आर्जव
Friday, November 27, 2009

शब्द यदि झुक गए !

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शब्द जब बध गये छन्द में तो “घनत्व” कैसे करेंगे वहन ? शब्द जब ढल गये छन्द में तो झेलेगे कैसे अपने अर्थों की गुह्य अंतःक्रियायें ? शब्द जब झुक...
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Tuesday, November 24, 2009

फिर से

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तब तक एक पुरानी कविता फिर से पढ़ ले ! क्योकि समय कुछ शब्दों के अर्थ बदल देता है........ कविता की खोज में
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Thursday, November 19, 2009

अ अस्वीकार

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मैंने जाना कि वह करना, उसमें होना, गलत है । मैंने उसका निषेध किया । खुद को उसकी तरफ बहने से रोका । उसके प्रति भीतर अपने वह स्वभाव रचा जो अनु...
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Sunday, November 15, 2009

प्रेम गीत

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सोचता हूं लिखूं मैं भी कोई प्रेम गीत ! लिखूं सांझ की उतरती उदास धूप में पीली रोशनी के वलय-सा जगमगाता कनेर ! लिखूं भॊर की पहली किरन को रंगों ...
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Thursday, November 12, 2009

मै बस देखूगा !

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बस, हतप्रभ अकिंचन मैं देखूंगा , चुप ! विस्मित ! तुम हंसो ! ! ! अपनी वो पूरी खुली भरी और गाढ़ी हंसी ! मेघाछ्न्न गदराये आकाश से और न सम्हल सकी ...
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Friday, November 6, 2009

अवसाद के दिनों में सच !

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सच इतना अधिक है चहुं ओर हमारे खड़ा बैठा चलता दौड़ता कि हम सह नहीं पाते हैं फट फट जाते है माया मिथ्या आभास कह कह उसे टरकाते हैं ! कि...
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Monday, November 2, 2009

तुम्हें देखें !

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हे प्रभु ! मुझे तो नहीं पता लेकिन लोग कहते हैं कि अब मैं कवि हो गया हूं ! मैं तो बिलकुल भी ठीक से नहीं जानता कि ये कविता क्या होती है लिख...
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Saturday, October 31, 2009

सपने

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टूटते हैं सपने बिखरते हैं सपने प्रतिकूलताओं के प्रस्तर खण्डों में दब कलपते हैं सपने तड़पते हैं सपने मरकर भी कहां मर पाते हैं सपने कभी भूत ...
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Thursday, October 29, 2009

प्रभाव

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तत्क्षण ही खूब प्रभावित हो जाना कोई बड़ी अच्छी बात नहीं है । तुम अत्यन्त प्रतिभाशाली महान व विचारवान हो ! तो इससे मुझे कॊई फर्क नहीं पड़ जात...
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Monday, October 26, 2009

दोस्ती

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आज मैंने अपने भगवान जी पर एक एहसान किया मन में फुदक आयी एक अनरगल इच्छा को भगवान जी से बिना कहे मन ही में खुरच खुरच कर , खिरच खिरच कर खत्म कर...
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Friday, October 23, 2009

क्यों धूप क्यों !

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धूप ! आजकल हर सांझ जाने से पहले तुम , इतनी गहरी पीली जर्द क्यों हो उठती हो ? क्यॊं पेड़ों के मटमैले हरे झुरमुट से रिसकर पीछे दीवार के पर्द...
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Tuesday, October 20, 2009

बच्चे .....

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बच्चे ! असंख्य जटिल कठिन प्रक्रियाऒं के कितने अच्छे सहज सरल परिणाम ! वाह ! ! ! !
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Wednesday, October 14, 2009

प्रतिदान

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यदि कभी कुछ दूँ मैं तुम्हें तो तपाक से थैंक्यू न बोलना !!! (अच्छा नही लगता बिलकुल भी ! ) लेना ....... चुप रहना ....
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Monday, October 12, 2009

10 अप्रैल 2009 (डायरी से .......)

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सब खाली खाली है.......... । परीक्षाएं खत्म हो गयी हैं ....। दस दिन हो गए .........। लगभग सब अच्छा ही गया है । कम्प्यूटेशनल लिग्विंस्टिक्स...
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Tuesday, October 6, 2009

कृत्रिम.....नहीं ...सृजित !!!!

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तुम्हारी अन्धेरी सुबकनों को अपने स्नेह की लय में डाल जिसने उन्हें धीमी मुस्कराहटों के संगीत में बदल दिया .... अपने इस क्षणिक उत्कर्ष में ...
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Saturday, October 3, 2009

गोल्डिग ! वे बच्चे नहीं थे ! *

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विलियम गोल्डिंग अंग्रेजी के एक महान उपन्यासकार हैं । अपने प्रसिद्ध नोबल पुरस्कृत उपन्यास “ लार्ड आफ़ द फ़्लाइज़ ” में इन्होंने दिखाया है कि ब...
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Thursday, October 1, 2009

सत्य के साथ प्रयोग अभी जारी है !!!

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लकड़ी के डण्डों पर टिकी मुरचहे टीन की छत , पोलीथीन की दिवारें ! जुलाई महीने की सड़ी उमस भरी रातों में आसपास की बजबजाती नालियों में जवान हु...
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Friday, September 25, 2009

जरूरी नहीं की.....

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जरूरी नहीं कि हर बार कुछ अच्छा ही लिखा जाय । जरूरी नहीं कि हर बार कुछ पूरा ही लिखा जाय । जरूरी नहीं कि हर बार कुछ प्रशसंसनीय ही लिखा जा...
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Monday, September 21, 2009

क्योंकि तुमसे मैं प्रेम नही करता

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यह समय तुम्हारे आने का था ! और तुम नहीं आये !!! वैसे तो व्यस्त था मैं अपने कामों में – जैसे रोज रहा करता हूं ले...
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Friday, September 18, 2009

पहचान

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कितना जरूरी है जीने के लिए किसी का यह कहना कि सचमुच बड़े अच्छे हो तुम !
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Friday, September 4, 2009

अन्यथा ..........

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सब कुछ तुम्हारा ही है ! मेरी जीत , मेरी हार मेरी वासनाएं ,आकांक्षाए मेरे पाप ........... सब कुछ तुम्हारा ही है ! मेरे मद , मे...
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Monday, June 15, 2009

किसने किसको

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अस्तित्व हमारा उधार की एक रकम है । किसी ने दिया है किसी को एक दिन पाई- पाई वापस ले लेने के लिये । लेकिन समस्या हमारी यह है कि हम यानी रकम...
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Tuesday, June 2, 2009

भागो !

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(मन ने मन से कहा --) मत लड़ो । हार जाओगे । दुख से लड़ा जा सकता है । अहंकार , ईर्ष्या ,द्वेष व क्रोध सभी से लड़ा जा सकता है । लेकिन….. मत लड़ो ...
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Thursday, May 28, 2009

मिलन

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प्रणय का उत्कर्ष जो है स्वप्न का उल्लास जो है , सोचता हूं कैसा होगा वह मिलन !!! आशाओं का आलम्ब जो है प्रेरणाओं का उद्‍गार जो है सत्य का ...
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Sunday, May 10, 2009

हम टूट गए........

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हम टूट गये । टूट जाती है बीच से जैसे सूखी लकड़ी । झिप गयी चमक उल्लसित स्वप्नों की आभा से दीप्त हमारे नयनों की । झर गये आह्लाद- सौरभ , विह्वल...
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Thursday, May 7, 2009

चरित्रहीनता

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अनियमितता ही चरित्रहीनता है !!!!!
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Sunday, May 3, 2009

जीत

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जो जीत मिली है तुम्हें और जिस पर तुम इतने प्रफुल्लित हो उसे बस लोगों को दिखाने के लिये अपने घर के दरवाजे पर बांस लगाकर टांग मत देना ! या ख...
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Monday, April 27, 2009

आदतन

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मन भी कितनी अद्भुत चीज है ! इसकी तो माया ही निराली है ! बिलकुल एक छोटे चंचल बच्चे सा हठी , उद्धत, व मूलतः निश्छ्ल ! किसी भी ऐसे मामले मे...
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Wednesday, April 22, 2009

गौरैया के बच्चे

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दोपहरी सन्नाटे में अकेले अपने रूम मे बैठा कुछ कर ही रहा था की लाइट चली गयी ! एक गहरी सांस ले धीरे से सब काम किनारे रख सम्मुख की खिड़की खोली ...
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Friday, April 17, 2009

श्श्श्श...चुप !!

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1. . . . .श्श्श्श्श्श्श्श्श . . .चुप ! ! ! ! घात लगाये , छत मुड़ेर पर, अभी टिकुरी बैठी है बिल्‍ली . . .. . .। 2. शोर न करो, धीरे धीरे आ...
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Monday, April 13, 2009

क्षणिकाए

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(1) मैं बना गर्भ पालता बीज तुम्हारे प्रेम का । (2) खूशबू से पूछो पता फूल के दर्द का । (3) घोंसले में थकी सोयी है चिड़िया । सूरज ! रुको अभ...
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Saturday, April 11, 2009

शब्द

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(मेरी) कविता के शब्दों में तुम अर्थ न खोजना, उसकी व्याख्यायें न करना । केवल उच्‍चरित करना , उन्हें धारण करना और चुप हो जाना । वे बस शब्द न...
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Thursday, April 9, 2009

वो लड़की है....

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आज सात साल बाद मिला था उनसे । अब वो बड़ी हो गयी हैं । वो लड़की हैं । वो बोलती और हंसती भी हैं । वो लोगों को देखकर मुस्कराती हैं और बातें करत...
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Tuesday, April 7, 2009

अक्षर

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मैं अपना जीना अपना होना अपनी तृप्त अतृप्त आकाक्षांए अपने द्वेष अपनी प्रसन्‍नताएं और इन सब को मिलाकर जो बिलकुल मैं हूं वह थोड़ा थोड़ा रोज रोज ...
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Saturday, April 4, 2009

चाहना और होना

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चाहने और होने में बहुत अन्तर है ! बहुत कम ही यह होता है कि “चाहना” “होने” की तरफ पहला कदम हो! अक्सर चाहना अपने जनमने के कुछ समय बाद ही आ...
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Sunday, March 8, 2009

उल्लास

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हर्ष के रंग रंग गये सब मन के गात! छलका उल्‍लास! बरसा उल्‍लास ! निश्चल वृक्षों संग नेह प्‍लावित हृदय भी हरितिमा की इस उत्सव-वर्षा में तर ब...
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Tuesday, March 3, 2009

मृत्यु

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देह तो बाद में मरती है । अक्सर मन बहुत पहले ही मर जाता है । धीरे धीरे सड़ती लाश बची रहती है । लोग कहते हैं “पहुंचा हुआ” । दरसल , बहुत सारे व...
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Friday, February 27, 2009

कवि

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अभी रुको थोड़ी देर । धैर्य धरो । आने दो वे मुहूर्त जिनमें तुम्हारे अन्तर्जगत और वाह्यजगत के सब भेद मिट जांय । तब तुम अपने को कवि कहना । मै...
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Wednesday, February 25, 2009

परावर्तन

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आज मुझसे कहा तुमने कि “बहुत अच्छे” । तो जरूरी नहीं कि कहूं ही मैं तुमसे “धन्यवाद” । क्यॊंकि कभी अगर फिर कहोगे तुम “कमीने” तो निश्चित ही तु...
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Sunday, February 22, 2009

चौराहे

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हार जीत प्राप्ति अप्राप्ति अवनति उत्कर्ष सब बस एक चौराहे हैं । कुछ पल रुकना है । आगे का पथ निर्देशन लेना है । चल देना है । कहीं नहीं .... ...
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Thursday, February 19, 2009

एक आत्मसंवाद .....

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चलो छोड़ो! बढ़ो आगे ! न रुको ! देखो उधर ! कितनों को जरूरत है तुम्हारी ! चाहते हैं वे कि पास रहो तुम उनके उन्हीं के बन कर , उन्हीं...
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Monday, February 16, 2009

परस

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छुआ तुमने!!! न जाने क्यों भर आयी आंखें और चुपचाप बह चले एक दो गीले कन . ...... अश्रुपूरित नयन, विगलित मन मैं बस विलोकता रहा तुम्हें , विनत....
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Sunday, February 15, 2009

किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र

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किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र लकड़ी के दरवाजे में नहीं देह में सुनो कान लगाकर अपनी सांस . ..... समय का घुन अनवरत चर रहा है तुम्हें..........
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Friday, February 13, 2009

क्षणिकाएं

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(0) न भीचों कस कर । लिटा स्‍नेहिल अंकों में बस दुलराओ ! (0) हवा मैं फूल तुम , मैं तुम में , तुम मुझमें ! (0) सिन...
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Wednesday, February 11, 2009

कविता की खोज में . ...

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जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता । जैसे कल रात जल्दी सोया मैं और सुबह ही मां ने जगाया । पूरे दिन सब कुछ वैसे ही च...
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Sunday, February 8, 2009

रिश्ते

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समय की नदी में छोटी -सी नाव- से बहते हैं रिश्ते ! कभी भावनाओं की लहर , तो कभी उलझन के थपेड़ों में हुटकते हैं रिश्ते ! कभी वसन्त के स्वागत मे...
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Friday, February 6, 2009

सुख . . . .

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सुख है । निश्चित तौर पर है … सुख । लेकिन वह कोई पीपल के पेड़ -सा नहीं , जुगनू की अकेली टिमकन -सा है । वह कोई बड़ी- सी नदी नहीं , बहाव से किना...
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Thursday, February 5, 2009

तरीके

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बाहर के सारे लोग मुझे अच्छा कहें और मैं अपने को बुरा जानता रहूं । एक यह । बाहर के सारे लोग मुझे बुरा कहें और मैं अपने को अच्छा जानता रहूं ।...
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Tuesday, February 3, 2009

चुपचाप बहता मै . . . ..

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प्रौढ़ जाड़े की एक सुबह -- ठण्ढ़ी पीली और यूं ही खुश! बेमतलब कहीं जाता मैं। टांग पसारे , गर्दन में मुड़ा सिर टिकाये अधखुली आंख, मस्त काली चम...
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Sunday, February 1, 2009

श्रद्धा और अहंकार

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श्रद्धा और अहंकार । एक नहीं है तो दूसरा होगा ही होगा । बच नहीं सकते तुम कोई और रास्ता नहीं हैं । एक मूंद सब द्वार , सड़ाकर गला देता है ! एक...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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