आर्जव
Wednesday, December 22, 2010

जाड़ !

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किसी   अन्जान , अर्थहीन दुख के आगोश में खामोश हरे पेड़ो ने छोड़ दिया   अपने अन्तर की उष्मा को संचित रखने का   अन्तिम आग्रह ...
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Wednesday, December 15, 2010

ज्वार

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ज्वार आया और चला गया ! तुम्हारे कुछ शब्दों के साथ किनारे रेत में अटका रह गया मैं ! धूल धूसरित पहचानहीन चुप !  
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Saturday, December 4, 2010

बनारस के ब्लागर्स ...

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अरविन्द जी के घर पर आज शाम को बनारस में एक छोटी सी ब्लागर्स मीट . फॊटो में एम वर्मा , आन्टी जी,  उत्तमा दीक्षित , मैं , देवेन्द्र पाण...
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Wednesday, November 24, 2010

अरे प्यारे भगवान जी !

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( जीवन , मृत्यु , प्रेम , संवेदनाएं , विचार इत्यादि ही कविता की मुख्य विषयवस्तु क्यों हॊ ? क्या ठोस   वैज्ञानिक तथ्य व प्रक्रियायें कविता क...
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Sunday, October 10, 2010

रीडर रिस्पान्स थियरी पर........

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चट्टानें बोलती हैं । (इसमें अर्थ न खोजें यह कविता नहीं है । ) जो गढ़ी गयीं मूर्ति बन गयीं मन्दिर में सज गयीं वे भी . जो तोड़ी गयीं ...
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Wednesday, October 6, 2010

थोड़ी देर ....

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चलो . . . ! ! ! थोड़ी देर . . . साथ रहें ! एक दूसरे को फोन करें  और...  हैलो भी ना बोलें । बहुत देर तक चुप रहें . . . और बिना  कुछ...
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Thursday, September 30, 2010

खाली समय में

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राम ! तुम घबराना नहीं, तनिक भी डरना नहीं ! तुम्हारी नियति का फैसला एकदम संवैधानिक होगा  ! सब कुछ साक्ष्य और धाराओं के सटीक सहयोग से उ...
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Friday, September 24, 2010

प्रतिध्वनि !

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तुम्हारी आवाज छोटे छॊटे अलग अलग असंबद्ध टुकड़ों में बहुत देर तक गिरती रही मेरे भीतर के किसी गहरे और गहरे कुएं में हां कुएं  में ...
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Sunday, September 19, 2010

वेश्यावृत्ति

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जीवन तो न जाने कब का चुक गया था फिर वहां मौत थी वही मौत ॒॒॒॒॒॒॒ न जाने क्यॊं चीजें पैदा हुयी थी न जाने क्यों...
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Wednesday, September 15, 2010

कविता और बुढ़िया

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इस चक्कर में कि किसी दिन एक ही बार लिखूंगा कोई खूब अच्छी सी जबरदस्त कविता मैंने नहीं लिखने दी खुद को अनेक छोटी छोटी अ- अच्छी कविता...
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Sunday, July 4, 2010

वैजयंती

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कहॊ ! राग की यह वैजयन्ती तुम कहां से लहा लाये ? सजाये पलाश-पल्लव , गूंथ माला, फेर दी नेह विजड़ित मन मेरा , बन मुर्तिका , सज गया ! दूर हो मुझस...
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Saturday, June 12, 2010

फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !

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सोचा था चलेगें सिन्धु की थाह लेने नीली अतल गहराइयों की स्वयं पर एक छाप लेने । था स्वप्न चलेंगे एक बार निरखने विशद अनुभू...
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कविता के विरोध में

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भाव पंचर हो गये हैं ! मन न जाने क्यों अपना मसौदा कविता को देना नहीं चाहता है बहुत कुछ पास उसके कहने को , सुनाने को कवि...
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Saturday, May 29, 2010

निःशब्द

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चलती हवा में झूमते पेड़ की खुशी का गीत मुझॆ पढ़ने नहीं आता ! तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! ! बसन्ती बयार में म...
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Sunday, May 23, 2010

दूब

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बिना जिल्द की वह फटी पुरानी कापी, अपनी सब किताब की ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं जिस पर बीच बीच में थककर मैं कुछ नया लिखा करता ...
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Wednesday, May 19, 2010

निर्मोही

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तुम्हारे शब्दों में कुछ फूल हॊते हैं ! उन्हें छूकर मैं जाग जाता हूं ! जगाओगे नहीं मुझे ? निष्ठुर ! तुम्हा...
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Monday, April 12, 2010

प्रतीक्षा

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ताजे नए हरे पत्तों में , ,, खूब मल कर मुंह धोयी और भी चटकार गोरी हो ली जैसे ................ छोटे सफेद गमकते फूलों की लड़ियों से गढ़ी नीक न...
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Wednesday, March 24, 2010

जानता हूँ पर .......

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जानता हूं यह रास्ता कहीं नहीं जाता फिर भी चल रहा हूं । जानता हूं आगे कुछ नहीं है फिर भी इसी पर ढल रहा हूं । है अस्वीकार का साहस । प्रतिरोध क...
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Sunday, March 14, 2010

दिनों बाद .........

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चलूं आज दिनॊं बाद लिखूं कुछ ! कॊई कविता ! हेरूं मन को पुरूं गेहूं के टूण –सी छोटी गैरजरूरी बातों के टूटॆ धागे !...
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Wednesday, March 3, 2010

प्रेम दीक्षा

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शिशिर ! न मालूम था मुझे कि दिन दिन पल पल रव रव तुम्हारे दुलार के सान्द्र सोम में छका है पगा है डूबा , उतराया है ! यह आम्र वृक्ष ! न मालूम थ...
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Wednesday, February 24, 2010

केसरिया मन

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सोचता हूं सो जाऊं ! खो जाऊं ! बोझिल तन ! स्नेहिल मन ! निढाल सब छोड़ू ! मिट जाऊं ! लेकिन फिर ………. सांझ थोड़ी देर तक की तुम्हारी संगति याद आती ह...
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Saturday, February 13, 2010

प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -2

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प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -1 एक प्यार धीरे धीरे होता है । एकदम धीरे धीरे । जैसे रात भिगोये गये चने से धीरे धीरे निकलता है चने में मौजूद प...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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