आर्जव
Thursday, November 22, 2018

मठाधीशी की कला

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जरूरी नहीं कि हृदय में ईश्वर का प्रकाश ही आपको व्यावहारिक तौर पर स्थिर, गंभीर, आत्मप्रवृत्त बनाता हो। अपने चित्त के घामड़पन, अपनी कुटिलता की ...
Saturday, November 3, 2018

पहले जैसे

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पत्नी नौकरी फ्लैट कार प्रमोशन के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा आफिस की तक झक नहीं हो रही सेविंग से लेकर कई दिनों से छूट जा रही जिम और समय न...

सपना

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अक्सर जब कोई सपना सच हो कर आंखों के सम्मुख आता है  आंखें उन्हें चीन्ह नहीं पाती हैं !  आखों के अधूरेपन में सपना सपना ही रह जाता है ! ...
Sunday, October 28, 2018

मच्छरात्मकता

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शान्ति से आलआऊट पीकर दीवार पर बैठे मच्छर को ऊंगली से कोंच कर मार दिया मैंने ! समझ नहीं आता क्या ठीक किया मैंने ! __________________ #क...
Monday, October 8, 2018

दो कविताएं

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दो कविताओं के लिखे जाने के बीच का समय अब बढ़ गया है जीवन ये ही है इस वाक्य के बाद चिह्न कौन सा खड़ा करू ? विस्मयादिबोधक ? प्रश्नवाचक ? पू...
1 comment:
Sunday, September 23, 2018

परिपूर्ण

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मैं गढ़ू कुछ ऐसी कविताएं जो खुद में पूरी हों बिना किसी पाठक के बिना दुबारा पढ़े गये
Saturday, September 15, 2018

चार्ल्स बडलेयर की पांच कविताएं

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 ( नवोत्पल   पर प्रकाशित इन पांच भावानुवादित कविताओं को अपने ब्लाग पर भी टांग लेने की सोची ! ) चार्ल्स बडलयर उन्नीसवीं सदी ...
2 comments:
Wednesday, September 12, 2018

एक नुकीला तिरछा सा कांच

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#ध्यान कविता बाहरी लोग, दुनियां, तमाम बातें, अधूरी इच्छाऎं , बिछड़े हुये लोग, लौट न सकें जहां वापस वो छूट चुके घर ! सब धंसे रहत...
Monday, June 11, 2018

शाम और किताब

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शाम को जब मैं पढ़ता हूं अपनी टेबल खिड़की के पास रखता हूं ! पढ़ी जा रही किताब से हो रही बातचीत के दरम्यान बीच बीच में ढल रही नीली शाम...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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