Tuesday, December 30, 2008

चलो ! अच्छा हुआ

चलो अच्छा हुआ कि
तुम्हें भी कोइ और
मिल गया !
प्रतिशोध मुझसे जो था तुम्हारा
चुक गया !

विचरते मेरे दंभ के पठारों में
खो चुके जो स्वप्न थे सब तुम्हारे ,
उनको फिर से इक नया जहां मिल गया !

कैद मेरे स्वार्थ -सींकचों में
सन्त्रस्त भाव- विहग जो थे सब तुम्हारे
उनकों इक नया व्योम नीला मिल गया !

अपने को न जाने क्या समझते
एक झगड़ालू ,इर्ष्यालू और अहंकारी के
चंगुल से पूर्णतः मुक्त हुई तुम!
चलो !
अच्छा हुआ ,तुम्हें भी कोई और मिल गया !


3 comments:

  1. नये साल के लिए बधाइयाँ स्वीकारें!

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  2. क्या कह रहे हो अभिषेक, जो मुक्ति तुम इंगित कर रहे हो क्या वह चैन से रहने देती है . नहीं.

    नव वर्ष की शुभकामनायें.

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  3. नव वर्ष मंगल मय हो
    आपका सहित्य सृजन खूब पल्लिवित हो
    प्रदीप मानोरिया
    09425132060

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