आर्जव
Thursday, April 30, 2015

कविता में

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जब दुनिया गर्म हो चुकी होगी बहुत तब भी थोड़ी ठण्डक बची रहेगी कविता में। जब ऊपर नीचे चहुंदिश होगी ध्वनि ही ध्वनि जीवन के एकमात्र नि...
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Monday, April 27, 2015

शान्त सतह

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ऊपर की शान्त सतह से कहाँ पता चलता है क्या क्या कुछ है गहरे अन्तर ! देखो तो.. धरती.. सागर.. पेड़.. पहाड़ और खुद तुम ही देखो तो...
Thursday, April 23, 2015

किसान के बारे में बिलकुल नहीं

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हर संवेदना के अपने भगवान होते हैं दरी के नीचे अखबार से काटकर छुपाए हुए भगवान ! घुस आते हैं जो संवेदक की सहस्र वर्ष ...
Wednesday, April 22, 2015

अन्ततः

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मैं जानता हूँ  रह जाऊँगा अकेले किसी रात जैसे  सबसे अन्त में बचा रह गया  कोई पानी का छर्रा  छहर छहर हुई बारिश बाद।  पता है मुझे  टूटन...
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Monday, February 2, 2015

हिन्दी

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ध्वनि ,शब्द और अर्थ से परे बस एक भाषा ही नहीं हिन्दी ! तुम एक जागृत संवेदना वृत्त हो , अभिव्यक्ति के नवीन सोपानों में हम...
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Sunday, December 21, 2014

एक सपना

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कल रात भोर में एक सपना आया मुझे. मैंने देखा कि मैं एक ऐसे जंगल में खॊ गया हूं जहां सिर्फ बड़े बड़े विद्वान, बुध्दिवीर रहते हैं। अलग अलग ...
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Monday, December 15, 2014

विजय

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अपनी बर्बर विजय का खौफ अब खुद नहीं सह पाता हूं मैं। इसलिए जीत जाने देता हूँ दूसरे को बड़ी आसानी से।
Tuesday, December 2, 2014

पूर्णता

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कभी कभी साकार होने के लिए टूटना पड़ता है कुछ सपनों को।
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Friday, October 31, 2014

मैं तुम्हारे प्रेम में हूँ।

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अवनि के आभामण्डल से हजारों प्रकाश वर्ष दूर गहन अन्तरिक्ष में जो नीला अंधेरा है वही तुम्हारा रंग है । विस्तृत अज्ञात नामहीन शब्दरहित अ...
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Monday, October 27, 2014

नेह मधु

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तुम्हारी स्मृतियां भी पहाड़ी मधु-तितली के छत्ते जैसी हैं जिसे वे छोड़ गई हों, मन के शान्त एकाकी वन- गह्वरों में , इन छत्तों को अब भी जब भी ...
Sunday, October 26, 2014

ठहराव

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पाकर तुम्हें फिर से यूँ लगा कि दुनिया खत्म हो गई।
Tuesday, October 14, 2014

विचारधाराएँ

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कर देती हैं पंगु संवेदनाओं को मेरे भीतर के आदमी को मेरे कवि को , विचारधाराएँ गठिया  रोग हैं।  
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Sunday, October 12, 2014

नींव

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मकान की ही नहीं रिश्तों की भी होती है नींव रिश्ते कभी उनसे आजाद नहीं हो पाते
Saturday, October 11, 2014

पहला दिन

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आज धूप थोड़ी नर्म थी सहमी हुई सी पुरानी यादों में खोयी हुई सी आज जाड़े का पहला दिन था
Friday, October 3, 2014

अकेले ही

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चलूँगा मैं अकेले ही सूर्य की ओर।
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अन्त

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बुरा नहीं है इतना भी दफ्न हो जाना साथ अधूरे सपनों के ।
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Friday, May 30, 2014

डिलीवरी

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जिसकी देह का हिस्सा वह पैर था वह एक लड़का था, लगभग पन्द्रह सोलह साल का. यूपीएस का एक बड़ा कारटून उतारते वक्त उसका पैर मुड़ गया था. वह दुक...
Sunday, May 4, 2014

ओ ! मेरे अमृत !

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( यह कविता मेरे सहकर्मी श्री निर्दोष बोरकर की एक अंग्रेजी कविता की पुर्नरचना है. ) उस अद्भुत अनुक्षण के अन्तहीन विस्तार में अपने...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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