आर्जव
Tuesday, March 22, 2011

समय बच गया था

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समय बच गया था, अनवरत गुजरते हुये हर द्वार पर से बिना प्रतीक्षा किये किसी की भी कुछ की भी ! अहर्निश गतिशील रहते हुये भी समय बच गया था धुले ...
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Friday, February 4, 2011

अनुपस्थिति (२)

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कमरा सब तरफ से बन्द था फिर भी न  जाने  कहां  से ठण्डी   हवा    आती   रही ! नब्ज रोककर पूरा    बदन सिकोड़े हुये हर कतरा हवा का दूर फेंक आया...
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Thursday, January 27, 2011

अनुपस्थिति

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ढलते……उदास….दिन ! खाली साझें……सन्नाटा ! तेज चलती….रूखी…हवाएं ! बन्द गलियारों में बिखरे सूखॆ ,खड़खड़ाते पीले पत्ते ! कहीं ये तुम्हारी याद ...
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Wednesday, January 12, 2011

दुनिया चलती रहती है !

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यह दुनिया चलती रहती है ! चलती रहती है और चलती रहती है ! क्योंकि इस दुनियां में बहुत से अच्छे साफ दिल लोगों ने बड़े ...
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Wednesday, December 22, 2010

जाड़ !

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किसी   अन्जान , अर्थहीन दुख के आगोश में खामोश हरे पेड़ो ने छोड़ दिया   अपने अन्तर की उष्मा को संचित रखने का   अन्तिम आग्रह ...
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Wednesday, December 15, 2010

ज्वार

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ज्वार आया और चला गया ! तुम्हारे कुछ शब्दों के साथ किनारे रेत में अटका रह गया मैं ! धूल धूसरित पहचानहीन चुप !  
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Saturday, December 4, 2010

बनारस के ब्लागर्स ...

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अरविन्द जी के घर पर आज शाम को बनारस में एक छोटी सी ब्लागर्स मीट . फॊटो में एम वर्मा , आन्टी जी,  उत्तमा दीक्षित , मैं , देवेन्द्र पाण...
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Wednesday, November 24, 2010

अरे प्यारे भगवान जी !

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( जीवन , मृत्यु , प्रेम , संवेदनाएं , विचार इत्यादि ही कविता की मुख्य विषयवस्तु क्यों हॊ ? क्या ठोस   वैज्ञानिक तथ्य व प्रक्रियायें कविता क...
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Sunday, October 10, 2010

रीडर रिस्पान्स थियरी पर........

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चट्टानें बोलती हैं । (इसमें अर्थ न खोजें यह कविता नहीं है । ) जो गढ़ी गयीं मूर्ति बन गयीं मन्दिर में सज गयीं वे भी . जो तोड़ी गयीं ...
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Wednesday, October 6, 2010

थोड़ी देर ....

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चलो . . . ! ! ! थोड़ी देर . . . साथ रहें ! एक दूसरे को फोन करें  और...  हैलो भी ना बोलें । बहुत देर तक चुप रहें . . . और बिना  कुछ...
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Thursday, September 30, 2010

खाली समय में

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राम ! तुम घबराना नहीं, तनिक भी डरना नहीं ! तुम्हारी नियति का फैसला एकदम संवैधानिक होगा  ! सब कुछ साक्ष्य और धाराओं के सटीक सहयोग से उ...
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Friday, September 24, 2010

प्रतिध्वनि !

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तुम्हारी आवाज छोटे छॊटे अलग अलग असंबद्ध टुकड़ों में बहुत देर तक गिरती रही मेरे भीतर के किसी गहरे और गहरे कुएं में हां कुएं  में ...
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Sunday, September 19, 2010

वेश्यावृत्ति

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जीवन तो न जाने कब का चुक गया था फिर वहां मौत थी वही मौत ॒॒॒॒॒॒॒ न जाने क्यॊं चीजें पैदा हुयी थी न जाने क्यों...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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