laga ki real mein kuch padha hai.........ONU

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  9. मैंने समझा था कि तुम लिख ही नहीं रहे इस वक्त । तुम्हारी आदत भी तो है ऐसी । छुपा-छुपी !

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  10. और
    फिर
    धूप ! ! !
    अन्त मे धुप जरुरी थी. बहुत सुन्दर.

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  11. शिल्प का मदमाता सौन्दर्य इस कविता में आर्य आर्जव सुन्दरतम है..!!!

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