आर्जव
Sunday, March 8, 2009

उल्लास

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हर्ष के रंग रंग गये सब मन के गात! छलका उल्‍लास! बरसा उल्‍लास ! निश्चल वृक्षों संग नेह प्‍लावित हृदय भी हरितिमा की इस उत्सव-वर्षा में तर ब...
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Tuesday, March 3, 2009

मृत्यु

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देह तो बाद में मरती है । अक्सर मन बहुत पहले ही मर जाता है । धीरे धीरे सड़ती लाश बची रहती है । लोग कहते हैं “पहुंचा हुआ” । दरसल , बहुत सारे व...
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Friday, February 27, 2009

कवि

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अभी रुको थोड़ी देर । धैर्य धरो । आने दो वे मुहूर्त जिनमें तुम्हारे अन्तर्जगत और वाह्यजगत के सब भेद मिट जांय । तब तुम अपने को कवि कहना । मै...
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Wednesday, February 25, 2009

परावर्तन

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आज मुझसे कहा तुमने कि “बहुत अच्छे” । तो जरूरी नहीं कि कहूं ही मैं तुमसे “धन्यवाद” । क्यॊंकि कभी अगर फिर कहोगे तुम “कमीने” तो निश्चित ही तु...
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Sunday, February 22, 2009

चौराहे

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हार जीत प्राप्ति अप्राप्ति अवनति उत्कर्ष सब बस एक चौराहे हैं । कुछ पल रुकना है । आगे का पथ निर्देशन लेना है । चल देना है । कहीं नहीं .... ...
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Thursday, February 19, 2009

एक आत्मसंवाद .....

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चलो छोड़ो! बढ़ो आगे ! न रुको ! देखो उधर ! कितनों को जरूरत है तुम्हारी ! चाहते हैं वे कि पास रहो तुम उनके उन्हीं के बन कर , उन्हीं...
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Monday, February 16, 2009

परस

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छुआ तुमने!!! न जाने क्यों भर आयी आंखें और चुपचाप बह चले एक दो गीले कन . ...... अश्रुपूरित नयन, विगलित मन मैं बस विलोकता रहा तुम्हें , विनत....
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Sunday, February 15, 2009

किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र

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किर्र ..किर्र.....किर्र..किर्र लकड़ी के दरवाजे में नहीं देह में सुनो कान लगाकर अपनी सांस . ..... समय का घुन अनवरत चर रहा है तुम्हें..........
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Friday, February 13, 2009

क्षणिकाएं

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(0) न भीचों कस कर । लिटा स्‍नेहिल अंकों में बस दुलराओ ! (0) हवा मैं फूल तुम , मैं तुम में , तुम मुझमें ! (0) सिन...
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Wednesday, February 11, 2009

कविता की खोज में . ...

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जिस दिन सब कुछ अच्छा रहता है उस दिन नहीं जन्मती कोई कविता । जैसे कल रात जल्दी सोया मैं और सुबह ही मां ने जगाया । पूरे दिन सब कुछ वैसे ही च...
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Sunday, February 8, 2009

रिश्ते

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समय की नदी में छोटी -सी नाव- से बहते हैं रिश्ते ! कभी भावनाओं की लहर , तो कभी उलझन के थपेड़ों में हुटकते हैं रिश्ते ! कभी वसन्त के स्वागत मे...
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Friday, February 6, 2009

सुख . . . .

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सुख है । निश्चित तौर पर है … सुख । लेकिन वह कोई पीपल के पेड़ -सा नहीं , जुगनू की अकेली टिमकन -सा है । वह कोई बड़ी- सी नदी नहीं , बहाव से किना...
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Thursday, February 5, 2009

तरीके

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बाहर के सारे लोग मुझे अच्छा कहें और मैं अपने को बुरा जानता रहूं । एक यह । बाहर के सारे लोग मुझे बुरा कहें और मैं अपने को अच्छा जानता रहूं ।...
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Tuesday, February 3, 2009

चुपचाप बहता मै . . . ..

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प्रौढ़ जाड़े की एक सुबह -- ठण्ढ़ी पीली और यूं ही खुश! बेमतलब कहीं जाता मैं। टांग पसारे , गर्दन में मुड़ा सिर टिकाये अधखुली आंख, मस्त काली चम...
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Sunday, February 1, 2009

श्रद्धा और अहंकार

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श्रद्धा और अहंकार । एक नहीं है तो दूसरा होगा ही होगा । बच नहीं सकते तुम कोई और रास्ता नहीं हैं । एक मूंद सब द्वार , सड़ाकर गला देता है ! एक...
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Thursday, January 29, 2009

प्रक्रिया

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कभी कभी ऎसा होता है कि पहले अनुभूति आती है- अस्पष्ट और अहेतुक! फिर, बाद में, धुएं की सीढ़ी से नीचे उतरते हुये, वह भाषा की बगिया में शब्दों ...
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Tuesday, January 27, 2009

अब विदा दो !

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पाथेय जुट गया है!! ओ प्रिय! अब विदा दो . . . . . . पुष्प स्नेह का जितना खिलना था, खिल गया है अब, इसे चढ़ा दो. गीत अब भी गीत है फूल अब भी फूल...
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Wednesday, January 21, 2009

धरती और धूप

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बदल रहे हैं धीरे धीरे धरती और धूप के रिश्ते! शायद इसी बदलने को मौसम का बदलना कहते है ! आज की धूप में वो कुछ दिनों पहले वाला संकोच नहीं दिखा...
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Monday, January 19, 2009

आदत

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नश्‍वर है देह , मन और हर वह कन जो जन्मा है । समय के पाश में जकड़ी , भंगुर है वो आभा जो सुबह आज अकिंनच पुष्प में विहस उठी है । विस्तृत सीमा...
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Friday, January 16, 2009

न जाने क्या .....!

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आज पूरे दिन, सूरज न जाने किस आग में तपता हुआ , आसमान के लम्बे चौड़े गलियारे में टहलता रहा है ! किरनों की नाव में बैठकर , हवा के समंदर में तल...
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Sunday, January 11, 2009

हर रोज

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हर रोज सूरज ही नहीं , मैं भी उगता और डूबता हूँ . हर रोज चाँद ही नहीं , मैं भी पिघलता और बिखरता हूँ . हर रोज साँझ की नीली परी ही नहीं , ...
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Monday, January 5, 2009

स्थगित अस्तित्व: एक याचना

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तुम आओ! पास बैठो मेरे ! मुस्कुराओ, और सपने देखो ! शिशिर की इस स्नेह -उष्ण नयी पीली धूप में सर्जना की अविरल साधना निमग्न किसी अनाम पुष्प वृन...
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Thursday, January 1, 2009

फर्जी शुभकामनाएं

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(यह विनय भईया के ब्लाग पर टिप्पणी के लिये लिख रहा था , फिर सोचा कि टिप्पणी को थोड़ा और खिला पिला कर अपना भी स्वार्थ साध लूं !) एक बात है...
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Tuesday, December 30, 2008

चलो ! अच्छा हुआ

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चलो अच्छा हुआ कि तुम्हें भी कोइ और मिल गया ! प्रतिशोध मुझसे जो था तुम्हारा चुक गया ! विचरते मेरे दंभ के पठारों में खो चुके जो स्वप्न थे सब ...
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Friday, December 26, 2008

शेष तुम्हारी इच्छा . . .

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मैं चाहता हूं तुम्हें या नहीं, कह नहीं सकता । मैं बस तुम्हारा ही हूं या नहीं , कह नहीं सकता । तुम्हारे एक कहने पर दे दूंगा जान या नहीं कह ...
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Tuesday, December 23, 2008

संपृक्त

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मेरी सफलताएं और असफलताएं ! ! ! बीच इनके कभी इधर तो कभी उधर ढुळकता आधारहीन अनअस्तित्व मैं ! सफलताएं जब आसपास खड़ीं हो जाती हैं आकर तब वे...
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Thursday, December 18, 2008

कभी कभी ,मेरे बावजूद

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कभी कभी मुझसे ही खुद को बचाते हुये मेरे भीतर से कुछ - सफ़ेद -नीले धुएं के पेंड़ सा निकल आता है . . . . कुछ ऎसा , जो बिलकुल मेरे बावजूद होत...
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Tuesday, December 16, 2008

तुम्हारी चुप्पी

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तुम्हारी चुप्पी को अस्वीकार समझ, अपनी हार समझ, खुद में वापस लौट गया मैं ! ढलती सांझ -से उदास मन में पहले उगे तारे- सी धुधंली, टिमटिमाती ...
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Monday, December 15, 2008

तुम्हारा चाहना

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आकस्मिक मत समझना मेरी उस चुप्पी को जो तुम्हारी उस निरभ्र, मध्दिम फुसफुसाहट कि “मैं चाहती हूँ तुम्हें” पर फैल गयी थी पूरे मुझ पर ! चुप...
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Monday, December 1, 2008

रेड अलर्ट

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वही बगल में , पूना में था , जब हमला शुरू हुआ ! हमने सोचा था की बनारस वापस लौटने से पहले एक दिन बाम्बे भी घूम आयेंगें , राज ठाकरे की मुम्बई ...
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Tuesday, November 11, 2008

अपना कच्चा चिठ्ठा

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बेवकूफ किस्म का एकदम निठ्ठ्ल्ला लड़का हूँ. सोकर सुबह आठ बजे उठता हूँ. नौ बजे रूम से लगभग एक कोस दूर फैकल्टी के किसी बूढे से क्लासरूम में किस...
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कुछ , जो पड़ा और सुना

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बहरा हूँ मै तो चाहिए कि दूना हो इल्तिफात सुनता नहीं हूँ बात मुकरर कहे बगैर * * * * * * हम न समझे थे बात इतनी सी ख्वाब शीशे के ,दुनिया पत्थर ...
Sunday, November 9, 2008

नियति

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कोई एक अच्छा आदमी , जो फितरत से भीतरी तौर पर एक कलाकार था, खाली बैठा था। यकायक उसे एक खुराफात सूझी. सामने पड़े ईटों के एक बेतरतीब ढेर क...
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Saturday, November 1, 2008

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(०) गहरा है तो क्या ! खारा है … उथली है तो क्या ! मीठी है ….. स्थिर है तो क्या ! सिर्फ़ संचय जानता है …. बहती है तो क्या ! देना जानती है … ...
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Wednesday, October 29, 2008

क्षणिकाएं

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(१) किसे नहीं पता की सच क्या है .....! ! ! ! लेकिन .................... (2) कभी सोचा है तुमने ! हमेशा काली ही क्यों होती है ? परछायी आ...
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Saturday, October 25, 2008

कला

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कला एक विवशता है. मैं जानता हूँ कुछ शब्द कुछ संरचनाएं भावों की छोटी-सी उपज है मेरे पास मैं, छटपटाता , बंद , इन्हीं शब्दों ,संरचनाओं के लघ...
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ओलिवर ट्विस्ट , तुम मिले थे मुझे !

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दो एक साल पहले चाल्स डिकेन्स की एक किताब में परिचय हुआ था इस पात्र से.मिलकर ये नहीं लगा की किसी उपन्यास का एक चरित्र है ये . बार बार ये लगा...
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Thursday, October 23, 2008

स्नेह -परस

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आओ ! नेह -तुलिका से विगत के स्मृति- चित्र बनाएं…..! स्नेह-रंजित ,मधु-सिक्त ,मृदु भाव रंग , आर्द्र –करुण- नम्र- आलोक प्राण ईषत –उन्मत्त ,अमू...

मैं

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किसी बहुत प्रिय ने ही कहा था की बड़े हृदयहीन हो तुम , उसी के लिए - जो हूँ ,वो तो होना ही पड़ेगा ! अब जो हूँ , वह होने में मेरा कोई चु...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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