आर्जव
Monday, July 8, 2013

मिथक : थोड़ी बातचीत

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(I)मिथक: मौजूद यथार्थ से एक अनुरूप (a model from existing reality) पारम्परिक वेश में योद्धा पारम्परिक नागा रसोईघर में पिछल...
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Tuesday, July 2, 2013

दृश्य २

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दोपहर तीन बजे . सब सन्नाटा है . सब . सूरज आज अलसा गया . सुबह तो सुबह , रोज की तरह, आज इस असहाय अपरान्ह में भी   पहाड़ों की ...
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Sunday, June 23, 2013

सोच (२)

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सब कुछ स्वयं में ही विरोधाभासी है । जो है, उसी में उसका विरोध है , विपरीत है । सच में झूठ है, झूठ में सच है , मौत में जीवन है , जीवन म...
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Monday, June 10, 2013

सुन तो लो , दीर्घापांग !

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दीर्घापांग* ! जाने दो , गया , जो गया अब क्या लेना उससे ! ढ़ूढ लो तुम कण्व आश्रम में नये पते , नये वृन्त , नये पुष्प ! बस जब...
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Monday, May 27, 2013

पत्तों पर ओस

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अनाम दिन किसी शाम छोड़ आये जो तुम उस अजान पेड़ से बतियाने में भूलकर उसपर थोड़ा सा गौरैया के छोटे बच्चे सा प्यार वह प्यार के दो चमक...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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