आर्जव
Thursday, January 29, 2009

प्रक्रिया

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कभी कभी ऎसा होता है कि पहले अनुभूति आती है- अस्पष्ट और अहेतुक! फिर, बाद में, धुएं की सीढ़ी से नीचे उतरते हुये, वह भाषा की बगिया में शब्दों ...
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Tuesday, January 27, 2009

अब विदा दो !

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पाथेय जुट गया है!! ओ प्रिय! अब विदा दो . . . . . . पुष्प स्नेह का जितना खिलना था, खिल गया है अब, इसे चढ़ा दो. गीत अब भी गीत है फूल अब भी फूल...
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Wednesday, January 21, 2009

धरती और धूप

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बदल रहे हैं धीरे धीरे धरती और धूप के रिश्ते! शायद इसी बदलने को मौसम का बदलना कहते है ! आज की धूप में वो कुछ दिनों पहले वाला संकोच नहीं दिखा...
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Monday, January 19, 2009

आदत

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नश्‍वर है देह , मन और हर वह कन जो जन्मा है । समय के पाश में जकड़ी , भंगुर है वो आभा जो सुबह आज अकिंनच पुष्प में विहस उठी है । विस्तृत सीमा...
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Friday, January 16, 2009

न जाने क्या .....!

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आज पूरे दिन, सूरज न जाने किस आग में तपता हुआ , आसमान के लम्बे चौड़े गलियारे में टहलता रहा है ! किरनों की नाव में बैठकर , हवा के समंदर में तल...
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Sunday, January 11, 2009

हर रोज

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हर रोज सूरज ही नहीं , मैं भी उगता और डूबता हूँ . हर रोज चाँद ही नहीं , मैं भी पिघलता और बिखरता हूँ . हर रोज साँझ की नीली परी ही नहीं , ...
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Monday, January 5, 2009

स्थगित अस्तित्व: एक याचना

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तुम आओ! पास बैठो मेरे ! मुस्कुराओ, और सपने देखो ! शिशिर की इस स्नेह -उष्ण नयी पीली धूप में सर्जना की अविरल साधना निमग्न किसी अनाम पुष्प वृन...
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Thursday, January 1, 2009

फर्जी शुभकामनाएं

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(यह विनय भईया के ब्लाग पर टिप्पणी के लिये लिख रहा था , फिर सोचा कि टिप्पणी को थोड़ा और खिला पिला कर अपना भी स्वार्थ साध लूं !) एक बात है...
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Tuesday, December 30, 2008

चलो ! अच्छा हुआ

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चलो अच्छा हुआ कि तुम्हें भी कोइ और मिल गया ! प्रतिशोध मुझसे जो था तुम्हारा चुक गया ! विचरते मेरे दंभ के पठारों में खो चुके जो स्वप्न थे सब ...
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Friday, December 26, 2008

शेष तुम्हारी इच्छा . . .

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मैं चाहता हूं तुम्हें या नहीं, कह नहीं सकता । मैं बस तुम्हारा ही हूं या नहीं , कह नहीं सकता । तुम्हारे एक कहने पर दे दूंगा जान या नहीं कह ...
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Tuesday, December 23, 2008

संपृक्त

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मेरी सफलताएं और असफलताएं ! ! ! बीच इनके कभी इधर तो कभी उधर ढुळकता आधारहीन अनअस्तित्व मैं ! सफलताएं जब आसपास खड़ीं हो जाती हैं आकर तब वे...
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Thursday, December 18, 2008

कभी कभी ,मेरे बावजूद

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कभी कभी मुझसे ही खुद को बचाते हुये मेरे भीतर से कुछ - सफ़ेद -नीले धुएं के पेंड़ सा निकल आता है . . . . कुछ ऎसा , जो बिलकुल मेरे बावजूद होत...
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Tuesday, December 16, 2008

तुम्हारी चुप्पी

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तुम्हारी चुप्पी को अस्वीकार समझ, अपनी हार समझ, खुद में वापस लौट गया मैं ! ढलती सांझ -से उदास मन में पहले उगे तारे- सी धुधंली, टिमटिमाती ...
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Monday, December 15, 2008

तुम्हारा चाहना

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आकस्मिक मत समझना मेरी उस चुप्पी को जो तुम्हारी उस निरभ्र, मध्दिम फुसफुसाहट कि “मैं चाहती हूँ तुम्हें” पर फैल गयी थी पूरे मुझ पर ! चुप...
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Monday, December 1, 2008

रेड अलर्ट

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वही बगल में , पूना में था , जब हमला शुरू हुआ ! हमने सोचा था की बनारस वापस लौटने से पहले एक दिन बाम्बे भी घूम आयेंगें , राज ठाकरे की मुम्बई ...
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Tuesday, November 11, 2008

अपना कच्चा चिठ्ठा

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बेवकूफ किस्म का एकदम निठ्ठ्ल्ला लड़का हूँ. सोकर सुबह आठ बजे उठता हूँ. नौ बजे रूम से लगभग एक कोस दूर फैकल्टी के किसी बूढे से क्लासरूम में किस...
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कुछ , जो पड़ा और सुना

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बहरा हूँ मै तो चाहिए कि दूना हो इल्तिफात सुनता नहीं हूँ बात मुकरर कहे बगैर * * * * * * हम न समझे थे बात इतनी सी ख्वाब शीशे के ,दुनिया पत्थर ...
Sunday, November 9, 2008

नियति

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कोई एक अच्छा आदमी , जो फितरत से भीतरी तौर पर एक कलाकार था, खाली बैठा था। यकायक उसे एक खुराफात सूझी. सामने पड़े ईटों के एक बेतरतीब ढेर क...
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Saturday, November 1, 2008

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(०) गहरा है तो क्या ! खारा है … उथली है तो क्या ! मीठी है ….. स्थिर है तो क्या ! सिर्फ़ संचय जानता है …. बहती है तो क्या ! देना जानती है … ...
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Wednesday, October 29, 2008

क्षणिकाएं

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(१) किसे नहीं पता की सच क्या है .....! ! ! ! लेकिन .................... (2) कभी सोचा है तुमने ! हमेशा काली ही क्यों होती है ? परछायी आ...
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Saturday, October 25, 2008

कला

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कला एक विवशता है. मैं जानता हूँ कुछ शब्द कुछ संरचनाएं भावों की छोटी-सी उपज है मेरे पास मैं, छटपटाता , बंद , इन्हीं शब्दों ,संरचनाओं के लघ...
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ओलिवर ट्विस्ट , तुम मिले थे मुझे !

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दो एक साल पहले चाल्स डिकेन्स की एक किताब में परिचय हुआ था इस पात्र से.मिलकर ये नहीं लगा की किसी उपन्यास का एक चरित्र है ये . बार बार ये लगा...
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Thursday, October 23, 2008

स्नेह -परस

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आओ ! नेह -तुलिका से विगत के स्मृति- चित्र बनाएं…..! स्नेह-रंजित ,मधु-सिक्त ,मृदु भाव रंग , आर्द्र –करुण- नम्र- आलोक प्राण ईषत –उन्मत्त ,अमू...

मैं

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किसी बहुत प्रिय ने ही कहा था की बड़े हृदयहीन हो तुम , उसी के लिए - जो हूँ ,वो तो होना ही पड़ेगा ! अब जो हूँ , वह होने में मेरा कोई चु...
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आत्मकथन

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अभिषेक आर्जव
बनारस,दिल्ली , India
"हार कर हर मोरचे पर/ जीत ही मैं लिख रहा हूँ, आज के इस दौर में भी, गीत ही मैं लिख रहा हूँ....... ."
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