Thursday, April 30, 2015

कविता में

जब
दुनिया गर्म हो चुकी होगी बहुत
तब भी
थोड़ी ठण्डक बची रहेगी
कविता में।

जब ऊपर नीचे
चहुंदिश
होगी ध्वनि ही ध्वनि
जीवन के एकमात्र निशान की तरह
थोड़ा सा सन्नाटा
बचा रहेगा
कविता में।

नहीं होने की कगार पर
पहुंच चुकी हर चीज़
सिर्फ संग्रहालयों
संरक्षित अभयारण्यों में ही नहीं
कविता की उपत्यकाओं में भी
चोरी छिपे
बचा ली जाएगी।

वो
बिन ब्याही मांए
अधूरी विधावाएं
भूखा किसान
शामिल न  हो किसी दंगे में
ऐसा कोई भगवान
सबके लिए 
पूर्ण विराम के बाद भी
थोड़ी जगह
बची रहेगी
कविता में।

टूट जाएंगे जब
कथा के सूत्र
यहाँ वहाँ बिखर जाएंगे सब पाठ
विक्षिप्त इतिहास
टुकड़े टुकड़े रोप आएगा स्वयं को
कविता की क्यारियों में
ताकि बचा लिया जाए
फिर से पनपने को।


कविता में
बचा रहेगा सब कुछ
जो जरूरी है।

Monday, April 27, 2015

शान्त सतह

ऊपर की
शान्त सतह से
कहाँ पता चलता है
क्या क्या कुछ है
गहरे अन्तर !

देखो तो..
धरती..
सागर..
पेड़..
पहाड़
और
खुद
तुम ही

देखो तो....

कितनी गतियां
 कितने विप्लव
 पलते भीतर
 खिलते भीतर
 देखो तो....