Friday, January 16, 2009

न जाने क्या .....!


आज पूरे दिन, सूरज न जाने किस आग में तपता हुआ , आसमान के लम्बे चौड़े गलियारे में टहलता रहा है ! किरनों की नाव में बैठकर , हवा के समंदर में तली तक ,धरती तक , धूप फूल-फूल घूम ,न जाने किसका पता पूछती रही है ! हवा की चिड़िया ,पूरे दिन , अनवरत ,आत्मविस्मृत ,बिना थके , घर(पेड़) -घर(पेड़) जाकर उन्हें पूरा छान आयी है ,जर्रा जर्रा खोज आयी है ,फिर , अन्ततः ,न जाने क्या न पाकर , सांझ की गोद में गाय के सफेद प्यारे बछड़े सी निरीह , निश्चेष्ट पड़ी हुयी न जाने किस स्वप्न में डूबी हुयी सी है ! वो पुराना ,मन्दिर के पीछे वाला , अकेला चुपचाप खड़ा पेड़ , जो बार बार और हर बार शिशिर के एक साधारण से गुलाबी दिन में मध्याह्न की पियरायी उतरती धूप में थोड़ी लालिमा घोलता , अपनी सारी हरियरी न जानें किस रूठन में झार,फूलों से गज- गज लद बिलकुल टहकार लाल हो उठता है ,इस बार फिर , न जाने किसे चढ़ाये जाने की आस में लकदक लाल हो उठा है . .. . . . और ... और ....वीटी -चौराहे पर रोज बैठ, अपने अस्तित्व की समग्र दयनीयता व विवशता अपने रिघुर रिघुर कर निकलते शब्दों में भर ,कुछ दे देने की गुहार लगाती वो अपाहिज अनाथ बुढ़िया , आज पर्याप्त भीख पाकर भी न जाने क्या सोचती , उधर सड़क किनारे के पेड़ ताकती , उदास है ......

Sunday, January 11, 2009

हर रोज

हर रोज
सूरज ही नहीं ,
मैं भी
उगता
और डूबता हूँ .

हर रोज
चाँद ही नहीं ,
मैं भी
पिघलता
और बिखरता हूँ .

हर रोज
साँझ की नीली परी ही नहीं ,
मैं भी
धीरे धीरे उतरता ,
उदास होता हूँ.


हर रोज
धुधलके में जुगनू ही नहीं,
मैं भी
जलता
और बुझता हूँ


हर रोज
रात में वो पेंड़ ही नही
मैं भी
अंधेरे की धुन पर दर्द सा
बजता हूँ ।


हर रोज
घने कुहरे में सुनसान सड़क की वो पीली बत्ती ही नहीं
मैं भी
(तुम्हारी) स्मृतियों की भींगी सफेद पीली उजास में
स्तब्ध हो उठता हूँ।


हर रोज !