Wednesday, September 12, 2018
एक नुकीला तिरछा सा कांच
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#ध्यान कविता बाहरी लोग, दुनियां, तमाम बातें, अधूरी इच्छाऎं , बिछड़े हुये लोग, लौट न सकें जहां वापस वो छूट चुके घर ! सब धंसे रहत...
Monday, June 11, 2018
शाम और किताब
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शाम को जब मैं पढ़ता हूं अपनी टेबल खिड़की के पास रखता हूं ! पढ़ी जा रही किताब से हो रही बातचीत के दरम्यान बीच बीच में ढल रही नीली शाम...
Friday, May 25, 2018
नींद और दुख
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शाम से ही कोई गहरा दुख उस पर फैल सा गया था ! ऐसा कुछ हुआ नहीं था बुरा अभी बस कोई पुरानी बात किसी बात का सिरा पकड़ ऊपर आ गयी थी ! आज देर...
Monday, May 21, 2018
तलाश
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कविता नये दुखों की तलाश है !
Sunday, May 20, 2018
तनख़्वाह
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अगले महीने की तनख़्वाह जोहते हम भूल जाते हैं अक्सर कि अगले महीने की तनख़्वाह के साथ कम हो जाएँगे हमारी ज़...
Monday, March 26, 2018
रेड पर रेड: फिल्म पर अपने विचार
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रेड से एक दृश्य , चित्र इंटरनेट से कल शाम अचानक प्लान बना और मै, अनु व् मित्र दुबे के साथ गुरुग्राम के पीवीआर सिटी सेंटर में र...
Friday, March 23, 2018
अपाहिज लोकतन्त्र
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यह देखकर आश्चर्य मिश्रित दुख होता है कि अनेक अच्छे खासे पढ़े लिखे तथाकथित “ वेल टू डू ” सज्जन भी राजनीति से सम्बन्धित ...
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