Sunday, September 23, 2018
परिपूर्ण
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मैं गढ़ू कुछ ऐसी कविताएं जो खुद में पूरी हों बिना किसी पाठक के बिना दुबारा पढ़े गये
Saturday, September 15, 2018
चार्ल्स बडलेयर की पांच कविताएं
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( नवोत्पल पर प्रकाशित इन पांच भावानुवादित कविताओं को अपने ब्लाग पर भी टांग लेने की सोची ! ) चार्ल्स बडलयर उन्नीसवीं सदी ...
2 comments:
Wednesday, September 12, 2018
एक नुकीला तिरछा सा कांच
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#ध्यान कविता बाहरी लोग, दुनियां, तमाम बातें, अधूरी इच्छाऎं , बिछड़े हुये लोग, लौट न सकें जहां वापस वो छूट चुके घर ! सब धंसे रहत...
Monday, June 11, 2018
शाम और किताब
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शाम को जब मैं पढ़ता हूं अपनी टेबल खिड़की के पास रखता हूं ! पढ़ी जा रही किताब से हो रही बातचीत के दरम्यान बीच बीच में ढल रही नीली शाम...
Friday, May 25, 2018
नींद और दुख
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शाम से ही कोई गहरा दुख उस पर फैल सा गया था ! ऐसा कुछ हुआ नहीं था बुरा अभी बस कोई पुरानी बात किसी बात का सिरा पकड़ ऊपर आ गयी थी ! आज देर...
Monday, May 21, 2018
तलाश
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कविता नये दुखों की तलाश है !
Sunday, May 20, 2018
तनख़्वाह
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अगले महीने की तनख़्वाह जोहते हम भूल जाते हैं अक्सर कि अगले महीने की तनख़्वाह के साथ कम हो जाएँगे हमारी ज़...
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