Wednesday, May 19, 2010

निर्मोही


तुम्हारे शब्दों में

कुछ फूल हॊते हैं !


उन्हें छूकर

मैं जाग जाता हूं !


जगाओगे नहीं मुझे ?

निष्ठुर !



तुम्हारी चहकन में

कुछ रंग होते हैं !


उनके परस से मैं

बहक जाता हूं !



बहकाओगे नहीं मुझॆ ?

पाथर !



इन रंग और शब्दों से

मेरी सांस बनती है !

आंखॊं में चमक पिघलती है

और

बातॊं में खनक फटकती है ! !



लेकिन तुम .......

चुप हो अब भी ?

कुछ तो कहो

निर्मोही !