Thursday, November 12, 2009

मै बस देखूगा !


बस,
हतप्रभ
अकिंचन मैं
देखूंगा ,
चुप ! विस्मित !

तुम हंसो ! ! !
अपनी वो
पूरी खुली
भरी और
गाढ़ी हंसी !

मेघाछ्न्न गदराये आकाश से
और न सम्हल सकी ,
उन्मुक्त,
उत्फुल्ल,
दिनों बाद
यकायक भहरायी
जोरदार
बरसात-सी
हंसी ! ! !

तुम हंसो ! !
मैं बस देखूंगा
वह मोतियों के
खूब बड़े झरने-सी
चमकीली हंसी !