Friday, September 4, 2009

अन्यथा ..........


सब कुछ तुम्हारा ही है !


मेरी जीत , मेरी हार
मेरी वासनाएं ,आकांक्षाए
मेरे पाप ...........

सब कुछ तुम्हारा ही है !

मेरे मद , मेरे मोह
मेरी उद्विग्नताये , व्यग्रताएं
मेरा अस्तित्व ..........

सब तुम्हारा ही है !

मेरा क्रोध , मेरा प्रेम
मेरी उदघोशनाए , गर्जनाये
मेरे अपराध.....

सब तुम्हारा ही है !

तुमसे विलग है
मेरा
बस एक निर्णय --
सही अथवा ग़लत का !
पाप अथवा पुन्य का !
तुम्हारे इन भव्य उपहारों के प्रति .......
जिससे
मै मै हूँ
और
तुम तुम हो
एकदम प्रछन्न .......दूर दूर

अन्यथा....... ..............!!!!!!!!!!!!!!