Thursday, January 1, 2009

फर्जी शुभकामनाएं

(यह विनय भईया के ब्लाग पर टिप्पणी के लिये लिख रहा था , फिर सोचा कि टिप्पणी को थोड़ा और खिला पिला कर अपना भी स्वार्थ साध लूं !)


एक बात है कि नये साल पर या किसी अन्य त्यौहार पर लोग झूठ खूब बोलते हैं !अपने साल भर के झूठ के अकाउन्ट का आधा इन्हीं दिनों मे खर्च कर देते है ! एक से एक फर्जी बधाई सन्देश ! झूठ मूठ की शुभकामनायें !
कैम्पस में घूम रहा था . सड़कों पर सायकिल या मोटर सायकिल से गुजरते लोग एक दूसरे पर वही रटा हुआ जमुला लहरा रहे थे . यूं लग रहा था जैसे बची हुयी रोटियां एक दूसरे पर फेंक रहें हों !
वर्ष चाहे दो हजार आठ हो या नौ या दस , बदलता कहां कुछ है ! जब तक कुछ भीतर न बदले !

Tuesday, December 30, 2008

चलो ! अच्छा हुआ

चलो अच्छा हुआ कि
तुम्हें भी कोइ और
मिल गया !
प्रतिशोध मुझसे जो था तुम्हारा
चुक गया !

विचरते मेरे दंभ के पठारों में
खो चुके जो स्वप्न थे सब तुम्हारे ,
उनको फिर से इक नया जहां मिल गया !

कैद मेरे स्वार्थ -सींकचों में
सन्त्रस्त भाव- विहग जो थे सब तुम्हारे
उनकों इक नया व्योम नीला मिल गया !

अपने को न जाने क्या समझते
एक झगड़ालू ,इर्ष्यालू और अहंकारी के
चंगुल से पूर्णतः मुक्त हुई तुम!
चलो !
अच्छा हुआ ,तुम्हें भी कोई और मिल गया !