Saturday, April 11, 2009

शब्द

(मेरी) कविता के शब्दों में
तुम
अर्थ न खोजना, उसकी व्याख्यायें न करना ।
केवल उच्‍चरित करना ,
उन्हें धारण करना और चुप हो जाना ।

वे बस शब्द नहीं हैं ।
वे दूत हैं ।
दूत-बहुत सूक्ष्म जीवधारी , तरंगायित आवृत्ति निर्मित देह वाले ।
आवृत्ति-चेतना के होने का एक ढ़ंग , गतिशील इसलिये अशंतः अभिव्यक्त ।
खैर,
तुम
उन्हें उच्‍चरित करना और चुप हो जाना ।
तुममें प्रवेश कर
वे तुम्हें अपने साथ कहीं ले जायेंगें ।
कहीं-किसी दूसरी जगह पर, अन्यत्र ।

हो सकता है
वो जगह उन्हें कहीं तुम्हारे भीतर ही मिल जाय
और वे तुम्हें वहां पहुंचा
(मुझमें) वापस लौट आयें ।

या हो सकता है
कि उस जगह की खोज में
वे कहीं तुम्हें तुमसे बाहर ले जांय ।
कहीं -स्थान व स्थिति के किसी दूसरे कोण व विमा में ,
और वहां घुमा दिखा
तुम्हें तुममें वापस छोंड़ने के
बाद
(मुझमें) वापस आयें ।

हो सकता है ! ,! ,! ,
लेकिन तुम उनमें अर्थ न खोजना, व्याख्या न करना ।
बड़े अच्छे हैं वे दूत ,
अपना काम कर लेंगें ।

Thursday, April 9, 2009

वो लड़की है....

आज सात साल बाद मिला था उनसे । अब वो बड़ी हो गयी हैं । वो लड़की हैं । वो बोलती और हंसती भी हैं । वो लोगों को देखकर मुस्कराती हैं और बातें करती हैं । कुछ दिन शहर में रही हैं । इतना तो आ ही जाता है । अब उनकी शादी होने वाली है । होने वाली से मतलब पक्की हो गयी है ।
पक्की हो गयी है से मतलब कि अब एकदम पक्की हो गयी है । वो क्या है की इसके पहले भी एक बार पक्की हुयी थी । लड़का “जाब” और “पैकेज” वाला था । धनी था । “संस्कारित” था । एक दो बार घर भी आया । बातचीत भी की । इसी दौरान उनकी —जो अब बड़ी हो गयी हैं और लड़की हैं —की एक पुरानी एलबम में दोस्तों के साथ की (एक बहुत ही सहज सी) फोटो देख ली.........!
आज जिस मन्दिर में उनकी सगायी की रस्म होने वाली है वहीं उसने उन्हें अकेले मिलने के लिये बुलाया था । तब तक घर वालों को कुछ भी पता न चला था । सब खुश थे । चाचा जी मन्दिर तक छोड़ने आये थे उनको ।
शुरुआत की एक दो अच्छी बातों के बाद उसके असहज स्पर्शन को स्वप्नों का आलिंगन ही समझा था उन्होंने । बहुत देर तक भी समझ न सकी थीं वो कि उसने सादे कागज पर जबरन इनके हस्ताक्षर क्यों लिये । क्योंकि तभी उसने बताया था की वह उनसे शादी नहीं करेगा । उन्हें बरबाद करके छोंड़ेगा........ ।
बाद में यह दूसरा रिश्ता पक्का हुआ । तैयारियां हो रही थी घर पर । तभी अचानक एक दिन मुहल्ले में हल्ला हुआ कि मनीषा की शादी तो एक बार हो चुकी है......पुराने दुल्हे के पास कागजात हैं..... !
...पापा के सीने में बहुत तेज दर्द हुआ था ....चाचा का सारा गुस्सा मन्नों पर ही उतरा था.....दीवाल से टकराकर सिर फट गया था...!
आज सगायी के दिन भी जख्म पूरा सूखा नहीं है....सब वैसे ही हो रहा है जल्दी जल्दी । सबकुछ जानने के बाद दुगने दहेज पर फिर से तैयार हुये हैं वे ।

Tuesday, April 7, 2009

अक्षर

मैं
अपना जीना
अपना होना
अपनी तृप्त अतृप्त आकाक्षांए
अपने द्वेष अपनी प्रसन्‍नताएं
और इन सब को मिलाकर
जो बिलकुल मैं हूं वह
थोड़ा थोड़ा रोज रोज
शब्दों को देता जाता हूं ।

हांलाकि शब्द फिर से
पूरा पूरा ,दुबारा ,कहीं
किसी से भी ,ठीक वैसा ही
नहीं कह पायेगें मुझे
लेकिन
शायद
अपनी अक्षरता में सतत गतिशील
अपने साथ वे
एक दो कन मुझे भी
अक्षर कर जायेंगे ।