Friday, September 24, 2010

प्रतिध्वनि !

तुम्हारी आवाज
छोटे छॊटे
अलग अलग
असंबद्ध टुकड़ों में
बहुत देर तक
गिरती रही
मेरे भीतर के किसी
गहरे

और गहरे

कुएं में

हां कुएं  में  !




सनसनाती हुयी

तेजी से

नीचे

और नीचे
बढ़ती

तुममें आयी बदलाहट का अर्थ लिये
मरे शब्दॊं की शिराओं में दौड़ती
जिन्दा आवाजें

अपने पीछे
कुछ हल्की फीकी पड़ती
आवाजों का एक धुआं -सा छोड़ती

अन्ततः उस गहरे कुएं में
बहुत अन्दर तक गयी !

लेकिन वहां
सन्नाटा
जमें हुये लावा की तरह
इतना अधिक और गाढ़ा था
कि
शायद
दम घुट गया उनका !

क्योंकि शून्य मन
जोहता हूं बहुत देर से
अभी तक नहीं आयी
कोई प्रतिध्वनि !

Sunday, September 19, 2010

वेश्यावृत्ति


जीवन तो
जाने कब का
चुक गया था


फिर
वहां

मौत
थी

वही मौत

॒॒॒॒॒॒॒

जाने क्यॊं

चीजें
पैदा हुयी थी

जाने क्यों
चीजें
खत्म
हो गयी


फिर
वहां

मौत
थी


वही
मौत


॒॒॒॒॒॒॒

सब
फूल झर गये

पंछी
सब मर गये
वृन्त
सब पीत हुये

शब्दॊं
में भर गयी सड़ान्ध

उत्सव
की स्मृतियों में लग गये दीमक
मर
कर सड़ गया

प्यार

देह
को उसकी

नोच
कर कौवे

खा
गये


फिर
वहां

मौत
थी


वही
मौत

॒॒॒॒॒॒॒

समय
ने खॊले

फिर
जाने
कितने
नये
चकलाघर

धुंआधार
चलने लगी

फिर
वही

हां वही
जीवन
की अबाध
वेश्यावृत्ति