आर्जव
Thursday, September 30, 2010

खाली समय में

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राम ! तुम घबराना नहीं, तनिक भी डरना नहीं ! तुम्हारी नियति का फैसला एकदम संवैधानिक होगा  ! सब कुछ साक्ष्य और धाराओं के सटीक सहयोग से उ...
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Friday, September 24, 2010

प्रतिध्वनि !

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तुम्हारी आवाज छोटे छॊटे अलग अलग असंबद्ध टुकड़ों में बहुत देर तक गिरती रही मेरे भीतर के किसी गहरे और गहरे कुएं में हां कुएं  में ...
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Sunday, September 19, 2010

वेश्यावृत्ति

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जीवन तो न जाने कब का चुक गया था फिर वहां मौत थी वही मौत ॒॒॒॒॒॒॒ न जाने क्यॊं चीजें पैदा हुयी थी न जाने क्यों...
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Wednesday, September 15, 2010

कविता और बुढ़िया

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इस चक्कर में कि किसी दिन एक ही बार लिखूंगा कोई खूब अच्छी सी जबरदस्त कविता मैंने नहीं लिखने दी खुद को अनेक छोटी छोटी अ- अच्छी कविता...
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Sunday, July 4, 2010

वैजयंती

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कहॊ ! राग की यह वैजयन्ती तुम कहां से लहा लाये ? सजाये पलाश-पल्लव , गूंथ माला, फेर दी नेह विजड़ित मन मेरा , बन मुर्तिका , सज गया ! दूर हो मुझस...
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Saturday, June 12, 2010

फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !

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सोचा था चलेगें सिन्धु की थाह लेने नीली अतल गहराइयों की स्वयं पर एक छाप लेने । था स्वप्न चलेंगे एक बार निरखने विशद अनुभू...
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कविता के विरोध में

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भाव पंचर हो गये हैं ! मन न जाने क्यों अपना मसौदा कविता को देना नहीं चाहता है बहुत कुछ पास उसके कहने को , सुनाने को कवि...
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Saturday, May 29, 2010

निःशब्द

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चलती हवा में झूमते पेड़ की खुशी का गीत मुझॆ पढ़ने नहीं आता ! तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! ! बसन्ती बयार में म...
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Sunday, May 23, 2010

दूब

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बिना जिल्द की वह फटी पुरानी कापी, अपनी सब किताब की ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं जिस पर बीच बीच में थककर मैं कुछ नया लिखा करता ...
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Wednesday, May 19, 2010

निर्मोही

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तुम्हारे शब्दों में कुछ फूल हॊते हैं ! उन्हें छूकर मैं जाग जाता हूं ! जगाओगे नहीं मुझे ? निष्ठुर ! तुम्हा...
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Monday, April 12, 2010

प्रतीक्षा

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ताजे नए हरे पत्तों में , ,, खूब मल कर मुंह धोयी और भी चटकार गोरी हो ली जैसे ................ छोटे सफेद गमकते फूलों की लड़ियों से गढ़ी नीक न...
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Wednesday, March 24, 2010

जानता हूँ पर .......

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जानता हूं यह रास्ता कहीं नहीं जाता फिर भी चल रहा हूं । जानता हूं आगे कुछ नहीं है फिर भी इसी पर ढल रहा हूं । है अस्वीकार का साहस । प्रतिरोध क...
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Sunday, March 14, 2010

दिनों बाद .........

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चलूं आज दिनॊं बाद लिखूं कुछ ! कॊई कविता ! हेरूं मन को पुरूं गेहूं के टूण –सी छोटी गैरजरूरी बातों के टूटॆ धागे !...
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Wednesday, March 3, 2010

प्रेम दीक्षा

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शिशिर ! न मालूम था मुझे कि दिन दिन पल पल रव रव तुम्हारे दुलार के सान्द्र सोम में छका है पगा है डूबा , उतराया है ! यह आम्र वृक्ष ! न मालूम थ...
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Wednesday, February 24, 2010

केसरिया मन

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सोचता हूं सो जाऊं ! खो जाऊं ! बोझिल तन ! स्नेहिल मन ! निढाल सब छोड़ू ! मिट जाऊं ! लेकिन फिर ………. सांझ थोड़ी देर तक की तुम्हारी संगति याद आती ह...
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Saturday, February 13, 2010

प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -2

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प्यार : एक डायाक्रोनिक स्टडी -1 एक प्यार धीरे धीरे होता है । एकदम धीरे धीरे । जैसे रात भिगोये गये चने से धीरे धीरे निकलता है चने में मौजूद प...
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Thursday, January 28, 2010

प्यार: एक डायाक्रोनिक स्टडी-1

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प्यार तरह तरह के होते हैं । किसी बीते हुये प्यार को याद करना , पुनः प्यार से भर उठना एक अलग प्यार है । किसी चल रहे प्यार को सोच कर धीरे से म...
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Sunday, January 10, 2010

बात

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गर्म टहकार, कुनकुनी पीली , चमकीली उत्फुल्ल, धूप सिर्फ धूप नहीं है । दरसल वह एक बात है । बात – जो सूरज धरती से किया करता है । रो...
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Sunday, January 3, 2010

सब कुछ शेयर कर लेता हूँ !

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कलिंग युद्ध क्षेत्र पर छिड़ा घमासान अभी धीरे धीरे शान्त हो रहा है । वहां बहुत कुछ लिया गया और बहुत कुछ दिया गया । इन सब के बीच बहुत कुछ...
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Friday, January 1, 2010

सन्नाटा

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अलग होते मुझ के साथ बहुत दूर तक टूटा नहीं तुम्हारी पुकार का स्वर ! ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, दूर निकल आये मुझ के साथ उस स्वर के पी...
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Wednesday, December 23, 2009

अभी तो .......

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अभी तो व्यथा के श्रृंगों का आयतन वर्तनी की आकृतियॊं में नापता हूं ! ! ! भावना के पारावार में खो जायेगें दुख भी जब तुम्हारे स्मरण की विस्मृत ...
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Saturday, December 12, 2009

पुरस्कृत

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भाव जो मन में रहे , कभी शब्द न बने , वृंत पर पुष्प -से खिले , साँझ झरे नही, अपने ही सौरभ में लीन हो गए....... उन्हें भी जान लिया तुमने , हतप...
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Friday, November 27, 2009

शब्द यदि झुक गए !

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शब्द जब बध गये छन्द में तो “घनत्व” कैसे करेंगे वहन ? शब्द जब ढल गये छन्द में तो झेलेगे कैसे अपने अर्थों की गुह्य अंतःक्रियायें ? शब्द जब झुक...
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Tuesday, November 24, 2009

फिर से

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तब तक एक पुरानी कविता फिर से पढ़ ले ! क्योकि समय कुछ शब्दों के अर्थ बदल देता है........ कविता की खोज में
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Thursday, November 19, 2009

अ अस्वीकार

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मैंने जाना कि वह करना, उसमें होना, गलत है । मैंने उसका निषेध किया । खुद को उसकी तरफ बहने से रोका । उसके प्रति भीतर अपने वह स्वभाव रचा जो अनु...
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Sunday, November 15, 2009

प्रेम गीत

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सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत ! लिखूं सांझ की उतरती उदास धूप में पीली रोशनी के वलय-सा जगमगाता कनेर ! लिखूं भॊर की पहली किरन को रंगों ...
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Thursday, November 12, 2009

मै बस देखूगा !

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बस, हतप्रभ अकिंचन मैं देखूंगा , चुप ! विस्मित ! तुम हंसो ! ! ! अपनी वो पूरी खुली भरी और गाढ़ी हंसी ! मेघाछ्न्न गदराये आकाश से और न सम्हल सकी ...
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Friday, November 6, 2009

अवसाद के दिनों में सच !

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सच इतना अधिक है चहुं ओर हमारे खड़ा बैठा चलता दौड़ता कि हम सह नहीं पाते हैं फट फट जाते है माया मिथ्या आभास कह कह उसे टरकाते हैं ! कि...
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Monday, November 2, 2009

तुम्हें देखें !

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हे प्रभु ! मुझे तो नहीं पता लेकिन लोग कहते हैं कि अब मैं कवि हो गया हूं ! मैं तो बिलकुल भी ठीक से नहीं जानता कि ये कविता क्या होती है लिख...
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Saturday, October 31, 2009

सपने

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टूटते हैं सपने बिखरते हैं सपने प्रतिकूलताओं के प्रस्तर खण्डों में दब कलपते हैं सपने तड़पते हैं सपने मरकर भी कहां मर पाते हैं सपने कभी भूत ...
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Thursday, October 29, 2009

प्रभाव

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तत्क्षण ही खूब प्रभावित हो जाना कोई बड़ी अच्छी बात नहीं है । तुम अत्यन्त प्रतिभाशाली महान व विचारवान हो ! तो इससे मुझे कॊई फर्क नहीं पड़ जात...
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Monday, October 26, 2009

दोस्ती

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आज मैंने अपने भगवान जी पर एक एहसान किया मन में फुदक आयी एक अनरगल इच्छा को भगवान जी से बिना कहे मन ही में खुरच खुरच कर , खिरच खिरच कर खत्म कर...
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Friday, October 23, 2009

क्यों धूप क्यों !

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धूप ! आजकल हर सांझ जाने से पहले तुम , इतनी गहरी पीली जर्द क्यों हो उठती हो ? क्यॊं पेड़ों के मटमैले हरे झुरमुट से रिसकर पीछे दीवार के पर्द...
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Tuesday, October 20, 2009

बच्चे .....

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बच्चे ! असंख्य जटिल कठिन प्रक्रियाऒं के कितने अच्छे सहज सरल परिणाम ! वाह ! ! ! !
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Wednesday, October 14, 2009

प्रतिदान

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यदि कभी कुछ दूँ मैं तुम्हें तो तपाक से थैंक्यू न बोलना !!! (अच्छा नही लगता बिलकुल भी ! ) लेना ....... चुप रहना ....
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Monday, October 12, 2009

10 अप्रैल 2009 (डायरी से .......)

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सब खाली खाली है.......... । परीक्षाएं खत्म हो गयी हैं ....। दस दिन हो गए .........। लगभग सब अच्छा ही गया है । कम्प्यूटेशनल लिग्विंस्टिक्स...
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Tuesday, October 6, 2009

कृत्रिम.....नहीं ...सृजित !!!!

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तुम्हारी अन्धेरी सुबकनों को अपने स्नेह की लय में डाल जिसने उन्हें धीमी मुस्कराहटों के संगीत में बदल दिया .... अपने इस क्षणिक उत्कर्ष में ...
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Saturday, October 3, 2009

गोल्डिग ! वे बच्चे नहीं थे ! *

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विलियम गोल्डिंग अंग्रेजी के एक महान उपन्यासकार हैं । अपने प्रसिद्ध नोबल पुरस्कृत उपन्यास “ लार्ड आफ़ द फ़्लाइज़ ” में इन्होंने दिखाया है कि ब...
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Thursday, October 1, 2009

सत्य के साथ प्रयोग अभी जारी है !!!

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लकड़ी के डण्डों पर टिकी मुरचहे टीन की छत , पोलीथीन की दिवारें ! जुलाई महीने की सड़ी उमस भरी रातों में आसपास की बजबजाती नालियों में जवान हु...
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Friday, September 25, 2009

जरूरी नहीं की.....

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जरूरी नहीं कि हर बार कुछ अच्छा ही लिखा जाय । जरूरी नहीं कि हर बार कुछ पूरा ही लिखा जाय । जरूरी नहीं कि हर बार कुछ प्रशसंसनीय ही लिखा जा...
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Monday, September 21, 2009

क्योंकि तुमसे मैं प्रेम नही करता

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यह समय तुम्हारे आने का था ! और तुम नहीं आये !!! वैसे तो व्यस्त था मैं अपने कामों में – जैसे रोज रहा करता हूं ले...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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