Sunday, February 1, 2009

श्रद्धा और अहंकार

श्रद्धा और
अहंकार ।

एक नहीं है तो
दूसरा
होगा ही होगा ।

बच नहीं सकते तुम
कोई और रास्ता नहीं हैं ।

एक
मूंद सब द्वार ,
सड़ाकर
गला देता है !


एक
तोड़ सब बन्ध,
पिघला कर
बहा देती है !

बच नहीं सकते तुम
कोई और रास्ता नहीं हैं !

6 comments:

  1. अच्छा लिखा है। बधाई।

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  2. सुनो, तुम बहुत अच्छा लिखते हो.....कम लोग हैं जो ऐसा लिख पाते हैं....लिखते रहो निरंतर बिना किसी बात की परवाह किए.

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  3. कविता है या ब्रह्माण्ड!

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  4. बहुत सुंदर विचार....बुहत अच्‍छा लिखा..;

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  5. सुनो, प्रताप जी की बात ध्यान से सुनो.
    अच्छा लिखा.

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