Friday, January 1, 2010

सन्नाटा


अलग होते मुझ के साथ

बहुत दूर तक टूटा नहीं

तुम्हारी पुकार का स्वर !

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

दूर निकल आये मुझ के साथ

उस स्वर के पीछे बचा

सन्नाटा अब भी है !

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सुनायी देता है लेकिन

सुनता नहीं हूँ

उस सन्नाटे का खालीपन !