Tuesday, July 2, 2013

दृश्य २





दोपहर तीन बजे .
सब सन्नाटा है . सब .
सूरज आज अलसा गया . सुबह तो सुबह , रोज की तरह, आज इस असहाय अपरान्ह में भी  पहाड़ों की गली घूमने नहीं आया. लगता है एकाक  बदमाश पेड़ों से उसकी कुछ अनबन हुयी है . कल दोपहर भी बस कुछ पीले पलॊं के लिये ही आया था , चुपचाप सा.
इसलिए सब ओर सन्नाटा है .
बरसात के इस मौसम में बूंदों के ब्रश से नया गाढ़ा हरा रंग , सफेद टुकड़े टुकड़े बादलों की बल्टी से बोर बोर ,  घाटी के नंगे बदन पर पोता गया है ! घाटी में हरा सा नयापन है और नया सा हरापन है .  इस बीच बादलॊं के कुछ खरगोशी टुकड़े अपनी कारस्तानी में मग्न हैं . आईस पाईस खेल रहें हैं शायद . एक इस पहाड़ बाबा की पीठ पर पसरा हुआ इतरा रहा है तो दूसरा उस तगड़े चाचा की गरदन पकड़ कर लटका हुआ है ! उधर दूसरी तरफ आठ दस टुकड़ॊं का एक झुण्ड रेलगाड़ी रेलगाड़ी खेल रहा है ! वे एक दूसरे के पीछे पीछे एकदम शान्ति से अच्छे बच्चों की तरह चले जा रहे हैं. मानॊ सड़क पार कर रहें हो !
लेकिन यह सब कुछ एकदम सन्नाटे में हो रहा है ! निविड़ सन्नाटे के प्रांगड़ में .  वस्तुतः घाटी में पेड़ , बादलों के खरगोशी टुकड़े, पेड़ , पेड़ों का हरापन , पहाड़, पहाड़ॊं का पुरानापन....... सब सन्नाटे की ही सांस लेते हैं , हवाओं की नहीं.   

4 comments:

  1. पंछियों ने कुछ तो कहा होगा! सुना नहीं शायद, देखने की मस्ती होती ही ऐसी है।
    ..सुंदर चित्र।

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    1. ऐसी बात नहीं है .....यहां चिड़िया बहुत कम है , बहुत ही कम .....लगभग नहीं ही हैं .... सब खा ली गयी है .....जो बची हैं वो घने जंगलों में हैं ! इसलिये कोई चिड़िया कुछ कह नहीं पायी ! :)

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