Sunday, January 11, 2009

हर रोज

हर रोज
सूरज ही नहीं ,
मैं भी
उगता
और डूबता हूँ .

हर रोज
चाँद ही नहीं ,
मैं भी
पिघलता
और बिखरता हूँ .

हर रोज
साँझ की नीली परी ही नहीं ,
मैं भी
धीरे धीरे उतरता ,
उदास होता हूँ.


हर रोज
धुधलके में जुगनू ही नहीं,
मैं भी
जलता
और बुझता हूँ


हर रोज
रात में वो पेंड़ ही नही
मैं भी
अंधेरे की धुन पर दर्द सा
बजता हूँ ।


हर रोज
घने कुहरे में सुनसान सड़क की वो पीली बत्ती ही नहीं
मैं भी
(तुम्हारी) स्मृतियों की भींगी सफेद पीली उजास में
स्तब्ध हो उठता हूँ।


हर रोज !





5 comments:

  1. उम्दा रचना . लिखते रहिये .

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  2. बहुत सुंदर, और विचारणीय भी.

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  3. आर्जव अच्छा लिखते हो। मेरे ब्लाग पर हायकु के लिये टिप्पणी के लिये धन्यवाद। मैं तुमसे सहमत हूँ।

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  4. खाम्खाव्ह ही सही...... पर अपनी कविता याद आ गयी.....

    ये अस्त होता सूरज
    सुना जाता है अपनी दास्ताँ
    भोर को जल देकर स्वागत
    करने वाली दुनिया
    शाम तलक तो इनको भी थका देती है
    इनकी प्रचंडता को विराम लगा देती है
    मेटा देती है इनका वजूद
    और मेरा तो वजूद ही क्या ?
    ख़ुद क्यों नहीं थकती
    ख़ुद क्यों नहीं रूकती
    ये दुनिया
    इसी मायावी दुनिया में रह कर जी रहे हैं हम
    हम तो श्याद सूरज से भी ज्यादा
    प्रचंड है
    पर ढीठ भी सूरज से jyada

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