आर्जव
Sunday, February 11, 2018

समय के जाले

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#ध्यान कविता Paul Bond Fine Art मकड़ी जैसे निहारती है कभी कभी अपने बुने जाले के किनारे जा कर बाहर बिछी हवा की चट्टानें वैसे ही...
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Wednesday, November 22, 2017

जुड़ाव

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कुछ कविताएं दुख में लिखी जाएंगी उससे इतर किसी अन्य दुख में पढ़े जाने के लिए।

जो छूट गए

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जो छूट गए उन्हें जाने दो !
Tuesday, November 21, 2017

तमाचा

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गहरा सन्नाटा दूर तक बिखरी चुप्पी दुनिया की तमाम आवाजों के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
Wednesday, November 8, 2017

लोकतंत्र

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जिन्हें जवाब देना चाहिए वे प्रश्न पूछ रहे हैं। जिन्हें कटघरे में खड़ा होना चाहिए वे निर्णय लिख रहे हैं। जिन्हें चुप रहना चाहिए वे लगाता...
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Friday, November 3, 2017

हर रोज

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बहुत बेहतर है रोजमर्रा के कामों में इतना अधिक व्यस्त हो जाना हर रोज कि उनसे बात करने उन्हें याद करने की फ़ुरसत ही न हो जिनसे कभी प...

चाय पीते हुए

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अथाह विस्तृत यात्राओं में अपने अकेलेपन के साथ अकेले होना । चलती गाड़ी की खिड़की से सूदूर शांत क्षितिज तक ना। किसी खो चुके ईश्वर की य...
Saturday, October 28, 2017

धर्म और काव्य

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तथागत ! मिलोगे कभी फिर तो सुनूंगा मैं तुमसे​ तुम्हारी वह पुरानी कविता ... "जीवन दुख है." और फिर कहूंगा तुमसे कि इस छोटी ...
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Thursday, October 19, 2017

रेत

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कुछ रिश्ते रेत से होते हैं बिखर ही जाते हैं सम्हालते सम्हालते !
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Wednesday, October 18, 2017

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मैं गाऊं चिड़िया के कण्ठों से प्रकृति-उत्सव के​ अनहद गीत !
Monday, October 16, 2017

रोज की कहानी

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हम सब की रोजमर्रा की कहानी हम सब पर एक जिम्मेदारी होती है। उसे कह देना उससे निवृत्त हो लेना है।
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प्रेम-विवाह

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आज पूरी हुई हमारी बरसों पुरानी प्रेम कहानी (१) आज तुम्हारे किसिम किसिम के प्लाजो दुपट्टे कुर्ती फ्राक अंट गये मेरी हैंगर अलमारिय...
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Friday, October 13, 2017

अलल बलल

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मन: ज्यादा कविता लिखने से दिमाग कमजोर हो जाता है, कामन सेन्स चुक जाता है सच में ! अलल बलल कुछ भी छेरते रहना सृजन नहीं है। कहा है ...
Thursday, October 12, 2017

पिशाचिनी

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संसार भाषा है। भाषा माया है। भाषा ही भ्रम देती है बंधती है उसमें जो है ही  नहीं स्वयं के छद्म विवरण को विस्तार देती है संवाद का आभ...
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Sunday, October 8, 2017

फुग्गे जैसी

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जब हम किसी को देखते है आंखों​ से तो हम देखते हैं उसके हाथ पैर नाक आंख घुटने गरदन और इस बीच हम पूरी तरह भूल जाते हैं कि उसमें एक आत...
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Friday, October 6, 2017

इतिहास एक क्रम है

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इतिहास एक क्रम है एक गति है किसी समूह की काल सापेक्ष यात्रा का जबरदस्ती लिखा गया अभिलेख !  इस निर्वैयक्तिक विप्लवी प्रवाह में हमे...
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Thursday, October 5, 2017

लोकतंत्र का मुलजिम

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Click Image Source लोकतंत्र का असली मुलजिम पकड़ा गया खेत में हल जोतते ठेला पर लहसुन पियाज बेचते रिक्सा चलाते सीमेंट बालू जो...
Saturday, September 30, 2017

निरपेक्ष…..

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कभी कभी मन पर छायी उदासी इतनी गाढ़ी और पूरी होती है कि आसपास की दुनिया उसके दुख, उसके लोग उन लोगों से जुड़े दुःख, उनसे ऊपजे सुख ...
Thursday, September 28, 2017

High speed Mass rapid transit systems vs Poverty in India

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                                                                                From forbes.com          Many are of...
Sunday, September 24, 2017

प्रेत

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कोष्ठक में: यह कविता चार्ल्स बडलेयर की कविता "The Ghost" के पुनर्सृजन का प्रयास है. बडलेयर फ्रांस में उन्नीसवीं सदी के बड़े कव...
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Saturday, September 23, 2017

कोयले में घुस गयी कविता: पुराने दिनों की चुल्ल ! वर्ष 2010

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बहुत पहले कुछ हरे पेडों को खा गयीं थी चट्टानें ! पेड़ॊं की फिर से हरा होनें ,उगनें की जिजीविषा को, इच्छा को पीस पीस कर अपन...
Wednesday, September 20, 2017

दूसरा !

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हमें  एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना चाहिये  कि हम एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं. बिलकुल अलग थॊड़ी देर के लिए भी यह भूलना  खतरनाक ह...
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Monday, September 4, 2017

गन्तव्य

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बहुत सी यात्राएं हमें कहीं नहीं ले जाती।
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गतियां

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ऊंचा उठने के लिए ऊर्ध्वाधर चलना होता है।

बैकलाग

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कुछ लोग प्यार में भी बैकलाग रखते हैं! समय समय पर सुविधानुसार क्लीयर करते रहते हैं धीरे धीरे !
Tuesday, August 22, 2017

भ्रम

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पता ही नहीं है आदमी को कि उसे चाहिए क्या ?

असुर

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कुछ लोग अपने इसी जीवन के एक हिस्से में बन जाते हैं मानव से असुर, वैसे ही जैसे शास्त्रों में वर्णित हैं असुर बड़े बड़े दांतो वाले झ...
Monday, August 21, 2017

झूठी आशा

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कविता से नहीं होगा कोई समाज सुधार कोई क्रान्ति भी नहीं आयेगी न ही भरेगा किसी भूखे का पेट ! कविता बस सब कुछ ठीक हो जाने की झूठी आशा ...

हे डीयर प्रभू !

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From web हे डीयर प्रभू ! कवि न बनने देना ऐसा कि अपनी रचनाएं पूरी होने से पहले ही,  लपालप मित्रों-मित्र...
Sunday, August 20, 2017

घने जगंलों में

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घने जगंलों में मैं बहुत दूर निकल आया था । बहुत दूर । जगंलों के भीतर बहुत भीतर बेतरतीब बिखरे खोये हुये उन रास्तों के पार जिन...

जापान और हम

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कला संकाय के किले में शाम को कक्षाएं चलती थी जापनीज़ की।   चार बजे शुरू हो कर छह बजे तक। आकियो सर जो कि टोक्यो निवासी थे, हमें कांजी कतकना...

आज की सांझ

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पिघले सोने की भट्टी डूब खो गयी स्याह नीलाभ घाटी के गर्भ में, आज की सांझ।
Thursday, August 17, 2017

कुछ शब्द

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ढूंढता हूं कुछ शब्द छुपा सकें जो गहरे मेरे सन्नाटों को ! रच सकें जो ऐसी कोख जिसमें दफ्न हो सकूं मैं ! कह सकें वे वह कुछ जो कहा ...
Sunday, July 30, 2017

आजकल

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हर तरफ धूल है धुँआ है गुबार है। गर्द इतिहास की चुभ रही है पलकों में। वर्तमान का पानी धुले स्पष्ट कर दे सब गर्द हालाकिं वह खुद...
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Saturday, July 1, 2017

फोन

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चलो . . . ! ! ! थोड़ी देर . . . साथ रहें ! एक दूसरे को फोन करें  और...  हैलो भी ना बोलें । बहुत देर तक चुप रहें . . . और बिना  कुछ ...
Monday, June 20, 2016

भींगी घरती पहली बरखा!

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भींगी धरती पहली बरखा, गीले पेड़ गीले पात नीला अम्बर हुआ बादली, तपती पछुआ हुयी सुरीली, मस्त मेढ़कों की ...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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