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Wednesday, April 1, 2020

लाकडाउन कथा: कंसपीरेसी सिध्दान्त


Image from Internet
आज लाकडाउन का सातवां दिन है. भारत में अब संक्रमित लोगों की संख्या हजार के पार पंहुच गयी है. मरने वाले २९ के आसपास हो गये हैं. हर कोई डरा हुआ, भयग्रस्त है. सब अपने अपने तरीके से परिस्थिति का आकलन कर रहे है. और यही मान रहे कि स्थिति और खराब होने वाली है.  शाम को फोन पर मां  ने हम दोनों को सख्त हिदायत दी की अब कुछ भी हो जाय आने वाले दस दिनों तक एकदम घर से नहीं निकलना है. उनका इशारा मेरी ही तरफ ज्यादा था क्योकिं अनु तो वैसे भी दिन भर घर में ही यहां वहां करती रहती हैं. उनके लिए लाकडाउन की जिन्दगी कोई बहुत अधिक विचित्रताओं भरी नहीं है. एक सामान्य भारतीय लड़की के जीवन के कई साल तो नीयर लाकडाउन में ही बीतते हैं. तो दिन भर घर पर बने रहना, कुछ कुछ करते रहना, उनके लिए उतना उबाऊ नहीं है जितना मेरे लिए है.

दिल्ली में भी मामले बढ़ गये हैं. देश के अन्य हिस्सों में भी यही हाल है. दिन में दुकानें पूरी तरह बन्द रहती है. लोगों का डर अलग अलग रूपों में व्यक्त हो रहा है. सोशल मीडिया, न्यूज चैनल, अखबार, जो कि प्रिंट में आ नहीं रहे, केवल आनलाईन संस्करण मौजूद हैं, सब जगह बस एक ही चीज है: कोरोना. शुरुआत में, मतलब दस पंद्रह दिन पहले हम भारतीयों ने आदत अनुसार महामारी की गम्भीरता को समझा नहीं. जब तक यह चीन के वुहान, जहां से यह शुरु हुआ उसके आसपास व कुछ एक अन्य देशॊं में था, आम जनता का तो छॊड़िये, सरकरों ने भी सोचा की काम चल जायेगा. अन्ततः जब संक्रमण चीन से निकल कर पहले ईरान , फिर स्पेन और अब अमेरिका में हजारों को लोगों डस लिया, तब हमने मामले की गंभीरता को समझा और सब कुछ बन्द किया. लाकडाउन केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय  राज्यों में पहले ही घोषित कर दिया गया था.  

भय और आपदा की ऐसी स्थिति में तमाम तरह की कंसपीरेसी सिध्दान्तों का बोलबाला हो चला है. एक बात जो शुरु से ही सुनने में आ रही थी वो ये कि यह सब चीन ने जानबूझ कर किया. ये वायरस उसने अपनी प्रयोगशाला में बनाया और हर जगह फैला दिया. ऐसा इसलिए कि दूसरे देश उनके बनाये हुये आवश्यक आकस्मिक उपस्कर खरीदेंगे जिससे उनका व्यापार बढ़ेगा. इस पीछे जो सबसे मजबूत दलील दी गयी वो ये थी कि वुहान में तो यह वायरस फैला किन्तु पास के ही बीजिंग में नहीं फैला. इसके  उल्टे दूसरे देशों में तेजी से फैल गया. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कोरोना को चायनीज वायरस कहा.

इन बातों पर विश्वास करना न करना व्यक्तिगत चयन हो सकता है जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप के वाट्सेप ने आपको क्या बताया है. ! क्योकिं आजकल लोग मां-बाप-भाई-बहन की सुने न सुने एप की जरुर सुनते हैं. खुद इन बातों पर विश्वास करने से पहले मैंन जो तर्क अपने आप को दिये उनमें एक बात मैंने अपने आप को सबसे ज्यादा बतायी ( किसी और को बताना खतरे से खाली नहीं) कि आज विश्व की अर्थ व्यवस्था आपस में गहरे तौर पर जुड़ी हुयी है. चाहे अमेरिका हो या चीन या भारत या कोई बड़ी वैश्विक इकाई , एक दूसरे को बहुत ज्यादा नुकसान पंहुचाकर किसी को कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला है. चीन तो वैसे भी एक्सपोर्ट ड्रिवेन अर्थव्यवस्था है. भारत व अमेरिका जहां उसके बड़े व्यापार हिस्सेदार हैं वहीं यूरोपियन यूनियन जैसी  समूह भी महत्वपूर्ण हैं. चीन के कुल निर्यात का 4  से 5 % भारत आता है. इसी तरह लगभग 16 से 17 % अमेरिका जाता है. ईयू के आंकड़े भी लगभग इतने ही है. ऐसी स्थिति कॊई भी अर्थव्यवस्था अगर मंदी का शिकार होती है तो रिपल इफेक्ट से सब डूबेंगें. वाट्सएप पर यह बात हो सकता है न पहुंची हो लेकिन कुछ सत्य है इस तर्क में. कोई भी देश जानबूझ कर ऐसा नहीं करेगा. ऐसा करना आत्मघाती होगा. विश्व एक व्यवस्था से चलता है जिसे हो सकता है हम पूरी तरह न समझ पाते हों लेकिन वे काम करती हैं व उनमॆं बदलाव तत्क्षण व सरल नहीं होता.

एक बात यह भी है कि अगर मान लिया जाय कि चीन ने ऐसा जानबूझ कर किया तो यह देखना होगा कि वे इस वैश्विक महामारी से कैसे लाभ कमाते दिख रहे हैं ? क्या चीन स्वास्थ्य उपकरणों का बड़ा निर्यातक है ? चीन जो निर्यात करता है या कर सकता है उसके कम्पोनेन्ट क्या क्या हैं. इन्टरनेट जो जानकारी मिलती है वह इस प्रकार है:

"The top exports of China are Broadcasting Equipment($231B), Computers ($146B), Office Machine Parts($90.8B), Integrated Circuits ($80.1B) and Telephones($62B)." 
source: https://oec.world/en/profile/country/chn/ 



स्पष्ट है कि ज्ञात रूप से चीन स्वास्थ्य यंत्र बनाने की होड़ में नहीं है. हालाकि यह  मात्र एक आकलन है लेकिन यह आंकलन तथ्यों के आधार पर है. 

एक दूसरा पहलू ये भी है कि चीन व अमेरिका के बीच अभी कुछ दिनों पहले तक ट्रेड वार चरम पर था. यह ट्रेड वार भी एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा था जिसमें दोनॊं देश वैश्विक फलक पर अपनी हेजेमनी बरकार रखने के लिए सतत प्रयासरत हैं व अपना प्रभुत्व जताने का कॊई भी मौका जाने नहीं देते. इसी क्रम में अमेरिका ने मौका पाते ही वायरस को चायनीज वायरस बता दिया जिससे चल रही तमाम कंसपीरेसी सिद्धांन्तों को बल मिला. अन्यथा, कोरोना SARs परिवार का एक प्राकृतिक वायरस है. चीन की गलती ये थी कि उसने सही समय पर अपने डाक्टर्स की बात नहीं सुनी. जिस डाक ने इस महामारी के दस्तक की सूचना दी उसको प्रताड़ित किया व बिल्कुल भारतीय तरीके से सही आंकड़े सबसे छुपाये. इसके अलावा बाकी सब होक्स लगता है.


बहरहाल, आजकल कंसपीरेसी सिध्दान्तों का जमाना है. हर बड़ी वैश्विक घटना के पीछे इस तरह की कुछ संकल्पनायें खोज निकाली जाती हैं. कंसपीरेसी सिध्दान्तों के बारे में विस्तार से समझना रुचिकर हो सकता है. इस विषय पर ज्यादा अध्ययन तो नहीं है लेकिन मिशेल बरकन की एक किताब है “अ कल्चर आफ कंसपीरेसी” जिसकी मुख्य बातों को अगली पोस्ट में साझा करने की कोशिश करुगा !


Tuesday, March 31, 2020

लाकडाउन कथा: प्राग्माटिज्म !


वीरान सड़कें. दिल्ली गुड़गाव रोड
आज चार दिन हो गये सब कुछ बन्द हुये. लाकडाउन. सब कुछ बन्द. दुकानें बन्द, कार्यालय बन्द, लोग बन्द. सड़के सूनी है. बाजार वीरान हैं. बाहर निकलने पर पुलिस आप पर लाठियां बरसा सकती है. यह कोरोना नामक विषाणु का प्रकोप है. वायरस शब्द में वह फ़ील नहीं आता जो विषाणु शब्द दे जाता है. इसलिये वायरस नहीं लिखा. आज विश्व के लगभग 199 देश इस महामारी को अनुभव कर रहे है. हजारों लोग मर चुके हैं, लाखों संक्रमित है.

अभी शाम का समय है. मैं कुछ काम की चीजें लेने बाहर गया था. सर्जिकल दस्ताने व मास्क तो पहनना जरुरी है सबको. सब पहन भी रहे हैं. दो तीन वर्ष पहले मैं अकेले मास्क पहन के घूमता था. अब सब साथ हैं.  अच्छा लगता है. दुकानें सुबह दो घण्टे के लिए और शाम को दो घण्टे के लिए खुलती हैं. सारी दुकानें नहीं. सब्जी, दवा व प्रोविजन स्टोर्स. ठेले पर सब्जी वाले भी मौजूद रहते हैं. दिन भर वीरान पड़ी गलियों में शाम को थोड़ी सी चहल पहल दिखायी देती है. लेकिन ज्यादा नहीं. बीस पच्चीस मिनट के अन्तराल पर पुलिस की लारी दिख जाती है. वे सबको दूर दूर खड़े होने व मास्क पहनने के लिए कहते हुये चले जाते है, अगर उन्हें कहीं रुक कर कोई विशॆष निर्देष देने की आवश्यकता नहीं महसूस होती है तो. 
दक्षिण पश्चिम दिल्ली का एक हिस्सा.
सामान लेने के लिय पंक्ति में खड़े लोग.

वैसे जहां मैं रहता हूं यह गूजरों की लोकलिटी है तो पुलिस वालॊं की धौंस भी, अगर कभी दिखानें पड़े तो, न चाहते हुये भी, आईपीसी के सभी नियमॊं का पालन करते हुये भी थॊड़ी सी सेलेक्टिव होती है. कल ही शाम को चार पांच लड़के गली के मुहाने पर, जो कि मुख्य सड़क पर खुलती है, खड़े थे. कांस्टेबल भाई उतरे, और एक बिहारी सब्जी वाले के आसपास खड़े लोगों को निर्देश देकर चले गये. वो भी क्या कर सकते थे.  प्राग्माटिज्म एक ऐसा सिध्दांत है जो सभी विचारधाराओं, दर्शनों का पापा है. इसके बिना कोई भी विचार, सिध्दान्त पंगु है.  

मैं शाम को सब्जी लेने निकला था. वैसे मेरा हरी सब्जियों में बिल्कुल विश्वास नहीं है. सब केमिकल खा पी के बड़ी होती हैं, फलती फूलती हैं. बिना मेलाथ्यान के आप बालकनी में मिर्च तक नहीं उगा सकते. यह मैंने हाल फिलहाल में करके देखा. रायानिक जहर, जिसका बीस ग्राम भी सीधे आपके अन्दर चला जाय तो आपकी आत्मा का नेक्ट सायकल रेडी. लेकिन ये सब भी सब्जियों के माध्यम से डायल्यूट करके हम थोड़ा थोड़ा खा लेते हैं. प्राग्माटिज्म !

जहां मैं हमेशा सब्जी लेता हूं वह "ज्वाइंट" आज बन्द था, पास लगे एक ठेले वाले के पास चला गया. वह सब्जियां देने के साथ साथ आसपास खड़े लोगों को बड़ी ही गर्मजोशी से यह बता रहा था कि अपने पचास साल के जीवन में उसने ऐसा कर्फ़्यू नहीं देखा. जब इन्दिरा गांधी नहीं रही थी तब भी वह यही था. लेकिन ऐसा बन्द उसने नहीं देखा. इसके बाद उसने यह भी बताया की यह कलयुग की महामारी है. उसके गुरु जी जो अब नहीं रहे उन्होंने तीन साल पहले ही यह बता दिया था कि ऐसा होगा. उसने बड़ी ही गम्भीरता से बताया कि यह महामारी औरतों के कारण आयी है. औरतें अब धर्म का पालन नहीं करतीं, इसलिए ऐसा हो रहा है. वह दर्शन प्रतिपादन में और आगे बढ़ रहा था और कुछ अकथनीय बातें कहना शुरु कर रहा था कि मैं वहां से चल दिया. प्राग्माटिज्म !





Monday, March 26, 2018

रेड पर रेड: फिल्म पर अपने विचार

रेड से एक दृश्य , चित्र इंटरनेट से  



कल शाम अचानक प्लान बना और मै, अनु व् मित्र दुबे के साथ गुरुग्राम के पीवीआर सिटी सेंटर में रेड पर रेड मारने चल दिए ! फ़िल्म अच्छी लगी तो सोचा अनुभव साझा किया जाय.सरकारी अफसर की ईमानदारी एक ऎसी फिल्मी चीज हो गयी है जिसे लोग परदे पर देखते हैं,तालियां बजाते हैं, आनंन्दित होते हैं. यह ऎसी हो गयी लगती है जैसे प्लैटॉनिक प्रेम ! वास्तव में तो कम ही पाया जाता है लेकिन लोग उपन्यासों में, फिल्मों में, नाटकों में देखकर आनंद लेते हैं. मन में कहीं गहरे “Willing Suspension of disbelief”  का सिद्धांत भी काम कर रहा होता है कि नहीं नहीं ! ऎसी ईमानदारी तो बस फिल्मो में होती है. अमय पतनायक ( अजय देवगन) जैसे ईमानदार आफिसर वास्तव में थोडे होते हैं. दर्शक के मन में चल रही इसी अवचेतन सोच से “रेड” फ़िल्म का मुख्य रोमांच उभरता हैं.


पूरी फ़िल्म दर्शक को बांधे रखती है. भारतीय इतिहास में आयकर विभाग द्वारा डाली गयी सबसे लम्बी रेड की सत्य कथा पर आधारित यह फ़िल्म कहीं न कहीं यह दिखाने की कोशिश करती है कि अगर नौकरशाही पूरी ईमानदारी से अपना काम करने लगे तो  भ्रष्ट से भ्रष्ट  राजनैतिक वर्ग को भी उसके आगे घुटने टेकने पड़ सकते है. सामान्य तौर पर फिल्मों में किसी ईमानदार पुलिस अफसर को एक भ्रष्ट नेता से लोहा लेते दिखाया जाता है लेकिन एक आयकर आयुक्त को या आयकर विभाग को और उसके महत्त्व को शायद पहली बार इस तरह दर्शकों के सामने बड़े परदे पर लाया गया है. ताऊ जी जो की भ्रष्ट सांसद की भूमिका में है, क्षेत्रीय बाहुबली हैं , उनके घर पहुचे आयकर अधिकारियों द्वारा रेड के समय जो शर्ते बतायी जाती हैं वह सुनना दर्शक के लिए रोमांच की अनुभूति देता है. रेड के दौरान घर के हर हिस्से में छुपा अकूत पैसा, छत से बरसते सोने के बिस्किट दर्शक में मन में बैठे एक लुटेरे राजनेता की छवि को पुष्ट करते हैं. दर्शक ताऊ जी को अपने इलाके के दबंग नेता से बहुत आसानी से जोड़ पाता है जिसे उसने पिछले चुनाव में वोट दिया है.

१६ जुलाई १९८१ को कांग्रेस पार्टी के सांसद सरदार इन्दर सिंह के घर आयकर आयुक्त शरद पाण्डेय ने रेड डाली थी. इसी घटना का फिल्मांकन करती इस फ़िल्म में अभिनेत्री एलेना ने एक सुन्दर ,कर्त्तव्यनिष्ठ, साहसी पत्नी भूमिका निभायी है. अफसर ईमानदार रहे इसके लिए ईमानदार बीवी का होना बहुत जरूरी है यह बात फ़िल्म का हीरो बातों बातों में स्वीकार करता है.
फ़िल्म की सफलता एक मुख्य हिस्सा अजय देवगन की ठसी हुयी, मारक  डायलाग डीलीवरी से बनता है. अजय ने ऎसी भूमिकाओं में , अन्य भूमिकाओं के बनिस्पत, ज्यादा कुशलता  हासिल कर ली है. गंगाजल से लेकर सिंघम तक और अब रेड ! ऎसी भूमिकाओं में वो एकदम फिट बैठते हैं.

एक दबंग बाहुबली सांसद के रूप में सौरभ शुक्ला ने अपनी सिग्नेचर स्टाइल में काम किया है. ८५ वर्ष की पुष्पा जोशी ताऊ जी की माँ के रूप में बहुत प्रभावपूर्ण रही है.फ़िल्म का संगीत बढ़िया है लेकिन कई बार ऐसा लगता  है कि गानों को बेवजह बीच में घुसा दिया गया है. इससे कभी कभी कहानी का प्रवाह भी बाधित हुआ लगता है. कुल मिलकर राजकुमार गुप्ता ने एक अच्छी फ़िल्म बनायी है.



Friday, March 23, 2018

अपाहिज लोकतन्त्र


यह देखकर आश्चर्य मिश्रित दुख होता है कि अनेक अच्छे खासे पढ़े लिखे तथाकथितवेल टू डूसज्जन भी  राजनीति से सम्बन्धित अभिव्यक्तियों में अच्छे बुरे का भेद किये बिना, मुद्दे को गहरायी से समझे बिना, अतार्किक रूप से तथ्यों को अनदेखा करते हुयेहार्ड पार्टी लाईनअपनाये दिखते हैं। खासकर तब जब उनका किसी राजनीतिक गतिविधि से कोई सीधा सम्बन्ध दिखता हो जिसमें यह मजबूरी हो कि अमुक माननीय मेरे तार्किक विकल्प चयन से नाराज हो जायेगें ! फिर भी इन सज्जनों का हर मुद्दे पर हार्ड पार्टी लाईन पर बने रहना मेरे मन में इनकी शिक्षा दीक्षा, इनके मानसिक स्वास्थ्य पर संदेह ऊपजाता है. ऐसे सज्जन हमारे आसपास बहुतायत मात्रा में बिखरे पड़े हैं. इनमें से कई अधिकारी, डाक्टर, अभियन्ता, एनआरआई इत्यादि है. आश्चर्यजनक रूप से कई प्रोफेसर और लेखक भी हैं जिनके प्रति व्यक्तिगत रूप से कई विनम्र लोग अकारण ही पर्याप्त श्रध्दा रखते हैं/थे.

हाल फिलहाल में अन्ना हज़ारे की फेसबुक पर चल रही जूतम पैजार (ट्रोलिंग)  देखकर मेरे मन में यह खयाल आया. मात्र चार पांच साल पहले हर वह व्यक्ति जो अपने देश-समाज के प्रति शुभेच्छा रखता था वह इस बात से सहमत था कि भ्रष्टाचार हमारी व्यवस्था के लिए नासूर है और एक मजबूत लोकपाल इसे रोकने की दिशा में एक प्रभावी कदम हो सकता है. लेकिन आज जब उसी अन्ना ने दुबारा उसी मुद्दे पर अनशन शुरु किया है तो उनके खिलाफ अपशब्दों, भद्दे चुटकुलों की बाढ़ गयी है. और फ़ेसबुक पर बात बात में ज्ञा झोकनें वाला, एक पढा लिखा आदमी भी इस भद्देपन का हिस्सा है. ऐसी परिस्थिति को कैसे समझा जाय ?
लोकपाल का औचित्य क्या है, उसकी सार्थकता कितनी होगी यह अलग बहस का मुद्दा है. लेकिन यह जो भद्र वर्ग उनकी ट्रोलिंग में लगा हुआ है उसे समझना जरूरी है. एक बात तो बिना किसी विश्लेषण के स्पष्ट हो जाती है कि यह जो वर्ग है इसका राजनैतिक चयन सूचना, संज्ञा, विश्लेषण पर आधारित होकर कुछ अन्य चीजों पर आधारित है. प्रश्न है कि वह अन्य चीजें क्या है?
वे इतिहाकार (“वामी, कामी, सिक-लर” ??) जो १८५७ की क्रान्ति को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नहीं मानते वे तर्क देतें है कि जिन लोगों ने क्रान्ति में हिस्सा लिया वे किसी उभय उद्देश्य अर्थातअपने राष्ट्र की स्वतंत्रता, गरिमाइत्यादि के लिए नहीं बल्कि अपनी पुरानीप्राईमार्डियल एथिनिकपहचान बचाने के लिए लड़ रहे थे. वे अपने समुदाय के दबदबे, अपनी जागीर, अपनी रीतियों-कुरीतियों को बचाये रखने के लिए लड़ रहे थे. उनके मन में एक राष्ट्र में रह रहे प्रत्येक आमजन के हित की कामना नहीं थी. एकता, बन्धुत्व जैसी भावनाएं नहीं थी.

हालाकिं व्यक्तिगत तौर पर मैं इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हूं. लेकिन इस तर्क-प्रविधि का उपयोग हम वर्तमान समस्या के उपलक्ष्य में करें तो बोधगम्य परिणाम दृष्टिगोचर होते है. यह जो वर्ग है, ……और हां, वह समूह भी जो हर मुद्दे पर दूसरीपार्टी लाइनपर डटा हुआ है वह भी, अपने देश, अपने देश के लोकतंत्र के लिए नहीं बल्कि अपने समूह के अल्पकालिक न्यस्त हितों अपनी जागीर को बचाने बचानें में लगा हुआ है. ये लोग कहें चाहे भले कुछ भी, और कितना ही भगत सिंह का जन्मदिन मना लें, इनके हृदय के भीतरी तलों में इनका समुदाय, इनकी जागीर ही इनके लिये पूज्य हैं, वृहदतर अर्थों में, आधुनिक अर्थों में,  देश की, देश की हित संकल्पना, उसके लिए प्रतिबध्दता इनकी सामूहिक कल्पना का हिस्सा नहीं है. इनके लिए राष्ट्र्हित-हित एक झुनझुना (नैरेटिव) है जिसे अपने छुपे हुये संकुचित हितों को साधते रहने के लिए बजाना होता है.

हांलाकि इसमें पूरी तरह इनका दोष भी नहीं कहा जा सकता. इनकी शिक्षा दीक्षा में ही खामी रह गयी है. देश की शिक्षा व्यवस्था ने इन्हें डाक्टर, इन्जीनियर, शिक्षक, वकील, लेखक, पत्रकार, बाबू, प्रोपागण्डिस्ट आदि के रुप में प्रशिक्षित कर कुशल कामगार तो बना दिया लेकिन अपने आसपास के समाज के सतत परिवर्तनशील यथार्थ को, जो कि संस्कृति और विज्ञा की नवनवोन्मेशालिनी गवेषणाओं से लगातार परिमार्जित, प्रकल्पित हो रहा है उसे समझना कैसे है, यह नहीं सिखाया.
आज हमारे देश में इस ना समझगी का सबसे ब़ड़ा खामियाजा हमारा लोकतन्त्र भुगत रहा है. अपाहिज लोकतन्त्र.