Wednesday, March 24, 2010

जानता हूँ पर .......

जानता हूं
यह रास्ता कहीं नहीं जाता
फिर भी चल रहा हूं ।
जानता हूं
आगे कुछ नहीं है
फिर भी इसी पर
ढल रहा हूं ।

है अस्वीकार का साहस ।
प्रतिरोध की शक्ति है ।

जानता हूं हासिल हर जोड़ का
शून्य है
फिर भी
स्वयं को कर
एक विलम्बित मौन-सा
इस ही राह पर
बिछ रहा हूं………..

जानता हूं पर चल रहा हूं ………

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना । आभार

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  2. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. सच...आप बहुत कुछ जानते हैं....
    तब तो पहेलियाँ भी जानते होंगे?
    ...........................
    विलुप्त होती... .....नानी-दादी की पहेलियाँ.........परिणाम..... ( लड्डू बोलता है....इंजीनियर के दिल से....)
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html

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  4. इस ढींठ मुद्रा के कारण क्या हैं आर्य ?
    केहि कारन ?

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  5. बहुत बढ़िया..चलते रहो. बढ़िया कविता.

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  6. जानता हूं हासिल हर जोड़ का
    शून्य है
    पर शून्य से चलकर शून्य तक पहुँचने के बीच सभी संख्याएँ हैं
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  7. अनजाने रास्ते पर चलना तो वीरता है मगर जान बूझकर वह मार्ग चुनना जो कहीं नहीं जाता.. सिर्फ भावुकता है और यह जीवन यथार्थ की धरातल पर ही टिका रह सकता है।

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